Jharkhand समेत पूरे देश में नक्सलवाद के खिलाफ चल रही लड़ाई अब अपने अंतिम और निर्णायक चरण में पहुंचती दिख रही है। केंद्र सरकार ने 31 मार्च 2026 तक भारत को नक्सल मुक्त बनाने का लक्ष्य तय किया है, और इसी दिशा में पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा एजेंसियों ने मिशन मोड में काम किया है। कभी देश के 100 से अधिक जिलों में फैला नक्सल प्रभाव अब सिमटकर कुछ चुनिंदा इलाकों तक रह गया है, लेकिन यह लड़ाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है—खासकर झारखंड के सरांडा जैसे इलाकों में।
झारखंड में नक्सलवाद की जड़ें 2000 के बाद तेजी से मजबूत हुई थीं। 2005 से 2010 के बीच राज्य में नक्सली हिंसा चरम पर थी और 2009 में 500 से ज्यादा घटनाएं दर्ज हुईं। उस समय लातेहार, गुमला, चतरा और पश्चिमी सिंहभूम जैसे जिले पूरी तरह नक्सल प्रभाव में थे। लेकिन 2010 के बाद रणनीति बदलने के साथ तस्वीर बदलनी शुरू हुई।
झारखंड में माओवादी ढेर (2020–2025)
वर्ष माओवादी ढेर
2020 14
2021 6
2022 11
2023 9
2024 9
2025 32
यह चार्ट साफ दिखाता है कि 2025 में सुरक्षा बलों ने सबसे ज्यादा आक्रामक कार्रवाई की।
पिछले दो दशकों में झारखंड में नक्सलियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर ऑपरेशन चलाए गए हैं। अलग-अलग रिपोर्टों के अनुसार अब तक 250 से लेकर 999 तक माओवादी मारे जाने के आंकड़े सामने आते हैं, जबकि 300 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। 2025 में 30 नक्सलियों का सरेंडर इस बात का संकेत है कि अब संगठन के भीतर भी टूटन बढ़ रही है।
जहां एक समय 20 से ज्यादा जिले नक्सल प्रभावित थे, अब यह संख्या घटकर लगभग 10–11 रह गई है। इनमें भी सबसे बड़ा और संवेदनशील इलाका पश्चिमी सिंहभूम का सरांडा जंगल बचा है, जिसे कभी माओवादियों का ‘सुरक्षित किला’ कहा जाता था
केंद्र का मिशन मोड: ऑपरेशन, टेक्नोलॉजी और टारगेट लीडरशिप
केंद्र सरकार की रणनीति अब साफ है—नक्सलवाद को जड़ से खत्म करना। इसके लिए सुरक्षा बलों को पूरी छूट दी गई है और आधुनिक तकनीक का भी इस्तेमाल बढ़ाया गया है।
जनवरी 2026 में Jharkhand के सरांडा में चलाया गया ऑपरेशन मेधा बुरु (मेगाबुरु) इसका बड़ा उदाहरण है, जिसमें 16 नक्सली मारे गए। इस ऑपरेशन में CRPF की CoBRA यूनिट, झारखंड पुलिस की Jaguar फोर्स और जिला पुलिस ने संयुक्त रूप से कार्रवाई की।
इसी तरह छत्तीसगढ़ के बीजापुर और बस्तर में भी बड़े ऑपरेशन चलाकर शीर्ष माओवादी नेताओं को निशाना बनाया गया। अब रणनीति साफ है—फुट सोल्जर नहीं, बल्कि टॉप कमांडरों को खत्म करना।
कौन हैं अभी भी सक्रिय टॉप नक्सली? (इनाम के साथ)
झारखंड में अभी भी कुछ बड़े और खतरनाक नक्सली सक्रिय हैं:
- मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर (CPI-माओवादी)
₹1 करोड़+ | सरांडा - असीम मंडल उर्फ आकाश
₹50 लाख – ₹1 करोड़ - ब्रजेश गंझू (TPC सुप्रीमो)
₹25–30 लाख - अमृत होरो (PLFI कमांडर)
₹10–15 लाख - शिव सिंह (JJMP कमांडर)
₹5–10 लाख
सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक मिसिर बेसरा फिलहाल सबसे बड़ा और खतरनाक टारगेट है।
हालिया घटनाएं: कम हुए हमले, लेकिन खत्म नहीं हुई गतिविधि
हाल के महीनों में नक्सली गतिविधियों में कमी जरूर आई है, लेकिन पूरी तरह रुकावट नहीं आई। छोटे-छोटे हमलों और रणनीतिक गतिविधियों के जरिए नक्सली अपनी मौजूदगी बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।
हालिया घटनाएं:
- सरांडा (प. सिंहभूम) – मुठभेड़, IED लगाने की कोशिश
- लातेहार – सड़क निर्माण में बाधा, लेवी वसूली
- गुमला–सिमडेगा – PLFI की रंगदारी
- पलामू – पोस्टर और धमकी अभियान
- चतरा बॉर्डर – IED ब्लास्ट
यह साफ संकेत है कि नक्सली अब बड़े हमलों की बजाय गुरिल्ला वारफेयर पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं।
विकास vs नक्सलवाद: जमीनी बदलाव
नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में विकास भी एक बड़ा हथियार बना है।
- सड़कों का तेजी से निर्माण
- मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट पहुंच
- बैंकिंग और रोजगार योजनाएं
- आदिवासी क्षेत्रों में विशेष योजनाएं
इससे न केवल सरकार की पहुंच बढ़ी, बल्कि स्थानीय लोगों का भरोसा भी मजबूत हुआ, जिससे नक्सलियों का जनाधार कमजोर पड़ा।
आखिरी चरण की सबसे कठिन लड़ाई
Jharkhand में नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में जरूर है, लेकिन यह सबसे कठिन दौर भी हो सकता है। क्योंकि अब बचे हुए नक्सली ज्यादा प्रशिक्षित, संगठित और खतरनाक हैं।
एक तरफ
- केवल 50–60 हार्डकोर नक्सली बचे
दूसरी तरफ - करोड़ों का इनाम
- लगातार छोटे हमले
यह दिखाता है कि खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
अगर सुरक्षा अभियान और विकास कार्य इसी रफ्तार से जारी रहे, तो 2026 का “नक्सल मुक्त भारत” सपना हकीकत बन सकता है।













