विश्वकर्मा पूजा 2026 इस साल 17 सितंबर को मनाई जाएगी। आमतौर पर इस दिन भगवान विश्वकर्मा की पूजा के साथ मशीनों, औजारों, वाहनों और काम में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की भी पूजा की जाती है। लेकिन इस पर्व से जुड़ी एक खास परंपरा कई लोगों के लिए आज भी सवाल बनी हुई है-आखिर विश्वकर्मा पूजा के दिन कई जगहों पर मशीनें और औजार काम से क्यों रोक दिए जाते हैं?
इसे सिर्फ एक धार्मिक नियम मानना इस परंपरा की पूरी तस्वीर नहीं बताता। इसके पीछे कारीगरी, श्रम, आजीविका और औजारों के प्रति सम्मान की एक लंबी सांस्कृतिक परंपरा दिखाई देती है।
विश्वकर्मा पूजा के दिन मशीनें क्यों बंद रखी जाती हैं?
विश्वकर्मा पूजा की खासियत यह है कि पूजा केवल किसी मंदिर या घर में रखी प्रतिमा तक सीमित नहीं रहती। पूजा का स्थान अक्सर वही होता है जहां रोज काम होता है-फैक्ट्री, वर्कशॉप, गैराज, मशीन शॉप, दुकान या कार्यस्थल। इस दिन काम में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों को साफ किया जाता है, सजाया जाता है और उनके सामने पूजा की जाती है। कई जगहों पर मशीनों को उस दौरान चलाया भी नहीं जाता।
2026 के लिए प्रकाशित हालिया विवरणों में भी यह दर्ज है कि कई स्थानों पर औजारों और मशीनों को पूजा के लिए बंद रखा जाता है और नियमित काम रोकने की परंपरा निभाई जाती है। हालांकि इसका पालन हर क्षेत्र और हर कार्यस्थल पर एक जैसा नहीं होता।
क्या काम बंद करना सिर्फ धार्मिक वजह से है?
इसे केवल “मशीन चलाना मना है” जैसी धार्मिक पाबंदी के रूप में देखना अधूरा होगा। विश्वकर्मा पूजा में जिस चीज को विशेष महत्व मिलता है, वह है काम करने का साधन। एक बढ़ई के लिए आरी, हथौड़ा और छेनी, दर्जी के लिए सिलाई मशीन, लोहार के लिए हथौड़ा और भट्ठी, मैकेनिक के लिए औजार, ड्राइवर के लिए वाहन और फैक्ट्री कर्मचारी के लिए बड़ी मशीनें-ये सभी रोजी-रोटी से सीधे जुड़े उपकरण हैं।
इसलिए पूजा के दिन इन्हीं साधनों को काम से अलग रखकर उनके प्रति सम्मान जताने की परंपरा को श्रम और कौशल के सांस्कृतिक सम्मान के रूप में भी समझा जा सकता है। भारत सरकार के PIB ने भी विश्वकर्मा पूजा को कारीगरों और श्रमिकों के कौशल के प्रति सम्मान और उनके काम के महत्व से जोड़ा है।
औजारों को ‘रोकना’ अपने आप में क्या संदेश देता है?
इस परंपरा का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि जिस मशीन या औजार से रोज उत्पादन होता है, उसी को एक दिन के लिए काम से अलग कर दिया जाता है। सालभर मशीन इंसान के काम का साधन रहती है। लेकिन पूजा के दिन वही मशीन पूजा का केंद्र बन जाती है।
2017 में प्रकाशित Tools and world-making in the worship of Vishwakarma नामक अकादमिक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने भारत और दक्षिण एशिया के विभिन्न संदर्भों में औजारों, मशीनों और अन्य उपकरणों को समय-समय पर रोककर या स्थिर करके पूजा का केंद्र बनाए जाने की परंपराओं का अध्ययन किया। शोध का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि औजारों की देखभाल और उनकी पूजा को कारीगरी, निर्माण और भौतिक वस्तुओं की धार्मिक-सांस्कृतिक भूमिका को समझने के रास्ते के रूप में देखा जा सकता है।
यानी मशीन बंद होना केवल मशीन का रुकना नहीं है; वह मशीन को देखने और उसके महत्व को पहचानने का एक अवसर भी बन जाता है।
विश्वकर्मा पूजा में पहले औजार, बाद में प्रतिमा?
