Muduma Jatra Mela 2026: झारखंड के रांची जिले के मांडर स्थित मुड़मा गांव में 27 और 28 अक्टूबर 2026 को ऐतिहासिक मुड़मा जतरा मेला आयोजित किया जा रहा है। करीब 1400 साल पुरानी मानी जाने वाली इस परंपरा में शामिल होने के लिए झारखंड समेत दूसरे राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस मेले में शक्ति खूंटा की पूजा, पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान और आदिवासी संस्कृति का विशेष महत्व है।
मुड़मा जतरा मेला 2026 कब और कहां लगेगा?
मुड़मा जतरा मेला 2026 का आयोजन 27 और 28 अक्टूबर को रांची जिले के मांडर प्रखंड के मुड़मा गांव में होगा। यह मेला आदिवासी समाज की धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा महत्वपूर्ण आयोजन माना जाता है। हर साल यहां दूर-दराज के इलाकों से श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं।
1400 साल पुराना है मुड़मा जतरा का इतिहास
लोकमान्यताओं के अनुसार, मुड़मा जतरा की परंपरा लगभग 1400 साल पुरानी है। मान्यता है कि रोहतासगढ़ से उरांव जनजाति के लोगों के पलायन के बाद इसी क्षेत्र में मुंडा और उरांव समुदाय के लोगों की मुलाकात हुई थी।
कहा जाता है कि मुंडा समुदाय ने उरांव समाज के लोगों को रहने के लिए जगह दी थी। दोनों समुदायों के बीच हुए पारंपरिक समझौते को आपसी सहयोग, सद्भाव और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। इसी ऐतिहासिक स्मृति और पारंपरिक मान्यताओं को जीवित रखने के लिए मुड़मा जतरा का आयोजन किया जाता है। हालांकि, इस इतिहास से जुड़ी बातें मुख्य रूप से स्थानीय लोकमान्यताओं और पारंपरिक कथाओं पर आधारित हैं।
40 पड़हा की परंपरा और मुड़मा जतरा का महत्व
मुड़मा जतरा को आदिवासी समाज की पारंपरिक सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था से जोड़कर देखा जाता है। 40 पड़हा की परंपरा इस आयोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। यह परंपरा समुदायों के बीच एकजुटता, आपसी सहयोग और सांस्कृतिक पहचान का संदेश देती है।
मेले में विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालु अपनी परंपराओं के अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं और सामुदायिक विरासत से जुड़ते हैं।
शक्ति खूंटा की पूजा क्यों है खास?
मुड़मा जतरा मेले का प्रमुख धार्मिक आकर्षण जतरा खूंटा, जिसे शक्ति खूंटा भी कहा जाता है, है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह स्थल आदिवासी समाज की आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है। इस अवसर पर सरना धर्मगुरु और 40 पड़हा के पाहन यानी पारंपरिक धार्मिक पुजारी विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। श्रद्धालु जल लेकर पहुंचते हैं और अपने पूर्वजों से जुड़ी धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं का पालन करते हैं।
शक्ति खूंटा की पूजा के दौरान सामूहिक आस्था, पारंपरिक रीति-रिवाजों और आदिवासी धार्मिक संस्कृति की विशेष झलक देखने को मिलती है।
ढोल-मांदर की थाप पर दिखेगी आदिवासी संस्कृति
मुड़मा जतरा मेला केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि आदिवासी कला और संस्कृति का भी महत्वपूर्ण मंच है। मेले में ढोल, नगाड़े और मांदर की थाप पर पारंपरिक नृत्य-संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियां आकर्षण का केंद्र रहती हैं।
मेले में आने वाले लोग पूजा-अर्चना के साथ विभिन्न दुकानों से घरेलू सामान, पारंपरिक औजार और स्थानीय खानपान की चीजों की खरीदारी भी करते हैं। मेले की रौनक और पारंपरिक माहौल इसे खास बनाते हैं।
आपसी भाईचारे और सामाजिक एकता का प्रतीक है मुड़मा जतरा
मुड़मा जतरा में आदिवासी समुदाय के अलावा दूसरे समुदायों के लोग भी शामिल होते हैं। लोग यहां की धार्मिक परंपराओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों, पारंपरिक नृत्य-संगीत और मेले के माहौल का आनंद लेने पहुंचते हैं।
यह आयोजन सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ आपसी मेल-जोल, सामाजिक सद्भाव और भाईचारे का संदेश भी देता है।
क्यों खास है मुड़मा जतरा मेला 2026?
मुड़मा जतरा मेला झारखंड की समृद्ध आदिवासी परंपराओं और सामुदायिक विरासत की पहचान है। शक्ति खूंटा की पूजा, 40 पड़हा की परंपरा और ढोल-मांदर की गूंज इस आयोजन को विशिष्ट बनाती है। 27 और 28 अक्टूबर 2026 को आयोजित होने वाला यह मेला श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक आस्था और लोगों के लिए झारखंड की सांस्कृतिक विविधता को करीब से जानने का अवसर है।
कंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।









