Rims: बीते दिनों राजेन्द्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स), रांची, का एक वीडियो वायरल हुआ…! वायरल वीडियो में मरीज के परिजनों के साथ रिम्स के कर्मचारी दुर्व्यवहार करते दिखाई दिये…! उसके अगले दिन मरीज की मौत हो गयी…! जाहिर है कि समय पर इलाज अगर मिल जाता, डॉक्टर उपलब्ध होते तो शायद मरीज की जान बचाई जा सकती थी। कहने को रिम्स झारखंड का सबसे बड़ा और प्रतिष्ठित सरकारी अस्पताल है, जो चिकित्सा शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध कराता है। यह न केवल झारखंड, बल्कि बिहार, छत्तीसगढ़, ओड़िशा और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों के मरीजों के लिए भी जीवनरेखा है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस संस्थान से लोगों को चिकित्सा की सर्वाेत्तम सुविधा की अपेक्षा है, वहीं सबसे अधिक अव्यवस्थित है, यहां से अक्सर संसाधनों की कमी और लचर संचालन की शिकायतें सामने आती हैं।
हमारे फोटोग्राफर समीर हेजाजी ने रिम्स की व्यवस्थाओं को लेकर जो अपने कैमरे में तस्वीरें कैद की हैं। ये तस्वीरें इस बात की गवाह हैं कि राज्य का स्वास्थ्य विभाग भले ही क्वालिटी हेल्थ केयर सिस्टम का दावा करे लेकिन मरीजों की परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही है…! टूटे फूट फर्श, टेबुल की बैशाखी पर मरीजों के बेड, सरकारी दवा दुकान में कतारबद्ध खड़े लोग, रजिस्ट्रेशन के लिए लंबी कतारें, डॉक्टर्स की अनुपलब्धता, जांच के लिए घंटों लाईन लगे मरीज…, कंडम हो चुके स्ट्रेचर, धूल फांकती एम्बूलेंस… बरामदे में मरीजों का इलाज..सीढ़ियों का टूटा हुआ सपोर्ट सिस्टम..! इसके अलावा सैंकड़ों ऐसी समस्याएं हैं जिन्हें रिम्स प्रशासन और राज्य का स्वास्थ्य विभाग अनदेखा कर उपलब्धियों का बखान करता रहता है…!
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रिम्स अस्पताल एक ऐसा संस्थान है, जिसकी सफलता झारखंड की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की दिशा और दशा तय करती है। यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति, जनभागीदारी और पारदर्शिता के साथ इसकी व्यवस्था को सुधारा जाए, तो यह न केवल एक आदर्श चिकित्सा संस्थान बन सकता है, बल्कि पूर्वी भारत में सरकारी स्वास्थ्य सेवा का एक मॉडल भी स्थापित कर सकता है। जरूरत है केवल ईमानदारी से नीति बनाने और उस पर निष्ठा से अमल करने की।
तस्वीरों में समस्याओं को ऐसे समझिएः
भीड़ और इंतजार की पीड़ा
रोजाना रिम्स में 5000 से अधिक मरीज ओपीडी सेवाओं के लिए पहुंचते हैं। लेकिन पंजीकरण काउंटर से लेकर डॉक्टर से परामर्श, जांच और दवा वितरण तक हर जगह लंबी कतारें लगती हैं। बुजुर्ग, दिव्यांग और दूर-दराज से आए गरीब मरीज घंटों लाइन में खड़े रहने को मजबूर होते हैं। इनमें से कई को बिना इलाज के ही लौटना पड़ता है।

