KhabarMantra: झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह गिरिडीह ज़िले की पारसनाथ पहाड़ियों—जैन समुदाय के लिए सम्मेद शिखरजी और संथाल आदिवासियों के लिए मरांग बुरू—की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त होम गार्ड तैनात करे। अदालत ने पहाड़ की परिधि में कूड़ा-कचरा फेंकने और मांस-मदिरा बेचने पर तुरन्त रोक लगाने को भी कहा है।
दो आस्थाओं का एक पर्वत
पारसनाथ झारखंड की सबसे ऊँची चोटी (लगभग 1,350 मीटर) है। जैन इतिहास-ग्रंथों के अनुसार, यहाँ 20 तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया; प्रत्येक के लिए शिखर पर एक-एक टोंक या मंदिर बना है। श्रद्धालु प्रतिवर्ष 27 किमी की पैदल यात्रा कर शिखर पहुँचते हैं।
संथाल आदिवासी इस पर्वत को मरांग बुरू—“महामाता-पर्वत” या सर्वोच्च देवता—मानते हैं। वे बैसाख पूर्णिमा (अप्रैल-मध्य) को पारसनाथ की वनों में सामूहिक शिकार-उत्सव “सेंदरा” मनाते आए हैं।
जैन धर्म पूर्णतः अहिंसा और शाकाहार पर टिका है, जबकि संथाल परंपरा में शिकार और मांसाहार सांस्कृतिक-धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा है। यही अंतर समय-समय पर टकराव को जन्म देता है।
टकराव का इतिहास—संक्षेप में
- 1911 – ब्रिटिश दौर के अभिलेखों में जैन-संथाल विवाद पहली बार दर्ज।
- 1917 – पटना़ हाईकोर्ट ने जैनों की वह याचिका खारिज की जिसमें सेंदरा को प्रतिबंधित करने की मांग की गई थी।
- 1981 – पारसनाथ वन्यजीव अभयारण्य घोषित; संथाल अनुष्ठान कई दशकों तक सीमित रहे।
- 2008 – संथाल अधिकार नेता अजय टुडू की हत्या ने मामले को फिर उग्र कर दिया।
- 2023 – केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने पहाड़ के 25 किमी दायरे में मांस-मदिरा और अंडा परोसने-बेचने पर रोक की अधिसूचना जारी की; साथ ही तीन-सदस्यीय समन्वय समिति बनाने का आदेश दिया, जिसमें 2 जैन और 1 आदिवासी सदस्य शामिल होंगे, लेकिन समिति आज तक गठित नहीं हो सकी।
- 2025 (मई) – झारखंड हाईकोर्ट ने अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात करने और कूड़ा-प्रबंधन तथा मांसाहार बिक्री-रोक पर सख़्त निगरानी के निर्देश दिए।
अधिसूचना के बाद भी कमिटी का गठन नहीं
2023 में केंद्र सरकार ने राज्य सरकार को स्पष्ट आदेश दिया था कि जैन और संथाल समुदायों के प्रतिनिधियों सहित तीन सदस्यों वाली समन्वय समिति बनाई जाए, जिसमें दो सदस्य जैन समुदाय से और एक सदस्य आदिवासी समुदाय से होगा। लेकिन इसके दो साल बाद भी यह समिति गठित नहीं की गई है। इसे लेकर दोनों समुदायों में असंतोष और सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है।
मौजूदा हालात
हाईकोर्ट की फटकार के बावजूद पहाड़ी पर पर्यटकों का कचरा और फुटपाथी दुकानों पर खुलेआम मांसाहारी व्यंजन मिलने की शिकायतें आ रही थीं। अदालत ने इसे न केवल धार्मिक भावना को आहत करने वाला बताया, बल्कि वन्यजीव अभयारण्य के नियमों का स्पष्ट उल्लंघन भी माना।
राज्य गृह विभाग ने प्रारम्भिक चरण में 100 अतिरिक्त होम गार्ड तैनात करने का आश्वासन दिया है। साथ ही, जिला प्रशासन को आदेश है कि वह पहाड़ी मार्गों पर सीसीटीवी, ठोस-अपशिष्ट संग्रह बिन्दु, और मोबाइल-पेट्रोलिंग दल तैनात करे।
आगे की चुनौती
- समन्वय समिति का गठन: केन्द्र की 2023 की अधिसूचना के अनुसार, जैन-संथाल प्रतिनिधियों और वन विभाग के अफ़सरों वाली समिति ही विवाद निपटारे की स्थायी व्यवस्था कर सकती है।
- धार्मिक स्वतंत्रता बनाम पर्यावरण: जैन समाज पवित्रता-अहिंसा की माँग कर रहा है; संथाल समुदाय अपने पारंपरिक सेंदरा उत्सव और “मरांग बुरू” की पूजा बहाल रखने पर अड़ा है।
- स्थानीय अर्थव्यवस्था: पहाड़ के आसपास सैकड़ों आदिवासी परिवार वन-उपज, पर्यटक-मार्गदर्शन और अल्पकालिक दुकानों पर निर्भर हैं; किसी भी कठोर प्रतिबंध से आजीविका प्रभावित हो सकती है।
पारसनाथ पहाड़ियों पर चल रहा यह संघर्ष मात्र धार्मिक आस्था से परे, सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों का भी प्रश्न है। अदालत के सख़्त रुख़ से फिलहाल हालात नियंत्रण में रखने की कोशिश होगी, परन्तु दीर्घकालीन समाधान तभी संभव है जब घोषणा-शुदा समन्वय समिति शीघ्र बने और सभी पक्ष समान विमर्श-मंच पर बैठें। सरकार के लिए चुनौती दो अति-पवित्र दावों के बीच ऐसा संतुलन खोजने की है जहाँ ‘सम्मेद शिखर’ की निस्तब्धता और ‘मरांग बुरू’ की जीवंत परंपरा, दोनों सुरक्षित रह सकें।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
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