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पद नहीं, परिवार की ताकत थीं रूपी सोरेन, जानिए उनकी अनकही कहानी

रूपी सोरेन कौन थीं? शिबू सोरेन की पत्नी और हेमंत सोरेन की मां के रूप में उनकी जिंदगी, परिवार, राजनीतिक सफर और सोरेन परिवार में उनकी खास भूमिका की पूरी कहानी पढ़ें।

अक्टूबर 7, 2026
in झारखंड Jharkhand News
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शिबू सोरेन और रूपी सोरेन एक कार्यक्रम में साथ बैठे हुए, ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर

रूपी सोरेन और शिबू सोरेन की एक पुरानी तस्वीर, सोरेन परिवार के साथ उनके लंबे सफर की याद दिलाती है।

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समय: ~17 मिनट•हिंदी बुलेटिन

कुछ लोग अपने पद से पहचाने जाते हैं।
कुछ लोग अपने नाम से।
और कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान किसी कुर्सी या ओहदे से नहीं, बल्कि उन रिश्तों से बनती है जिन्हें उन्होंने पूरी जिंदगी संभाला।

Table of Contents

Toggle
  • कैमरे के सामने नहीं, परिवार के बीच थीं
  • सिर्फ नेता की पत्नी नहीं थीं, खुद भी चुनावी मैदान में उतरी थीं
  • एक तरफ आंदोलन, दूसरी तरफ घर
  • हेमंत सोरेन के लिए वह सिर्फ मां नहीं थीं
  • रूपी सोरेन की कहानी में एक और अनसुना अध्याय
  • परिवार बड़ा होता गया, लेकिन रिश्ते जुड़े रहे
  • मुश्किल समय में मां का साथ
  • बेटे की सफलता देखने वाली मां
  • और फिर आया आखिरी दौर
  • कुछ लोग चले जाते हैं, लेकिन घर में रह जाते हैं
  • पद नहीं, परिवार की ताकत थीं

रूपी सोरेन ऐसी ही एक शख्सियत थीं।

📌 यह भी पढ़ें:
  • मां रूपी सोरेन की जिंदगी से सीखिए वो बातें, जो शायद हमें बहुत देर से समझ आती हैं
  • झारखंड में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल, 9 अधिकारियों की नई पोस्टिंग; जानें किसे कहां भेजा गया
  • रांची में भाजपा ने पीएम मोदी का संबोधन सुना, सेवा ज्योति यात्रा निकाली

7 अक्टूबर 2026 को जब उनके निधन की खबर सामने आई, तो झारखंड की राजनीति में शोक की लहर दौड़ गई। लेकिन इस खबर के साथ सिर्फ एक राजनीतिक परिवार ने अपनी मां को नहीं खोया, बल्कि उस घर की एक ऐसी कड़ी चली गई, जो दशकों से परिवार के सुख-दुख की गवाह रही थी।

रूपी सोरेन की पहचान सबसे पहले शिबू सोरेन की पत्नी और हेमंत सोरेन की मां के रूप में सामने आती है। लेकिन उनकी कहानी सिर्फ इतनी नहीं थी।

झारखंड मुख्य समाचार एवं विश्लेषण
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क्योंकि जिस परिवार का नाम झारखंड की राजनीति में दशकों से सुनाई देता रहा, उसकी निजी दुनिया का एक बड़ा हिस्सा रूपी सोरेन के आसपास भी था।

कैमरे के सामने नहीं, परिवार के बीच थीं

शिबू सोरेन का नाम झारखंड आंदोलन और राज्य की राजनीति के साथ जुड़ा रहा। बाद में उनके बेटे हेमंत सोरेन ने भी राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई और झारखंड के मुख्यमंत्री बने।

लेकिन इन बड़े राजनीतिक नामों के बीच रूपी सोरेन की सार्वजनिक मौजूदगी हमेशा अपेक्षाकृत कम रही।

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यही शायद उनकी कहानी को और खास बनाता है।

