रांची: झारखंड की राजनीति में इन दिनों धानरोपनी नया ट्रेंड बन चुकी है, लेकिन असल खेती से ज्यादा यह अब फोटोसेशन फेस्टिवल लगने लगी है। खेतों में कीचड़, हाथ में धान की पौध और पीठ पीछे कैमरा बस तैयार हो गया ‘वायरल पोस्ट’। मंत्री, विधायक, नेता प्रतिपक्ष से लेकर अधिकारी तक सभी ने खेतों की ओर रुख तो किया, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह असली खेत की मेहनत थी या बस सोशल मीडिया की खेती?
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क्या फॉलोअर्स उगाने निकले है नेता
सीज़न है धान रोपने का, लेकिन मंजर कुछ ऐसा है जैसे कैमरा ऑन हुआ और माननीय धानरोपनी मुद्रा में उतर आए। रोपो… रोपो… का नारा, हल्की मुस्कान और बिल्कुल सही एंगल – मानो फसल नहीं, फॉलोअर्स उगाने निकले हों। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस कैमरा खेती की शुरुआत की और फिर तो पूरी राजनीतिक जमात ही पीछे-पीछे चल दी।
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अगली बार किसान ही कहेंगे छान छोड़ो कैमरा पकड़ो
हालांकि असल सवाल यह है कि क्या कभी इन चेहरों ने धान की असली समस्याओं की ओर देखा है? न सिंचाई की दिक्कत पर बात, न बीज वितरण की पारदर्शिता पर चर्चा, न ही खाद और फसल बीमा को लेकर कोई गंभीर संवाद। जिस मिट्टी से जुड़ने की बात ये नेता मंचों से करते हैं, उसी मिट्टी में खड़े होकर जब किसान परेशान होते हैं, तो कैमरे गायब और अफसर-नेता मौन हो जाते हैं। खेत में पैर डालना आसान है, लेकिन किसान की जिंदगी समझना नहीं। धान की रोपनी कोई इवेंट नहीं, वह किसान की रोज़मर्रा की जंग है—जिसका सम्मान होना चाहिए, मजाक नहीं। फिलहाल सरकार इस पब्लिसिटी खेती से आगे बढ़े और धरातल पर खड़ी समस्याओं की जड़ों में पानी डाले। वरना अगली बार किसान भी कहेंगे – धान छोड़ो, कैमरा पकड़ो!













