Jharkhand: जमशेदपुर के उद्योगपति देवांग गांधी के बेटे कैरव गांधी के अपहरण की परतें अब धीरे-धीरे खुल रही हैं। पुलिस के सामने दिए गए बयान में कैरव ने उन 13 खौफनाक दिनों का पूरा घटनाक्रम बताया है, जब वह शातिर अपराधियों के कब्जे में था।
कैसे हुआ अपहरण?
13 जनवरी को कैरव गांधी अपने घर से कार्यालय के लिए निकले थे। घर से कुछ ही दूरी पर लिंक रोड गोलचक्कर के पास एक कार ने उनका रास्ता रोक लिया। कार में सवार लोगों ने खुद को पुलिसकर्मी बताया और कहा कि एक हत्या के मामले में पूछताछ करनी है। जैसे ही कैरव उनकी कार में बैठे, अपहरणकर्ताओं ने उनके चेहरे पर मास्क लगा दिया और आंखों पर पट्टी बांध दी, ताकि उन्हें यह पता न चल सके कि उन्हें कहां और किस रास्ते से ले जाया जा रहा है।
रास्ते में खाना, फिर लंबा सफर
अपहरण के बाद रास्ते में सभी ने दोपहर का खाना खाया, जिससे कांदरबेड़ा से बुंडू टोल पहुंचने में करीब दो घंटे लग गए। इसके बाद कार खूंटी, कर्रा और डाल्टनगंज होते हुए बिहार की ओर रवाना हुई। बिहार पहुंचने के बाद कैरव को एक कमरे में रात भर रखा गया।
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फिरौती की पहली कोशिश
इसी ठिकाने से 13 जनवरी की रात करीब 8 बजे अपहरणकर्ताओं ने कैरव के पिता देवांग गांधी और उनके चाचा को फिरौती के लिए कॉल किया, लेकिन कॉल रिसीव नहीं हो सकी। इसके बाद व्हाट्सएप मैसेज भेजकर फिरौती की मांग की गई।
13 दिन, तीन ठिकाने
पुलिस के अनुसार, अपहरणकर्ताओं ने कैरव को 13 दिनों के दौरान तीन अलग-अलग ठिकानों पर रखा। सुरक्षा कारणों से वे अक्सर रात के समय ही ठिकाना बदलते थे। हर बार स्थान बदलते वक्त कैरव की आंखों पर पट्टी बांध दी जाती थी, ताकि वह किसी जगह की पहचान न कर सके।
मानसिक दबाव, लेकिन खान-पान का ध्यान
कैरव ने बताया कि अपहरणकर्ताओं ने उसके खान-पान का पूरा ध्यान रखा। उसे बड़े और नामी होटलों का खाना खिलाया जाता था। साथ ही मानसिक दबाव बनाने के लिए समय-समय पर परिजनों से फोन पर बात भी कराई जाती थी, ताकि फिरौती को लेकर दबाव बना रहे।
हाईवे पर छोड़कर फरार हुए अपहरणकर्ता
26 जनवरी की देर रात अचानक हालात बदले। जमशेदपुर पुलिस की तीन एसआईटी टीम पिछले चार दिनों से झारखंड-बिहार बॉर्डर पर डटी हुई थी। कोडरमा, हजारीबाग और बरही इलाके में पुलिस को काले रंग की संदिग्ध कार की गतिविधियों की सूचना मिली। जैसे ही पुलिस ने कार को घेरने की कोशिश की, अपराधी घबरा गए। पुलिस को देखकर उन्होंने कैरव गांधी को हाईवे पर कार से बाहर ढकेल दिया और मौके से फरार हो गए। सड़क पर गिरे कैरव को पुलिस ने संभाला और सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया।
क्यों सफल हुआ रेस्क्यू?
पुलिस का मानना है कि अपहरणकर्ता कैरव को ज्यादा दिनों तक एक ही जगह नहीं रख सकते थे। इसी दौरान एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते समय पुलिस को उसे बरामद करने का मौका मिल गया। बिहार पुलिस भी इस अपहरण कांड की तलाश में लगी हुई थी और स्थानीय लोगों से कार की आवाजाही की सूचनाएं मिल रही थीं।
फिरौती की रकम पर सस्पेंस
कैरव गांधी की रिहाई के बाद यह चर्चा तेज है कि अपहरणकर्ताओं ने 10 करोड़ रुपये की फिरौती मांगी थी। हालांकि, इसकी पुष्टि न तो कैरव के परिजनों ने की है और न ही पुलिस ने। पुलिस का साफ कहना है कि अगर फिरौती दी गई है तो इसकी कोई आधिकारिक जानकारी उनके पास नहीं है।
फिलहाल, कैरव गांधी सुरक्षित हैं और पुलिस इस पूरे अपहरण कांड में शामिल अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी तेज कर चुकी है। यह मामला न सिर्फ अपराधियों की शातिराना साजिश को उजागर करता है, बल्कि पुलिस की रणनीतिक निगरानी और धैर्यपूर्ण कार्रवाई को भी सामने लाता है।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
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