रांची: राजधानी रांची के डोरंडा स्थित JAP-1 परिसर में होने वाली दुर्गा पूजा अपनी अनोखी परंपराओं के लिए खास पहचान रखती है। यहां सबसे खास बात यह है कि मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित नहीं की जाती। इसके बजाय पवित्र कलश की स्थापना कर देवी की पूजा-अर्चना की जाती है। वर्ष 1880 से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जा रही है।
शनिवार को JAP-1 परिसर में कुमारी पूजा का आयोजन किया गया। इस दौरान कुंवारी कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर उनकी विधि-विधान से पूजा की गई। इसके बाद परिसर से पारंपरिक ‘फूल पाती’ शोभायात्रा निकाली गई।
शोभायात्रा में महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। महिलाएं पारंपरिक अंदाज में नृत्य करते हुए शोभायात्रा के साथ आगे बढ़ीं। ढोल-नगाड़ों और भक्ति के माहौल के बीच निकली शोभायात्रा में श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा था।
फूल पाती की इस परंपरा में प्रकृति को विशेष महत्व दिया जाता है। शोभायात्रा के दौरान पेड़-पौधों और प्रकृति से जुड़ी वस्तुओं की पूजा की गई। इस अनुष्ठान में प्रकृति के प्रति सम्मान और उसके संरक्षण का संदेश भी दिखाई देता है।
JAP-1 की पूजा पद्धति में कलश स्थापना का विशेष महत्व है। यहां नौ दिनों तक कलश को देवी का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है। साथ ही जौ यानी ‘जवा’ बोए जाते हैं, जो इस पारंपरिक पूजा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
इस पूजा का एक और अनोखा पहलू महानवमी की शस्त्र पूजा है। इस दिन गोरखा जवान अपनी सेवा में इस्तेमाल होने वाले हथियारों की विधिवत पूजा करते हैं। इसके साथ पारंपरिक गन सैल्यूट भी पूजा की सैन्य परंपरा को विशेष पहचान देता है।
JAP-1 की दुर्गा पूजा में धार्मिक आस्था, गोरखा संस्कृति, सैन्य अनुशासन और प्रकृति के प्रति सम्मान एक साथ देखने को मिलता है। कुमारी पूजा से लेकर फूल पाती शोभायात्रा और आगे होने वाली शस्त्र पूजा तक, यहां की हर परंपरा अपने आप में खास है।
सबसे बड़ी बात यह कि जहां अधिकांश जगहों पर दुर्गा पूजा में मां की प्रतिमा स्थापित की जाती है, वहीं JAP-1 में कलश को देवी का प्रतीक मानकर पूजा की जाती है। यही परंपरा इस पूजा को रांची की अन्य दुर्गा पूजा से अलग और विशिष्ट बनाती है।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
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