विशेषज्ञ डॉक्टरों की अनुपलब्धता
कई विभागों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या कम है। मौजूद डॉक्टरों के ओपीडी में समय पर न बैठने, जल्दी निकल जाने या निजी प्रैक्टिस को प्राथमिकता देने की शिकायतें आम हैं। यह स्थिति मरीजों में असंतोष और अविश्वास को जन्म देती है। डॉक्टरों के अनुपलब्ध रहने के कारण मरीजों को जबरन बाहर रेफर किया जाता है, जिससे गरीब वर्ग को निजी इलाज का आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है।
जांच और दवा की असुविधा
अस्पताल के भीतर जरूरी जांचों की सुविधा सीमित है। कई बार एमआरआई, सीटी स्कैन, सोनोग्राफी जैसी मशीनें खराब रहती हैं या संचालन के लिए तकनीशियन अनुपलब्ध होते हैं। मरीजों को मजबूरी में बाहर के निजी लैब में जांच करानी पड़ती है। साथ ही, अस्पताल की फार्मेसी में आवश्यक दवाएं अक्सर अनुपलब्ध होती हैं, जिससे मरीजों को महंगी दवाएं बाजार से खरीदनी पड़ती हैं।
सफाई और स्वच्छता की गिरती स्थिति
जनरल वार्डों और शौचालयों की हालत दयनीय है। गंदगी, कचरे के ढेर और संक्रमित वातावरण में मरीजों को रहना पड़ता है। संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। वार्डों में नियमित सफाई का कोई ठोस तंत्र नहीं है। कई बार गंदगी से ही मरीजों की हालत बिगड़ जाती है।
दलालों और बिचौलियों का सक्रिय नेटवर्क
रिम्स में बाहरी दलालों का एक संगठित नेटवर्क सक्रिय है, जो मरीजों को भ्रमित कर निजी अस्पतालों और क्लीनिकों की ओर ले जाता है। यह न केवल मरीजों का आर्थिक शोषण करता है, बल्कि रिम्स की प्रतिष्ठा को भी धूमिल करता है। सुरक्षा कर्मी और प्रशासन इस गतिविधि पर प्रभावी नियंत्रण नहीं कर पा रहा है।
डिजिटल प्रणाली की कमी
आज जब देश डिजिटल स्वास्थ्य मिशन की ओर बढ़ रहा है, रिम्स में अभी भी पंजीकरण, रिपोर्ट वितरण, मरीजों की फाइलें और ओपीडी प्रबंधन मैनुअल तरीके से होते हैं। इससे न केवल प्रक्रिया धीमी होती है, बल्कि कागजों में गड़बड़ियां और रिपोर्टों के गुम होने जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं।

नेतृत्व में अनिश्चितता और अनुभवहीनता
रिम्स जैसे संस्थान को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए अनुभवी और दीर्घकालिक नेतृत्व आवश्यक है, लेकिन कई बार निदेशक या अधीक्षक के पद पर अस्थायी नियुक्तियां होती हैं। इससे संस्थान में दीर्घकालिक योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं हो पाता।
जवाबदेही और पारदर्शिता का अभाव
चिकित्सा, नर्सिंग और प्रशासनिक स्टाफ की कार्यप्रणाली पर निगरानी रखने का कोई ठोस तंत्र नहीं है। उपस्थिति प्रणाली लचीली है, और जवाबदेही तय नहीं की जाती। लापरवाही के मामलों में कोई सख्त कार्रवाई न होने से अनुशासनहीनता पनपती है।
बजट और संसाधनों का कुशल प्रबंधन
रिम्स को राज्य सरकार से पर्याप्त बजट प्राप्त होता है, लेकिन उसका उपयोग कहां और कैसे हो रहा है, यह एक बड़ा प्रश्न है। उपकरणों की खरीद में अनियमितता, निर्माण कार्यों में देरी और ठेकेदारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार की शिकायतें सामने आती रही हैं।

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संभावित समाधान और नीतिगत सुझाव
1. डिजिटल हेल्थ मैनेजमेंट सिस्टम लागू किया जाए, जिससे पंजीकरण से लेकर रिपोर्ट वितरण और डॉक्टर अपॉइंटमेंट तक सारी सेवाएं ऑनलाइन हो सकें।
2. विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपस्थिति बायोमेट्रिक प्रणाली से सुनिश्चित की जाए और अनुपस्थित रहने पर वेतन कटौती जैसी सख्त कार्रवाई की व्यवस्था हो।
3. फार्मेसी में सभी आवश्यक जेनेरिक दवाएं मुफ्त उपलब्ध कराई जाएं और स्टॉक प्रबंधन में पारदर्शिता लाई जाए।
4. स्वच्छता कार्यों को निजी एजेंसियों को सौंपकर निगरानी के लिए स्वतंत्र निगरानी समिति बनाई जाए।
5. रोगी सहायता केंद्र को सशक्त किया जाए, जिससे मरीजों को विभागों के बीच दौड़ने की आवश्यकता न हो।
6. शिकायत निवारण प्रणाली को डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए, जहां हर शिकायत का ऑनलाइन ट्रैकिंग नंबर हो और समाधान की समयसीमा तय हो।












