महाशिवरात्रि 2026: महाशिवरात्रि केवल एक व्रत या उत्सव नहीं, बल्कि भगवान शिव की उपासना का सबसे पवित्र और रहस्यमय पर्व माना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने वैराग्य जीवन त्यागकर माता पार्वती के साथ विवाह कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था। वहीं एक अन्य मान्यता के अनुसार महाशिवरात्रि की रात्रि में शिवजी ज्योतिर्लिंग, अर्थात अग्नि के अनंत स्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे। कहा जाता है कि इसी दिन 64 स्थानों पर शिवलिंग प्रकट हुए, इसलिए यह रात्रि साधना, उपासना और आत्मजागरण की मानी जाती है।
वेदों और आगमों में शिव को विशुद्ध ज्ञानस्वरूप, अनंत और परब्रह्म कहा गया है। वे सृष्टि के मूल कारण, रक्षक और नियंता हैं, इसलिए उन्हें महेश्वर भी कहा जाता है। शिव का न आदि है और न अंत—वे अनादि और अनंत हैं। महाशिवरात्रि उसी अनंत चेतना के प्राकट्य का पर्व है।
शिवलिंग की पूजा का क्या अर्थ है?
शिवलिंग केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि सृष्टि के मूल तत्व का द्योतक है। शिवपुराण में वर्णित कथा के अनुसार, जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ, तब शिवजी ने एक दिव्य ज्योति स्तंभ का रूप धारण किया। न ब्रह्मा उसका अंत खोज पाए, न विष्णु उसका आदि। तब दोनों को शिव के परब्रह्म स्वरूप का ज्ञान हुआ। यही अनंत ज्योति शिवलिंग के रूप में पूजित है। शिवलिंग की पूजा का अर्थ है निराकार, सर्वव्यापी और सृजन के मूल तत्व की आराधना।
महाशिवरात्रि की रात देशभर के शिवालयों में जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक और रुद्राभिषेक होते हैं। भक्त पूरी श्रद्धा से शिव-पार्वती की संयुक्त पूजा करते हैं, क्योंकि मान्यता है कि इस दिन की गई आराधना जीवन की बाधाओं को दूर करती है और सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है।
पूजा में किन बातों का रखा जाता है विशेष ध्यान?
महाशिवरात्रि के दिन स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण किए जाते हैं और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पूजा की जाती है। शिवजी को बिल्वपत्र अत्यंत प्रिय है, लेकिन टूटा हुआ पत्र अर्पित नहीं किया जाता। आक, धतूरा और नीलकमल भी विशेष रूप से चढ़ाए जाते हैं।
कुछ महत्वपूर्ण बातें जिनका ध्यान रखा जाता है:
- शिव पूजा में तिल और चंपा का फूल अर्पित नहीं किया जाता।
- शिव की परिक्रमा पूर्ण नहीं की जाती, जल निकासी वाली दिशा का उल्लंघन वर्जित है।
- भस्म, त्रिपुंड और रुद्राक्ष धारण करना शुभ माना जाता है।
कैसी थी शिवजी की अनोखी बारात?
शिव-पार्वती विवाह का वर्णन रामचरितमानस के बालकांड में मिलता है। विवाह वैदिक रीति से हुआ, लेकिन शिवजी की बारात अत्यंत विचित्र और अद्भुत थी।
शिवजी मस्तक पर चंद्रमा, जटाओं में गंगा, गले में विष और नरमुंडों की माला धारण किए, हाथ में त्रिशूल और डमरू लिए नंदी बैल पर सवार होकर चले। उनके साथ भूत, प्रेत, पिशाच और योगिनियों की टोली थी। किसी के कई मुख थे, कोई बिना हाथ-पैर का था, कोई अत्यंत दुबला तो कोई अत्यंत विशालकाय। यह दृश्य देखकर हिमालय नगरी में भय और आश्चर्य का वातावरण बन गया।
माता मैना अपनी पुत्री पार्वती के भविष्य को लेकर व्याकुल हो उठीं। नगरवासी भी घबरा गए। तब देवर्षि नारद ने शिव के वास्तविक स्वरूप और उनकी दिव्यता का वर्णन किया। उन्होंने समझाया कि शिव केवल भस्मधारी योगी नहीं, बल्कि स्वयं परब्रह्म हैं। अंततः पर्वतराज हिमालय ने वैदिक मंत्रों के साथ पार्वती का पाणिग्रहण शिवजी को सौंपा और यह दिव्य विवाह संपन्न हुआ।
क्यों खास है महाशिवरात्रि की रात्रि?
महाशिवरात्रि आत्मसंयम, तप और भक्ति का पर्व है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अहंकार के त्याग और आत्मचिंतन की रात्रि है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से की गई उपासना अनेक जन्मों के पापों का नाश करती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
महाशिवरात्रि हमें यह संदेश देती है कि शिव केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि हर जीव में, हर चेतना में और स्वयं हमारे भीतर विराजमान हैं। यही इस पावन पर्व का सबसे बड़ा आध्यात्मिक महत्व है।












