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रांची में पहली बार रावण दहन की शुरुआत कब और कैसे हुई-जाने क्या है इसका इतिहास

1948 में बन्नू से आए शरणार्थी परिवारों ने 12 फीट के पुतले से शुरू किया था रावण दहन। 1960 से मोरहाबादी मैदान बना प्रमुख आयोजन स्थल।

अक्टूबर 20, 2026
in झारखंड Jharkhand News, रांची Ranchi
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रांची में पहली बार रावण दहन की शुरुआत कब और कैसे हुई-जाने क्या है इसका इतिहास

रांची में पहली बार रावण दहन की शुरुआत कब और कैसे हुई-जाने क्या है इसका इतिहास

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समय: ~8 मिनट•हिंदी बुलेटिन

Ranchi: रांची में दशहरा का त्योहार रावण दहन के बिना अधूरा माना जाता है। हर साल विजयादशमी के अवसर पर मोरहाबादी मैदान में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के विशाल पुतलों का दहन देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि राजधानी में इस परंपरा की शुरुआत कब और कैसे हुई थी? आज जिस आयोजन को रांची की सांस्कृतिक पहचान माना जाता है, उसकी नींव वर्ष 1948 में कुछ शरणार्थी परिवारों ने रखी थी।

Table of Contents

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  • 1948 में हुई थी रावण दहन की शुरुआत
  • कॉलेज परिसर से बारी पार्क तक पहुंचा आयोजन
  • 1960 से मोरहाबादी मैदान बना स्थायी ठिकाना
  • वर्तमान समय में क्या है रावण दहन की स्थिति?
    • रांची की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बना आयोजन

1948 में हुई थी रावण दहन की शुरुआत

रांची में रावण दहन की शुरुआत वर्ष 1948 में हुई थी। उस समय पश्चिमी पाकिस्तान के बन्नू शहर से आए लगभग 10-12 शरणार्थी परिवारों ने दशहरा मनाने के लिए इस आयोजन की शुरुआत की। विभाजन के बाद रांची पहुंचे इन परिवारों के लिए यह पर्व अपनी सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े रहने का माध्यम भी था।

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शुरुआती आयोजन महात्मा गांधी मार्ग यानी मेन रोड स्थित तत्कालीन डिग्री कॉलेज के परिसर में हुआ था। यहां करीब 12 फीट ऊंचा रावण का पुतला तैयार किया गया। लाला मनोहर लाल नागपाल, कृष्ण लाल नागपाल, अमीर चंद सतीजा और अन्य लोगों ने पुतला बनाने में योगदान दिया।

उस समय आयोजन में करीब 300 से 400 लोग शामिल हुए थे। पंजाबी और कबायली ढोल-नगाड़ों के बीच रावण दहन किया गया। छोटे स्तर पर शुरू हुआ यह आयोजन धीरे-धीरे शहर के लोगों के बीच लोकप्रिय होने लगा।

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कॉलेज परिसर से बारी पार्क तक पहुंचा आयोजन

शुरुआती वर्षों में रावण के पुतले का निर्माण डिग्री कॉलेज के परिसर में किया जाता था। लेकिन जैसे-जैसे आयोजन का आकार बढ़ा, वहां जगह कम पड़ने लगी। वर्ष 1950 से 1955 के बीच पुतले का निर्माण रेलवे स्टेशन के पास खजुरिया तालाब स्थित शरणार्थी शिविर में होने लगा।

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इस दौरान रावण के पुतले की ऊंचाई भी बढ़कर करीब 25 से 35 फीट तक पहुंच गई। रावण दहन के लिए बारी पार्क, जो टाउन हॉल के आसपास का क्षेत्र था, आयोजन स्थल बना। यहां दर्शकों की संख्या हजारों में पहुंचने लगी।

बढ़ते खर्च और आयोजन की जिम्मेदारियों को देखते हुए बाद में इसकी कमान पंजाबी हिंदू बिरादरी ने संभाली। बिरादरी के सदस्यों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और आयोजन का दायरा लगातार विस्तृत होता गया।

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1960 से मोरहाबादी मैदान बना स्थायी ठिकाना

रांची के रावण दहन के इतिहास में वर्ष 1960 को महत्वपूर्ण माना जाता है। बढ़ती भीड़ को देखते हुए आयोजकों ने मोरहाबादी मैदान को इस आयोजन के लिए उपयुक्त स्थल चुना। तब से मोरहाबादी रांची के प्रमुख रावण दहन कार्यक्रम का स्थायी केंद्र बना हुआ है।

बीते दशकों में आयोजन के स्वरूप में कई बदलाव आए हैं। रावण के साथ कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतलों का दहन भी कार्यक्रम का हिस्सा बन गया। पुतलों की ऊंचाई, सजावट और मंचीय व्यवस्थाओं में भी विस्तार हुआ।

वर्तमान समय में क्या है रावण दहन की स्थिति?

आज मोरहाबादी मैदान का रावण दहन रांची के बड़े सार्वजनिक दशहरा आयोजनों में शामिल है। इसके अलावा अरगोड़ा और धुर्वा-जगन्नाथपुर जैसे इलाकों में भी रावण दहन के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों में भीड़ प्रबंधन, साफ-सफाई, प्रवेश मार्ग और अन्य नागरिक सुविधाओं की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होती है।

18 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, इस साल मोरहाबादी मैदान में 70 फीट ऊंचे रावण, 65 फीट के कुंभकर्ण और 60 फीट के मेघनाथ के पुतलों के दहन की तैयारी बताई गई है। रिपोर्ट में दो मंजिला स्वर्ण लंका को भी आकर्षण का हिस्सा बताया गया है।

खबर मन्त्र एक्सक्लूसिव पड़ताल एवं विश्लेषण
Exclusive

यह जानकारी आयोजन की घोषित तैयारियों से संबंधित है; कार्यक्रम के वास्तविक आयोजन और अंतिम व्यवस्थाओं की पुष्टि अलग से की जानी चाहिए।

रांची की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बना आयोजन

1948 में कुछ शरणार्थी परिवारों की पहल से शुरू हुई रावण दहन की परंपरा आज करीब आठ दशक का सफर तय कर चुकी है। मेन रोड के कॉलेज परिसर से बारी पार्क और फिर मोरहाबादी मैदान तक का यह सफर रांची के सामाजिक और सांस्कृतिक बदलावों की कहानी भी है।

आज यह आयोजन सिर्फ पुतलों के दहन तक सीमित नहीं है। यह दशहरा के अवसर पर लोगों के एक साथ जुटने, परंपरा को आगे बढ़ाने और बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश याद करने का अवसर भी है।

रांची में रावण दहन की शुरुआत 1948 में हुई थी, जबकि 1960 से मोरहाबादी मैदान इस आयोजन का प्रमुख स्थायी स्थल बना। यही ऐतिहासिक सफर इस परंपरा को राजधानी के दशहरा उत्सव का अहम हिस्सा बनाता है।

च7ब 1
Neeraj Toppo

4 years of experience in journalism. Previously, I worked with organizations such as Swadesh Today, News 11 Bharat, and News 22 Scope. For the past year, I have been working as a content writer at Khabar Mantra.

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