Jharkhand: झारखंड में दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। खासकर राजधानी रांची में दुर्गोत्सव की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। यहां के ऐतिहासिक पूजा स्थलों, पारंपरिक प्रतिमाओं और सार्वजनिक पूजा समितियों ने इस उत्सव को एक अलग पहचान दी है। आज रांची में दुर्गा पूजा के दौरान भव्य पंडाल, आकर्षक सजावट और श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिलती है, लेकिन इस उत्सव के पीछे कई दशकों और सदियों से जुड़ी परंपराओं की कहानी भी है।
रातू किला, मुकुंद दानी मंदिर, दुर्गाबाड़ी और हिनू के बंगाली मंडप जैसे स्थल रांची में दुर्गा पूजा के इतिहास को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन स्थानों पर पूजा की शुरुआत और परंपराओं को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक विवरण मिलते हैं। आइए जानते हैं झारखंड में दुर्गा पूजा की ऐतिहासिक यात्रा और रांची में दुर्गोत्सव कैसे शहर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बना।
झारखंड में दुर्गा पूजा का इतिहास कितना पुराना है?
झारखंड में दुर्गा पूजा के इतिहास की चर्चा करते समय रांची और उसके आसपास के पुराने पूजा स्थलों का विशेष उल्लेख किया जाता है। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, रातू किला में वर्ष 1839 से जुड़ी दुर्गा पूजा की परंपरा का उल्लेख मिलता है। वहीं, रांची की दुर्गाबाड़ी में वर्ष 1883 में सामुदायिक दुर्गा पूजा शुरू होने की जानकारी प्रकाशित हुई है।
हालांकि, रांची के डेली मार्केट क्षेत्र स्थित मुकुंद दानी मंदिर में वर्ष 1826 से मां दुर्गा की पूजा किए जाने का दावा भी हालिया रिपोर्टों में सामने आया है। इस कारण रांची की सबसे पुरानी पूजा को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं। इन परंपराओं की प्रकृति और ऐतिहासिक अभिलेखों की तुलना किए बिना किसी एक स्थान को निर्विवाद रूप से सबसे पुराना कहना उचित नहीं होगा।
इन ऐतिहासिक स्थलों की विशेषता यह है कि यहां पूजा की परंपराएं केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि स्थानीय समाज की आस्था और सांस्कृतिक जीवन से भी जुड़ती गईं।
रातू किला: रांची की ऐतिहासिक दुर्गा पूजा परंपरा का प्रमुख केंद्र
रांची से जुड़े दुर्गोत्सव के इतिहास में रातू किला का विशेष स्थान है। रातू का संबंध छोटानागपुर के नागवंशी राजपरिवार से रहा है। यहां दुर्गा पूजा की परंपरा को राजपरिवार की धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक विरासत से जोड़कर देखा जाता है। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों में रातू किला में वर्ष 1839 में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा शुरू किए जाने का उल्लेख मिलता है। इसी कारण रातू किला को रांची क्षेत्र की प्राचीन दुर्गा पूजा परंपराओं में गिना जाता है।
रातू किला की पूजा का महत्व केवल इसकी प्राचीनता तक सीमित नहीं है। यह झारखंड के ऐतिहासिक राजपरिवारों, धार्मिक परंपराओं और स्थानीय संस्कृति के बीच संबंध को भी सामने लाती है।
दुर्गा पूजा के अवसर पर रातू क्षेत्र में धार्मिक गतिविधियों और उत्सव का माहौल देखने को मिलता है। हालांकि, पूजा की शुरुआत के वर्ष और परंपरा के विभिन्न चरणों को लेकर उपलब्ध विवरणों में अंतर मिलता है, इसलिए ऐतिहासिक संदर्भों को सावधानी से समझना जरूरी है।
मुकुंद दानी मंदिर: चट्टान काटकर बने मंदिर में पूजा की परंपरा
रांची के पुराने पूजा स्थलों में मुकुंद दानी मंदिर का भी उल्लेख किया जाता है। यह मंदिर डेली मार्केट क्षेत्र में स्थित है और इसकी स्थापत्य शैली इसे अन्य पूजा स्थलों से अलग बनाती है। अक्टूबर 2026 में प्रकाशित एक समाचार रिपोर्ट के अनुसार, इस मंदिर में वर्ष 1826 से मां दुर्गा की पूजा किए जाने की परंपरा बताई जाती है। रिपोर्ट में मंदिर के चट्टान काटकर बनाए जाने का भी उल्लेख है।
