Bollywood news: नए सीजन में, ‘लौकी’ (Bottle Gourd) का चुनावी प्रतीक बनता है मनजू देवी (नीना गुप्ता) के लिए, जबकि उनकी प्रतिद्वंद्वी क्रांति देवी (सुनिता राजवार) अपना प्रतीक ‘प्रेशर कुकर’ चुनती हैं. हालांकि यह चुनावी संघर्ष पहले की तरह गांव की सरलता और चतुराई को दर्शाता हुआ लगता है, लेकिन धीरे-धीरे यह सब कुछ ओवरकुक्ड यानी ज्यादा बढ़ा-चढ़ा हुआ प्रतीत होता है.
पिछला सीजन लड़ाई, झगड़ा और विवाद के साथ खत्म हुआ था, जब पंचायत चुनाव की तारीखों का ऐलान हुआ था. चुनावों से पहले का उथल-पुथल भारतीय राजनीति का आम हिस्सा बन चुका है. इस सीजन में भी मनजू देवी और क्रांति देवी के बीच प्रधानी के चुनाव को लेकर तनाव चरम पर है. उनके समर्थक और सहयोगी एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश में लगे हुए हैं, जिससे फुलेरा गांव की शांतिपूर्ण और आर्दश जीवनशैली जैसे अब अतीत की बात लगने लगी है.
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पहले सीजन में गांव की सादगी, विवाद और हास्य था
सीरीज की शुरुआत एक दिल छूने वाली कहानी से हुई थी, जिसमें अभिषेक त्रिपाठी (जीतेन्द्र कुमार), जो MBA की तैयारी कर रहे होते हैं, फुलेरा पंचायत के सचिव की नौकरी संभालते हैं. मनजू देवी पंचायत की चुनी हुई प्रधान होती हैं, लेकिन असल सत्ता उनके पति प्रधानजी (रघुबीर यादव) के हाथों में होती है. पहले सीजन में गांव की सादगी, विवाद और हास्य के बीच यह सीरीज बहुत ही ताजगी से भरी हुई थी, जो ग्रामीण जीवन की वास्तविकताओं को बहुत अच्छे से दिखाती थी.
महिलाएं सिर्फ एक बैकग्राउंड भूमिका में सिमट गई
लेकिन जैसे-जैसे सीरीज का विस्तार हुआ, उसके साथ ही किरदारों के विकास में कमी महसूस होने लगी. पहले सीजन के मुकाबले अब प्रधानजी, सचिवजी, विकास (चंदन रॉय) और प्रहलाद (फैसल मलिक) जैसे किरदारों की भूमिका अधूरी सी लगने लगी है. महिला किरदार, जो कभी अपनी पहचान बनाने की ओर बढ़ रहे थे, अब पुरुष किरदारों के मुकाबले कहीं पीछे रह गए हैं. मनजू देवी, जो अब तक अपनी प्रधान पद की सशक्त दावेदार दिख रही थीं, अब तक एक बैकग्राउंड भूमिका में सिमट कर रह गई हैं.
इसी तरह, क्रांति देवी का किरदार अब पहले की तरह ताकतवर और दमदार नहीं लग रहा. पहले सीजन में जो कड़ी टकराव, स्लीपर के आदान-प्रदान जैसी घटनाएँ दिलचस्प और प्रभावशाली थीं, उनका अब वैसा कोई प्रभाव नहीं दिखाई देता. रिंकू और सचिवजी के बीच रोमांटिक पल भी अब जैसे किसी विचारहीनता का हिस्सा बनकर रह गए हैं, जिनका समावेश सिर्फ कहानी की प्रगति के लिए किया गया है.
सीरीज का स्केल पहले सीजन से बड़ा जरूर हुआ है, लेकिन क्या यह ड्रामा को और भी आकर्षक बना पाया है? इसका जवाब कुछ निराशाजनक है. पहले जहाँ पंचायत की कहानी सहजता, हास्य और सजीव किरदारों के साथ एक ताजगी लेकर आई थी, अब वही कहानी थोड़ी बोझिल और अतिरंजित लगने लगी है.
पंचायत की शुरुआत एक सरल और दिलचस्प ग्रामीण ड्रामा के रूप में हुई थी, जो शहरी दर्शकों के लिए भी समझ में आने योग्य था. लेकिन अब इस बदलाव के बाद, फुलेरा की वह दुनिया जैसे टूट-सी गई है, और यह बदलाव कुछ सकारात्मक नहीं प्रतीत होता.