2024 में टाइम्स ऑफ इंडिया ने रूपी सोरेन पर एक प्रोफाइल प्रकाशित की थी। उसमें उन्हें सोरेन परिवार के रिश्तों को जोड़कर रखने वाली महत्वपूर्ण शख्सियत के रूप में बताया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन किसी बड़े राजनीतिक मौके से पहले अपने माता-पिता से मिलने जाते थे।

सोचिए…

एक तरफ राज्य की राजनीति के बड़े फैसले होते थे।
दूसरी तरफ उसी परिवार में एक मां-बाप का घर था, जहां बेटे के लिए राजनीति से पहले रिश्ता मायने रखता था।

यही रूपी सोरेन की कहानी का सबसे खूबसूरत हिस्सा है।

सिर्फ नेता की पत्नी नहीं थीं, खुद भी चुनावी मैदान में उतरी थीं

रूपी सोरेन की जिंदगी का एक ऐसा पहलू भी है, जिसके बारे में शायद बहुत कम लोग जानते हैं।

वह खुद चुनाव लड़ चुकी थीं।

1999 में उन्होंने अविभाजित बिहार की दुमका लोकसभा सीट से झामुमो उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था। चुनाव में उन्हें 1,96,493 वोट मिले, जबकि बाबूलाल मरांडी को 2,01,141 वोट मिले। यानी मुकाबला महज 4,648 वोटों का था। भारत निर्वाचन आयोग के उपलब्ध रिकॉर्ड में भी यह आंकड़ा दर्ज है।

यानी जिस महिला को आज ज्यादातर लोग हेमंत सोरेन की मां के रूप में जानते हैं, वह कभी खुद भी राजनीति के मैदान में उतर चुकी थीं।

वह चुनाव नहीं जीत सकीं, लेकिन यह कहानी उनके व्यक्तित्व का एक अलग पहलू सामने लाती है।

वह केवल राजनीति करने वाले परिवार का हिस्सा नहीं थीं।
एक समय उन्होंने खुद भी जनता के बीच जाकर चुनाव लड़ा था।

बाद में उन्होंने दोबारा चुनावी राजनीति में सक्रिय भूमिका नहीं निभाई।

एक तरफ आंदोलन, दूसरी तरफ घर

शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन आसान नहीं था।

झारखंड आंदोलन के शुरुआती दौर से लेकर झामुमो की राजनीति और फिर सत्ता तक पहुंचने के सफर में उन्होंने लंबा समय सार्वजनिक जीवन में बिताया।

उनके परिवार की कहानी भी इसी दौर में आगे बढ़ रही थी।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, शिबू सोरेन और रूपी सोरेन के चार बच्चे थे, जिनमें दुर्गा सोरेन, हेमंत सोरेन, बसंत सोरेन और अंजनी सोरेन शामिल हैं।

ऐसे परिवार में बच्चों की परवरिश सिर्फ घर की सामान्य जिम्मेदारी नहीं रही होगी, क्योंकि पिता की जिंदगी लगातार राजनीति और आंदोलन से जुड़ी हुई थी।

हेमंत सोरेन के बचपन से जुड़ी रिपोर्टों में भी उनके परिवार और पिता की राजनीतिक व्यस्तताओं का जिक्र मिलता है।

और यहीं मां की भूमिका सामने आती है।

झारखंड मुख्य समाचार एवं विशेष रिपोर्ट
Special Report

क्योंकि बच्चा जब बड़ा होता है, तो उसे सिर्फ पिता की उपलब्धियां याद नहीं रहतीं। उसे याद रहता है कि मुश्किल वक्त में उसके साथ कौन खड़ा था।

हेमंत सोरेन के लिए वह सिर्फ मां नहीं थीं

हेमंत सोरेन आज झारखंड के मुख्यमंत्री हैं।

लेकिन राजनीति में पहुंचने से बहुत पहले वह इसी परिवार के बेटे थे।

रूपी सोरेन के लिए भी वह मुख्यमंत्री नहीं, उनका बेटा थे।

यही रिश्ता शायद सबसे खूबसूरत है।

राजनीति में हेमंत सोरेन के सामने कितनी भी बड़ी चुनौती क्यों न रही हो, घर लौटने पर वह उसी मां के बेटे थे, जिसने उन्हें बचपन से देखा था।

