Guru Purnima 2025: आज गुरु पूर्णिमा है- एक ऐसा दिन जब हम उन सभी को नमन करते हैं, जिन्होंने हमें कुछ सिखाया, गढ़ा और एक बेहतर इंसान बनाया. चाहे वो स्कूल के टीचर हों, माता-पिता, कोई आध्यात्मिक गुरु या ज़िंदगी के रास्ते में मिला कोई इंसान, जिसने कुछ गहरा समझा दिया.
गुरु पूर्णिमा की शुरुआत कैसे हुई?
गुरु पूर्णिमा का इतिहास हजारों साल पुराना है. माना जाता है कि इसी दिन आदिगुरु महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था. जिन्होंने वेदों का संपादन और महाभारत की रचना की. उन्हीं की स्मृति में यह दिन “व्यास पूर्णिमा” भी कहलाता है.
वेदव्यास को पहला “गुरु” माना जाता है, जिन्होंने ज्ञान को केवल अपने पास न रखकर, उसे समाज में बाँट दिया. तभी से, हर साल आषाढ़ माह की पूर्णिमा को “गुरु पूर्णिमा” मनाई जाती है.
क्या कहते हैं संत और शास्त्र?
हिंदू धर्म ही नहीं, बौद्ध धर्म में भी गुरु पूर्णिमा का विशेष स्थान है. ऐसा कहा जाता है कि गौतम बुद्ध ने बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद पहली बार अपने पांच शिष्यों को इसी दिन उपदेश दिया था. इसलिए बौद्ध अनुयायी भी इस दिन को ज्ञान और शिक्षण के पहले दिन के रूप में मनाते हैं.
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आज के दौर में गुरु कौन?
आज के दौर में गुरु का मतलब सिर्फ धार्मिक या आध्यात्मिक गुरुओं तक सीमित नहीं है. जो आपका मार्गदर्शन करे, जो आपकी सोच बदल दे, जो समय पर सच कहे, वो भी गुरु ही होता है. चाहे वो कोई दोस्त हो, कोई किताब हो या कोई ज़िंदगी का अनुभव.
लोग आज कैसे मना रहे हैं गुरु पूर्णिमा?
आज के दिन मंदिरों, आश्रमों और स्कूलों में गुरु पूजन, प्रवचन, और ध्यान-सत्र आयोजित होते हैं. सोशल मीडिया पर भी लोग अपने-अपने गुरुओं को धन्यवाद देते हैं, श्रद्धा से पोस्ट शेयर करते हैं, और कई छात्र अपने शिक्षकों से मिलते हैं.
एक छोटी सोचने वाली बात…
हर किसी को कोई न कोई रास्ता दिखाता है. ज़रूरी नहीं कि गुरु हमेशा सामने हो- कभी कोई किताब, कोई हार, या कोई ग़लती भी गुरु बन जाती है.
तो इस गुरु पूर्णिमा पर, एक पल के लिए सोचिए —
आपकी ज़िंदगी में वो कौन है जिसने आपको सही मोड़ पर सही राह दिखाई?
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