यह तथ्य इस परंपरा को और दिलचस्प बनाता है। उपलब्ध ऐतिहासिक-अनुसंधान सामग्री के अनुसार, कुछ कारीगर परंपराओं में विश्वकर्मा की पूजा का केंद्र स्वयं उनके काम के औजार रहे हैं। 19वीं सदी के बंगाल से जुड़े एक वर्णन में भी पूजा के लिए विश्वकर्मा की प्रतिमा के बजाय विभिन्न यांत्रिक कामों में इस्तेमाल होने वाले औजारों को प्रमुख स्थान दिए जाने का उल्लेख मिलता है। इसी अकादमिक अध्ययन में मेहरा मुखर्जी के काम का हवाला देते हुए कहा गया है कि कुछ क्षेत्रों में विश्वकर्मा की मुद्रित या निर्मित प्रतिमाएं अपेक्षाकृत बाद में अधिक दिखाई देने लगीं।
इससे एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक तस्वीर सामने आती है-विश्वकर्मा पूजा की पहचान केवल देवता की प्रतिमा से नहीं, बल्कि काम और काम के औजारों से भी बनी।
मशीन की पूजा में ‘आराम’ का विचार भी छिपा है
आज फैक्ट्रियों और वर्कशॉप में मशीनों की नियमित देखभाल तकनीकी जरूरत है। लेकिन पारंपरिक विश्वकर्मा पूजा में मशीन को साफ करना, सजाना और कुछ समय के लिए बंद रखना एक धार्मिक-सामाजिक प्रक्रिया का हिस्सा बन गया है। इस दौरान मशीन पर फूल चढ़ाए जाते हैं, उसे साफ किया जाता है और उसके सामने पूजा की जाती है। यानी जिस उपकरण को आम दिनों में केवल उत्पादन की दृष्टि से देखा जाता है, उसे उस दिन ध्यान और सम्मान का विषय बनाया जाता है।
इसी वजह से विश्वकर्मा पूजा को केवल “मशीनों की पूजा” कहना भी अधूरा हो सकता है। इसके भीतर कारीगर, उसका कौशल और उसका औजार-तीनों एक साथ दिखाई देते हैं।
क्या पूरे भारत में मशीनें बंद रहती हैं?
यहां एक जरूरी अंतर समझना चाहिए। विश्वकर्मा पूजा की परंपराएं क्षेत्र, पेशे और स्थानीय समुदाय के अनुसार बदलती हैं। कहीं पूरे दिन काम बंद रखा जाता है, कहीं पूजा के समय मशीनें बंद रहती हैं और कहीं सामान्य कामकाज पूरी तरह बंद नहीं होता।
अकादमिक शोध भी विश्वकर्मा और औजार-पूजा से जुड़ी प्रथाओं में विविधता की ओर संकेत करता है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि पूरे भारत में हर फैक्ट्री, दुकान या वर्कशॉप में विश्वकर्मा पूजा के दिन अनिवार्य रूप से काम बंद रहता है।
आधुनिक फैक्ट्री में बदला रूप, लेकिन भावना वही
आज विश्वकर्मा पूजा सिर्फ पारंपरिक कारीगरों तक सीमित नहीं है। फैक्ट्रियों, इंजीनियरिंग इकाइयों, गैराज, निर्माण स्थलों और तकनीकी संस्थानों में भी यह पर्व मनाया जाता है। 2025 में वाराणसी के IIT-BHU और Banaras Locomotive Works जैसे संस्थानों में भी विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर कार्यस्थलों और उपकरणों की सफाई-सजावट तथा पूजा की गई थी।
इससे परंपरा का आधुनिक रूप दिखाई देता है। पहले जहां औजार किसी कारीगर की रोजी-रोटी का मुख्य साधन था, आज वही विचार बड़ी मशीनों, औद्योगिक उपकरणों और तकनीकी कार्यस्थलों तक पहुंच चुका है।
विश्वकर्मा पूजा में काम रोकने का असली मतलब क्या समझें?
अगर इस पूरी परंपरा को एक वाक्य में समझना हो तो कहा जा सकता है- विश्वकर्मा पूजा का काम रोकना केवल मशीन बंद करना नहीं, बल्कि उस काम, कौशल और साधन को एक दिन के लिए केंद्र में लाना है जिसके सहारे रोजी-रोटी चलती है।
यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ-साथ भारतीय कारीगर संस्कृति में औजार के महत्व और श्रम के सम्मान को भी सामने लाती है। और शायद यही वजह है कि विश्वकर्मा पूजा में सबसे दिलचस्प चीज भगवान की प्रतिमा के सामने रखा फूल नहीं, बल्कि उसके पास रखा वह औजार भी है जो बाकी 364 दिन किसी इंसान की मेहनत का साथी बना रहता है।
विश्वकर्मा पूजा 2026 के दिन मशीनों और औजारों को काम से अलग रखने की परंपरा को एक ही कारण से समझना सही नहीं होगा। अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी प्रथाएं अलग हैं। लेकिन उपलब्ध अकादमिक और ऐतिहासिक सामग्री यह दिखाती है कि औजारों को रोकना, साफ करना और पूजा का केंद्र बनाना कारीगरी तथा श्रम की व्यापक सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा रहा है।
कंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।









