साहिबगंज: झारखंड के साहिबगंज जिले की ऐतिहासिक भूमि भोगनाडीह, जहां से शहीद सिद्धू-कान्हू ने अंग्रेजों के खिलाफ 1855 में हूल क्रांति का बिगुल फूंका था, इस वर्ष हूल दिवस के मौके पर राजनीतिक गर्माहट और टकराव का गवाह बना।
शहीद सिद्धू-कान्हू के छठे वंशज मंडल मुर्मू के नेतृत्व में लगभग 2,000 आदिवासी समर्थकों ने भोगनाडीह स्थित शहीद स्थल एवं सरकारी कार्यक्रम स्थल पर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारी पारंपरिक हथियारों — तीर-धनुष, कुल्हाड़ी, और लाठी — से लैस थे और प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे।
मंडल मुर्मू ने पूर्व में प्रशासन से हूल दिवस पर कार्यक्रम करने की अनुमति मांगी थी, लेकिन अनुमति नहीं मिलने से आदिवासी समुदाय में भारी आक्रोश फैल गया। इसी के विरोधस्वरूप सोमवार को जनसमूह ने शहीद स्थल पर पहुंचकर सरकारी कार्यक्रम का विरोध किया।
स्थिति बिगड़ने पर प्रशासन को लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े ताकि भीड़ को तितर-बितर किया जा सके। झड़प के दौरान कुछ लोगों को चोटें भी आईं, हालांकि प्रशासन ने स्थिति पर जल्द काबू पा लिया।
प्रमुख बिंदु:
- हूल दिवस पर शहीद स्थल भोगनाडीह में सरकारी कार्यक्रम का विरोध
- शहीद सिद्धू कान्हू के 6वें वंशज मंडल मुर्मू के नेतृत्व में विरोध
- 2000 से अधिक आदिवासियों की मौजूदगी
- अनुमति नहीं मिलने से नाराज होकर विरोध प्रदर्शन
- लाठीचार्ज और आंसू गैस से माहौल तनावपूर्ण
हूल दिवस जैसे ऐतिहासिक अवसर पर जहां सिद्धू-कान्हू की शहादत को श्रद्धांजलि दी जानी थी, वहां वंशजों और प्रशासन के बीच अनुमति को लेकर उत्पन्न विवाद ने इस दिन को संघर्ष का रूप दे दिया। आने वाले दिनों में इस घटना पर राजनीतिक बयानबाज़ी और कार्रवाई की संभावनाएं भी बढ़ गई हैं।