मंदिर से जुड़ी यह जानकारी रांची में दुर्गा पूजा के इतिहास को एक नया दृष्टिकोण देती है। जहां रातू किला की पूजा को राजपरिवार की परंपरा से जोड़ा जाता है, वहीं मुकुंद दानी मंदिर अपनी प्राचीन धार्मिक परंपरा और स्थापत्य विशेषता के कारण चर्चा में रहता है।
इस मंदिर के इतिहास और पूजा की शुरुआत से संबंधित दावों की पुष्टि के लिए मंदिर समिति, स्थानीय इतिहासकारों और उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों का अध्ययन उपयोगी होगा।
1883 में दुर्गाबाड़ी की दुर्गा पूजा ने सामुदायिक परंपरा को दिया विस्तार
रांची की दुर्गा पूजा के इतिहास में दुर्गाबाड़ी का नाम विशेष महत्व रखता है। शहर के पुराने पूजा स्थलों में शामिल दुर्गाबाड़ी में वर्ष 1883 से पूजा होने का उल्लेख कई समाचार रिपोर्टों में मिलता है। वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद डॉ. रामरंजन सेन के हवाले से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, रांची जिला स्कूल से जुड़े संस्कृत शिक्षक गंगाचरण वेदांत और अन्य लोगों ने मिलकर दुर्गाबाड़ी में पूजा की शुरुआत की थी।
दुर्गाबाड़ी की पूजा को रांची में सामुदायिक दुर्गोत्सव के विस्तार का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। उस दौर में पूजा के आयोजन के लिए आज की तरह आधुनिक सुविधाएं, बड़े पंडाल और भव्य सजावट उपलब्ध नहीं थीं। स्थानीय लोगों और समुदाय के सहयोग से पूजा की परंपरा आगे बढ़ी। समय के साथ दुर्गाबाड़ी की पूजा रांची की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई। यहां पारंपरिक पूजा पद्धतियों और प्रतिमा स्थापना की शैली को विशेष महत्व दिया जाता है।
जिला स्कूल से शुरू हुआ सामुदायिक दुर्गोत्सव का एक और महत्वपूर्ण अध्याय
रांची में दुर्गा पूजा के विकास की चर्चा में जिला स्कूल परिसर का भी उल्लेख मिलता है। कुछ ऐतिहासिक समाचार रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 1882 में जिला स्कूल परिसर में दुर्गोत्सव आयोजित किया गया था। इसके अगले वर्ष 1883 में दुर्गाबाड़ी में पूजा शुरू होने का विवरण मिलता है।
इन आयोजनों को समझने के लिए राजपरिवार से जुड़ी पूजा और सामुदायिक पूजा के बीच अंतर करना महत्वपूर्ण है। राजपरिवार या निजी स्तर पर आयोजित धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा और स्थानीय लोगों की भागीदारी से होने वाले सार्वजनिक आयोजनों का इतिहास अलग-अलग हो सकता है। जिला स्कूल और दुर्गाबाड़ी से जुड़े विवरण बताते हैं कि रांची में दुर्गा पूजा धीरे-धीरे अधिक लोगों की भागीदारी वाला आयोजन बनती गई। हालांकि, इन ऐतिहासिक घटनाओं की सटीक समयरेखा के लिए पुराने दस्तावेजों और समकालीन अभिलेखों की पुष्टि आवश्यक है।
डोरंडा और हिनू तक कैसे पहुंची दुर्गा पूजा की परंपरा?
रांची में दुर्गा पूजा का इतिहास केवल रातू किला और दुर्गाबाड़ी तक सीमित नहीं है। शहर के अन्य इलाकों में भी पूजा समितियों और स्थानीय समुदायों ने दुर्गोत्सव की परंपरा को आगे बढ़ाया।
डोरंडा और हिनू जैसे क्षेत्रों में आयोजित दुर्गा पूजा का इतिहास रांची के सामाजिक और सांस्कृतिक विकास से जुड़ा है। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 1912 में डोरंडा के वीणापाणि क्लब की पूजा का उल्लेख मिलता है। इसके बाद वर्ष 1913 में हिनू के बंगाली मंडप में दुर्गा पूजा शुरू होने की जानकारी सामने आती है।
हिनू की पूजा की शुरुआत तत्कालीन अकाउंटेंट जनरल कार्यालय से जुड़े बंगाली कर्मचारियों और उनके परिवारों की परंपरा से जोड़ी जाती है। समय के साथ यह आयोजन आसपास के लोगों की भागीदारी के कारण और अधिक महत्वपूर्ण होता गया। इन पूजा स्थलों की कहानी यह दिखाती है कि रांची में दुर्गोत्सव का विस्तार अलग-अलग मोहल्लों, संस्थानों और समुदायों के सहयोग से हुआ।
रांची की दुर्गा पूजा में बंगाली संस्कृति का क्या है योगदान?
