Lifestyle news: अगर मॉरिशियन स्ट्रीट फूड की बात करें और उसमें ‘ढोल पूरी’ का जिक्र न हो, तो बात अधूरी रह जाती है. यह सिर्फ पेट भरने वाला स्नैक नहीं, बल्कि पीढ़ियों की यादों से जुड़ी एक सांस्कृतिक कहानी है – जो हर बाइट में महसूस होती है.
साफ-सुथरी चार तहों में मोड़ी हुई, कागज में लिपटी, रौगाय (टमाटर की ग्रेवी) और मख्खन जैसी बटर बीन करी के साथ परोसी जाने वाली ढोल पूरी, मॉरिशियस की सबसे लोकप्रिय स्ट्रीट फूड में शुमार है. यह वह व्यंजन है जिसे बच्चे स्कूल में ब्रेक के दौरान खाते हैं, दफ्तर जाने वाले लोग लंच में चाव से खाते हैं और बीच पर वीकेंड पिकनिक इसकी बिना अधूरी लगती है.
भारत से मॉरिशियस तक ढोल पूरी का सफर:
ढोल पूरी की शुरुआत भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश में बनाए जाने वाले ‘दाल पूरी’ से हुई थी. 1800 के दशक के मध्य में जब ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने भारतीय मजदूरों को गन्ने के खेतों में काम करने के लिए मॉरिशियस भेजा, तो वे अपने साथ भोजन की स्मृतियाँ और पारिवारिक रेसिपी भी लेकर आए. लेकिन द्वीप की परिस्थिति और सामग्री अलग थी, तो व्यंजन को नया रूप देना पड़ा.
read more: “मैं घायल हूँ, इसलिए घातक हूँ” रणवीर सिंह की इस लाइन से सोशल मीडिया पर मची सनसनी
आटे की जगह मैदे ने ले ली, और मूंग या मसूर दाल की जगह चना दाल भरावन बन गई. साथ ही, भारत में दाल पूरी को डीप फ्राई किया जाता था, जबकि मॉरिशियस में इसे तवे पर हल्के से सेंका जाने लगा — ताकि यह नर्म, मुड़ने योग्य और लंबे समय तक ताज़ा रह सके.
ढोल पूरी बनाम दाल पूरी: क्या फर्क है?
हालांकि पहली नज़र में दोनों व्यंजन एक जैसे दिखते हैं, लेकिन इनके बीच चार अहम अंतर हैं:
- पकाने की शैली:
भारतीय दाल पूरी को तले जाते हैं, जबकि ढोल पूरी को तवे पर सेंका जाता है. - आटे का चयन:
दाल पूरी में गेहूं का आटा (आटा) इस्तेमाल होता है, जबकि ढोल पूरी में मैदा, जिससे यह अधिक समय तक नरम बनी रहती है. - भरावन का स्वाद:
ढोल पूरी की चना दाल आधारित स्टफिंग हल्की, सूखी और कम मसालेदार होती है – हल्दी, जीरा और काली मिर्च के साथ. - परोसने का तरीका:
मॉरिशियस में इसे रौगाय (टमाटर करी), बटर बीन करी और अचार (अचार्ड) के साथ परोसा जाता है. कभी-कभी लोग इसे खीर के साथ भी खाते हैं!
संस्कृति की मिसाल:
मशहूर शेफ सेलिना पेरियामे ने The Caribbean Camera में कहा, “यह इतनी नर्म होती है कि मुड़ जाए, और इतनी मजबूत कि भरावन संभाल सके – और हमेशा उंगलियों से खाने में मज़ा आता है.”
ढोल पूरी सिर्फ एक स्ट्रीट फूड नहीं, बल्कि भारतीय प्रवासी इतिहास और मॉरिशियन पहचान की कहानी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी इंडो-कैरेबियन संस्कृति पर भाषण में इसका ज़िक्र करते हुए इसे दो महाद्वीपों को जोड़ने वाला “स्वाद का पुल” बताया था.
बिहार की रसोई से लेकर मॉरिशियस की गलियों तक – ढोल पूरी इस बात का प्रमाण है कि स्वाद कैसे सीमाओं को पार कर संस्कृति और विरासत बन जाता है.