2024 में टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में हेमंत सोरेन ने अपने माता-पिता को लेकर कहा था कि बेटे के रूप में उनकी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि वे स्वस्थ रहें और राजनीतिक हलचल से दूर रहें।

यह छोटी-सी बात बहुत कुछ कह जाती है।

राजनीति में चाहे कितनी भी ऊंचाई क्यों न मिल जाए, मां-बाप के सामने इंसान आखिरकार बेटा या बेटी ही रहता है।

रूपी सोरेन की कहानी में एक और अनसुना अध्याय

रूपी सोरेन की जिंदगी सिर्फ परिवार संभालने तक सीमित नहीं रही।

1999 का चुनाव इसका प्रमाण है।

उस चुनाव में वह दुमका से बाबूलाल मरांडी के खिलाफ मैदान में थीं। वह बहुत कम अंतर से चुनाव हार गईं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक दोनों के बीच सिर्फ 4,648 वोटों का अंतर था।

बाद में उन्होंने खरसावां विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा भी जताई थी, हालांकि वह चुनाव नहीं लड़ सकीं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में इसका उल्लेख है।

यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे रूपी सोरेन की छवि केवल “राजनेता की पत्नी” वाली नहीं रह जाती।

उनके अंदर खुद भी राजनीतिक इच्छा और सार्वजनिक जीवन में आने की आकांक्षा थी।

लेकिन समय के साथ उनकी प्राथमिकताएं परिवार की ओर अधिक दिखाई देने लगीं।

परिवार बड़ा होता गया, लेकिन रिश्ते जुड़े रहे

सोरेन परिवार के राजनीतिक सफर में कई बड़े मोड़ आए।

शिबू सोरेन झारखंड की राजनीति के सबसे चर्चित नेताओं में रहे।

दुर्गा सोरेन राजनीति में सक्रिय हुए।

हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री बने।

बसंत सोरेन भी राजनीति में आए।

और परिवार की अगली पीढ़ी भी सार्वजनिक जीवन में दिखाई देने लगी।

इस पूरे सफर में रूपी सोरेन एक ऐसी कड़ी थीं जो इस परिवार की अलग-अलग पीढ़ियों को जोड़ती रही।

उनकी सबसे बड़ी पहचान शायद यही थी।

वह सत्ता के केंद्र में नहीं थीं, लेकिन परिवार के केंद्र में थीं।

मुश्किल समय में मां का साथ

हेमंत सोरेन के राजनीतिक जीवन में भी मुश्किल दौर आए।

2006 में शिबू सोरेन से जुड़े एक मामले और उनके परिवार पर आए दबाव के दौरान एक पुराने समाचार में हेमंत सोरेन ने अपनी मां के भावुक होने का जिक्र किया था। उस रिपोर्ट के अनुसार, परिवार से जुड़े एक व्यक्ति को लेकर विवाद के दौरान रूपी सोरेन भावुक थीं और परिवार के प्रति अपनी संवेदनशीलता व्यक्त कर रही थीं।

यह छोटी-सी घटना बताती है कि राजनीति और अदालतों की खबरों के पीछे भी एक परिवार होता है।

जिस परिवार का नाम अखबार की headline में होता है, उसी परिवार में कोई मां अपने बेटे, पति और रिश्तों को लेकर भावुक भी होती है।

रूपी सोरेन की कहानी को समझने के लिए इस मानवीय पहलू को समझना जरूरी है।

बेटे की सफलता देखने वाली मां

2024 में हेमंत सोरेन ने चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी।

उस मौके पर शिबू सोरेन और रूपी सोरेन भी मौजूद थे। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, उस समय दोनों की उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए रूपी सोरेन व्हीलचेयर पर समारोह में पहुंची थीं।

कल्पना कीजिए उस पल की।

एक मां अपने बेटे को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए देख रही है।

उस बेटे को, जिसे उसने बचपन से बड़ा होते देखा।

जिसने परिवार के संघर्ष देखे।

जिसे उसने राजनीति में आगे बढ़ते देखा।

और अब वही बेटा पूरे राज्य की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले रहा है।

किसी मां के लिए शायद इससे बड़ी तस्वीर क्या होगी?