रांची की ऐतिहासिक दुर्गा पूजा परंपराओं में बंगाली समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। खासकर दुर्गाबाड़ी और हिनू के बंगाली मंडप जैसे पूजा स्थल बंगाली धार्मिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े हैं। दुर्गा पूजा के दौरान मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापना, पुष्पांजलि, आरती, पारंपरिक भोग और विजयादशमी के अनुष्ठान धार्मिक उत्सव का हिस्सा होते हैं। अलग-अलग पूजा समितियों में इन विधियों का स्वरूप स्थानीय परंपराओं के अनुसार भिन्न हो सकता है।
दुर्गा पूजा बंगाली समुदाय के लिए धार्मिक आस्था के साथ पारिवारिक और सामाजिक मिलन का अवसर भी है। वहीं, रांची जैसे विविध सांस्कृतिक पहचान वाले शहर में इन आयोजनों में अलग-अलग समुदायों की भागीदारी उत्सव को व्यापक सामाजिक स्वरूप देती है। इस प्रकार रांची की दुर्गा पूजा स्थानीय इतिहास और बंगाली सांस्कृतिक विरासत के मेल का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
समय के साथ कैसे बदल गया दुर्गा पूजा का स्वरूप?
रांची में दुर्गा पूजा की शुरुआती परंपराओं और आज के उत्सव के स्वरूप में काफी अंतर देखने को मिलता है। पुराने पूजा स्थलों पर धार्मिक विधियों और पारंपरिक प्रतिमाओं को महत्व दिया जाता रहा है, जबकि आधुनिक सार्वजनिक पूजा में सजावट, कलात्मक पंडाल और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रमुख आकर्षण बन गए हैं।
आज कई पूजा समितियां अलग-अलग विषयों पर आधारित पंडाल बनाती हैं। इनमें ऐतिहासिक इमारतों, भारतीय संस्कृति, सामाजिक संदेशों और कला से प्रेरित सजावट देखने को मिल सकती है। हालांकि, हर पूजा समिति की अपनी प्राथमिकताएं और परंपराएं होती हैं। आधुनिक दुर्गोत्सव में स्थानीय कारीगरों, मूर्तिकारों, सजावट से जुड़े श्रमिकों, प्रकाश व्यवस्था करने वालों और छोटे कारोबारियों को भी काम मिलता है। इस तरह त्योहार धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी जुड़ता है।
झारखंड गठन के बाद रांची की दुर्गा पूजा को मिली नई पहचान
15 नवंबर 2000 को झारखंड अलग राज्य बना और रांची इसकी राजधानी बनी। राज्य गठन के बाद रांची की पहचान प्रशासनिक केंद्र के साथ-साथ सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रमुख शहर के रूप में भी मजबूत हुई। दुर्गा पूजा यहां के सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विभिन्न इलाकों की पूजा समितियां अपनी परंपराओं के अनुसार आयोजन करती हैं। पुराने पूजा स्थलों की विरासत और नए पंडालों की रचनात्मकता मिलकर शहर के दुर्गोत्सव को विविध स्वरूप देती हैं।
हालांकि, रांची की दुर्गा पूजा की ऐतिहासिक यात्रा झारखंड गठन से बहुत पहले शुरू हो चुकी थी। रातू किला, मुकुंद दानी मंदिर, दुर्गाबाड़ी और हिनू जैसे स्थलों की परंपराएं इस लंबे इतिहास के अलग-अलग अध्याय हैं।
रांची की दुर्गा पूजा क्यों है खास?
रांची की दुर्गा पूजा की खासियत इसकी विविधता है। एक ओर पुराने मंदिरों और ऐतिहासिक पूजा स्थलों पर परंपरागत विधियों का पालन किया जाता है, तो दूसरी ओर सार्वजनिक पंडालों में आधुनिक कला और सजावट देखने को मिलती है।
यहां दुर्गोत्सव धार्मिक आस्था, पारिवारिक परंपरा, सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय संस्कृति को एक साथ जोड़ता है। पुराने पूजा स्थलों का इतिहास यह समझने में मदद करता है कि किस तरह एक धार्मिक आयोजन समय के साथ शहर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन सकता है।
रांची की दुर्गा पूजा को समझने के लिए केवल बड़े पंडालों और आकर्षक सजावट पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे मौजूद ऐतिहासिक परंपराओं, स्थानीय समुदायों के योगदान और पूजा समितियों की भूमिका को भी समझना जरूरी है।
झारखंड में दुर्गा पूजा का इतिहास राज्य की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। रांची के रातू किला, मुकुंद दानी मंदिर, दुर्गाबाड़ी और हिनू के बंगाली मंडप जैसे पूजा स्थलों से जुड़ी परंपराएं इस इतिहास को अलग-अलग दृष्टिकोण से सामने लाती हैं। जहां रातू किला की पूजा को राजपरिवार की धार्मिक परंपरा से जोड़ा जाता है, वहीं दुर्गाबाड़ी और अन्य पूजा स्थलों का इतिहास सामुदायिक भागीदारी के विकास को दर्शाता है। समय के साथ दुर्गोत्सव ने पारंपरिक पूजा पद्धतियों और आधुनिक उत्सव शैली के बीच संतुलन बनाया है।
आज रांची की दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि शहर की ऐतिहासिक स्मृति, सामाजिक एकजुटता और सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक भी है। इस विरासत को समझना और संरक्षित रखना आने वाली पीढ़ियों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
कंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।







