Chaudhary Charan Singh: भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कुछ नाम ऐसे दर्ज हैं जिन्हें किसी पद या शक्ति की कसौटी पर नहीं, बल्कि उनके द्वारा किए गए वैचारिक संघर्षों और मूल्यों के आधार पर याद किया जाता है। भारत रत्न और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह एक ऐसे ही विलक्षण व्यक्तित्व थे। वे देश के सर्वोच्च पद तक तो पहुंचे, लेकिन उनकी आत्मा हमेशा गांव की पगडंडियों, हल चलाते किसानों और खेतों की मिट्टी में ही बसी रही। उनका जीवन केवल एक राजनीतिक करियर नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के स्वाभिमान और सामाजिक न्याय की एक लंबी गौरवगाथा है।
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Chaudhary Charan Singh: मेरठ की माटी और संघर्ष का आरंभ
23 दिसंबर 1902 को मेरठ के नूरपुर गांव में जन्मे चरण सिंह के व्यक्तित्व की नींव उनके ग्रामीण परिवेश ने ही रखी थी। उन्होंने देखा था कि किसान कितनी मेहनत करता है, फिर भी वह अभावों और शोषण के जाल में फंसा रहता है। आगरा कॉलेज से उच्च शिक्षा और वकालत की डिग्री हासिल करने के बाद, वे चाहते तो एक आरामदायक शहरी जीवन बिता सकते थे, लेकिन उनके भीतर किसानों की पीड़ा को दूर करने का एक जुनून था। 1929 में कांग्रेस से जुड़ने और गांधीजी के नमक सत्याग्रह में जेल जाने के साथ ही उनके सार्वजनिक जीवन का वह अध्याय शुरू हुआ, जिसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी।
कलम और कानून की ताकत-Chaudhary Charan Singh
चौधरी चरण सिंह केवल एक अच्छे वक्ता नहीं थे, बल्कि वे एक कुशल नीति-निर्माता भी थे। 1938 में उन्होंने किसानों को बिचौलियों के चंगुल से छुड़ाने के लिए कृषि उपज विपणन विधेयक पेश किया। यह उनकी दूरदर्शिता ही थी कि उन्होंने आजादी से पहले ही समझ लिया था कि जब तक किसान अपनी फसल का मालिक खुद नहीं होगा, देश प्रगति नहीं कर सकता। 1947 में उनकी पुस्तक “जमींदारी को समाप्त कैसे करें“ ने स्वतंत्र भारत में भूमि सुधारों की रूपरेखा तैयार की। 1952 में उत्तर प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन कानून का पारित होना उनके जीवन की सबसे बड़ी जीत थी, जिसने लाखों बेदखल किसानों को उनकी जमीन का मालिकाना हक दिलाया।
सिद्धांतों के पक्के थे Chaudhary Charan Singh

चौधरी साहब की राजनीति कभी भी जोड़-तोड़ की नहीं रही। वे सिद्धांतों के पक्के थे। जब उन्हें लगा कि कांग्रेस की नीतियां ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बजाय शहरी और औद्योगिक विकास की ओर अधिक झुकी हुई हैं, तो उन्होंने सत्ता का मोह त्यागने में देर नहीं लगाई। 1967 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर उत्तर प्रदेश के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। यह भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ था, जहाँ ‘किसान राजनीति’ एक संगठित शक्ति के रूप में उभरी।
1975 का आपातकाल से जननायक का उदय
1975 का आपातकाल उनके जीवन की एक और बड़ी परीक्षा थी। दो साल की जेल ने उनके हौसलों को और मजबूत किया। 1977 में जब वे रिहा हुए, तो देश के गांवों और खेतों से उठी लहर ने सत्ता परिवर्तन कर दिया। वे केंद्र सरकार में गृह मंत्री, वित्त मंत्री और फिर 1979 में देश के पांचवें प्रधानमंत्री बने। प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल संक्षिप्त जरूर था, लेकिन यह इस बात का प्रमाण था कि एक साधारण किसान का बेटा भी अपनी मेहनत और सिद्धांतों के दम पर देश की कमान संभाल सकता है।
भारत की गरीबी और इसके समाधान
चौधरी चरण सिंह का मानना था कि जातिवाद लोकतंत्र के लिए अभिशाप है। उन्होंने सरकारी नौकरियों में जाति पूछने की प्रथा को बंद करने का सुझाव दिया था। वे एक ऐसे समाज का सपना देखते थे जहाँ इंसान की पहचान उसके काम और चरित्र से हो, न कि उसकी जाति से। उनकी लिखी पुस्तकें जैसे “भारत की गरीबी और इसके समाधान” आज भी अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं।
चौधरी चरण सिंह केवल एक नेता नहीं थे, वे किसान चेतना का वह स्वर थे जिसने भारतीय लोकतंत्र को उसकी जड़ों से जोड़ा। उनका जीवन हमें सिखाता है कि राजनीति का असली अर्थ सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में बदलाव लाना है। भारत रत्न से सम्मानित यह ‘किसानों का मसीहा’ हमारे दिलों में हमेशा जीवित रहेगा।













