Jharkhand: झारखंड विधानसभा के शीतकालीन सत्र ने सिर्फ सरकार–विपक्ष के बीच की राजनीतिक गर्माहट नहीं बढ़ाई, बल्कि सत्ता में साझेदार कांग्रेस पार्टी की गहरी आंतरिक खींचतान को भी उजागर कर दिया है। पिछले कुछ दिनों में सदन के भीतर और बाहर जो घटनाएं सामने आईं, उन्होंने कांग्रेस की एकजुटता और संगठनात्मक अनुशासन पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
सदन में प्रदीप यादव बनाम इरफान अंसारी – गंभीर मुद्दे पर तीखी बहस
विधानसभा में स्वास्थ्य व्यवस्था पर चर्चा के दौरान कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव और स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी के बीच तीखी नोकझोंक हो गई।
प्रदीप यादव ने गंभीर आरोपों के साथ कहा कि—
- राज्य में 11,000 से अधिक बच्चे थैलेसीमिया, सिकल सेल और अप्लास्टिक एनीमिया से जूझ रहे हैं।
- उन्हें हर माह 1–2 बार रक्त चढ़ाने की जरूरत होती है, पर सरकार के पास कोई ठोस नीति नहीं है।
- परिवारों को खून के लिए दूसरे राज्यों में भटकना पड़ रहा है।
- छत्तीसगढ़ में बच्चों को 15 लाख और बच्चियों को 18 लाख की सहायता दी जाती है, पर झारखंड में कोई ऐसी व्यवस्था नहीं।
- क्या सरकार ने कभी इन पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर उनकी समस्या समझी?
इस मुद्दे पर मंत्री इरफान अंसारी के जवाब से स्थिति और तनावपूर्ण हो गई, जिसके बाद स्पीकर को हस्तक्षेप करना पड़ा।
ममता देवी बनाम स्वास्थ्य मंत्री का ‘ऑडियो विवाद’ – विपक्ष को मौका
अगले ही दिन नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने एक नया मुद्दा उठा दिया।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस विधायक ममता देवी ने अपनी ही पार्टी के स्वास्थ्य मंत्री पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनके पास बातचीत की सीडी भी है और उन्होंने इस मामले की जांच की मांग की।
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हालांकि ममता देवी ने मीडिया से कहा—
“ऑडियो में मेरी आवाज़ नहीं है।”
लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ। विपक्ष इसे कांग्रेस की अंदरूनी टूट का ताजा उदाहरण बताकर भुना रहा है।
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संगठन में बढ़ती नाराजगी – दिल्ली तक पहुंचे संकेत
एक के बाद एक विवादों ने झारखंड कांग्रेस की तस्वीर कमजोर दिखाई है।
कांग्रेस कोटे के मंत्री दीपिका पांडेय सिंह, इरफान अंसारी और प्रदीप यादव के बीच बार-बार सामने आ चुके मतभेदों ने नेतृत्व को परेशान कर दिया है।
- वरिष्ठ नेता आपसी मध्यस्थता में जुटे हुए हैं
- कई दौर की बातचीत हुई, पर तनाव बरकरार
- अब दिल्ली में समन्वय बैठक बुलाने की तैयारी
- सभी प्रमुख नेताओं को दिल्ली तलब किया जा सकता है
केंद्रीय नेतृत्व स्पष्ट कर चुका है कि—
“पार्टी के आंतरिक विवाद सड़क और मीडिया पर नहीं आने चाहिए। समाधान पार्टी मंचों पर हो।”
राजनीतिक विश्लेषण: चुनावी वर्ष में संकट गहराने का खतरा
झारखंड में कांग्रेस पहले से ही गठबंधन राजनीति पर निर्भर है। ऐसी स्थिति में पार्टी के भीतर की तकरार कई तरह से नुकसान पहुँचा सकती है—
- सरकार में कांग्रेस की छवि कमजोर होगी
- विपक्ष इन विवादों को लगातार भुनाएगा
- कार्यकर्ताओं में असंतोष और भ्रम बढ़ेगा
- चुनावी वर्ष में संगठनात्मक एकजुटता प्रभावित होगी
- गठबंधन सहयोगियों का भरोसा भी डगमगा सकता है
यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी, तो इसका सीधा असर कांग्रेस के आगामी चुनावी प्रदर्शन पर पड़ सकता है।
क्या आलाकमान लगा पाएगा मरहम?
झारखंड कांग्रेस इस समय सबसे कठिन दौर से गुजर रही है।
नेतृत्व, मंत्री, विधायक—सब अपने-अपने मोर्चे पर बयानबाजी में उलझे हुए हैं।
आलाकमान की बैठक से क्या समाधान निकलता है, यह आने वाले दिनों में तय करेगा कि—
- कांग्रेस खुद को संगठित रख पाएगी या
- अंदरूनी विवाद उसके लिए चुनावी जोखिम बन जाएंगे।
फिलहाल सारी निगाहें दिल्ली की ओर टिकी हैं।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
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