और फिर आया आखिरी दौर

सितंबर 2026 में रूपी सोरेन की तबीयत बिगड़ने लगी।

खबर मन्त्र एक्सक्लूसिव पड़ताल एवं विश्लेषण
Exclusive

18 सितंबर को सांस लेने में परेशानी के बाद उन्हें रांची के हिल व्यू अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बाद में उनकी तबीयत को लेकर लगातार अपडेट सामने आते रहे।

7 अक्टूबर को उनकी हालत गंभीर होने की खबर आई।

उसी दौरान हेमंत सोरेन ने अपने कार्यक्रम रद्द किए और कैबिनेट बैठक भी स्थगित कर दी। उस समय मुख्यमंत्री का ध्यान अपनी मां के स्वास्थ्य पर था।

और फिर शाम को वह खबर आई, जिसने पूरे परिवार को तोड़ दिया।

रूपी सोरेन नहीं रहीं।

आज वह घर, जहां कभी एक मां अपने बच्चों का इंतजार करती थीं, वहां उनकी यादें रह गई हैं।

कुछ लोग चले जाते हैं, लेकिन घर में रह जाते हैं

रूपी सोरेन का जीवन हमें शायद एक बहुत साधारण, लेकिन बहुत बड़ी बात समझाता है।

हम अक्सर सफलता को पद से मापते हैं।

कौन मुख्यमंत्री बना?
कौन सांसद बना?
कौन मंत्री बना?

लेकिन परिवार की दुनिया में सफलता की परिभाषा कुछ और होती है।

किसने बच्चों को संभाला?
किसने मुश्किल समय में साथ दिया?
किसने परिवार को जोड़े रखा?
किसने बिना किसी पद के अपनी जिम्मेदारी निभाई?

इन सवालों के जवाब अक्सर किसी सरकारी रिकॉर्ड में नहीं मिलते।

लेकिन परिवार की यादों में जरूर मिलते हैं।

और शायद यही रूपी सोरेन की सबसे बड़ी विरासत है।

पद नहीं, परिवार की ताकत थीं

रूपी सोरेन ने मुख्यमंत्री का पद नहीं संभाला।

उन्होंने लंबे समय तक कोई बड़ा संवैधानिक पद नहीं संभाला।

उनके नाम के आगे कोई बड़ी सरकारी कुर्सी नहीं लगी।

लेकिन उनकी जिंदगी को सिर्फ इसी पैमाने से देखना गलत होगा।

वह उस परिवार की मां थीं, जिसने झारखंड की राजनीति में लंबा सफर तय किया।

वह शिबू सोरेन की जीवनसंगिनी थीं।

वह दुर्गा, हेमंत, बसंत और अंजनी की मां थीं।

और एक समय खुद भी चुनावी राजनीति में उतरने वाली महिला थीं।

लेकिन शायद सबसे बढ़कर…

वह एक मां थीं।

और मां का कोई पद नहीं होता।

मां का कोई कार्यकाल नहीं होता।

मां के लिए कोई चुनाव नहीं होता।

मां बस होती है।

और जब मां चली जाती है, तब इंसान को समझ आता है कि घर में उसकी मौजूदगी कितनी बड़ी थी।

आज रूपी सोरेन हमारे बीच नहीं हैं।

लेकिन उनके बच्चों की जिंदगी में, उनके परिवार की यादों में और झारखंड के इस चर्चित राजनीतिक परिवार की कहानी में उनका नाम हमेशा मौजूद रहेगा।

क्योंकि कुछ लोग इतिहास में पद से दर्ज होते हैं, और कुछ लोग अपने परिवार की धड़कनों में।

रूपी सोरेन का नाम शायद उसी दूसरी जगह पर सबसे लंबे समय तक रहेगा।

विनम्र श्रद्धांजलि।

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Akash Singh

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