Jharkhand: किस्को प्रखंड के चाहु गांव में रहने वाले दिव्यांग किसान लीला उरांव की कहानी इन दिनों पूरे झारखंड में चर्चा का विषय बनी हुई है। 2024 में वज्रपात (आकाशीय बिजली) से उनके बैल मारे गए और असमय बारिश ने फसल भी बर्बाद कर दी। आर्थिक तंगी ने उन्हें इस कदर तोड़ दिया कि वे न तो बैल खरीद पाए और न ही ट्रैक्टर का खर्च उठा सके। मजबूरी में उन्होंने अपने बेटों को ही बैल की जगह हल खींचने पर लगा दिया।
मदद की गुहार पर भी मिला सिर्फ सन्नाटा
लीला उरांव बताते हैं कि बैल मरने और फसल बर्बाद होने के बाद उन्होंने कई जगह मदद की गुहार लगाई। पंचायत प्रतिनिधि, कृषि विभाग और यहां तक कि स्थानीय प्रशासन से भी संपर्क किया, लेकिन कहीं से कोई सहायता नहीं मिली। “हमने हिम्मत नहीं हारी, बेटों के साथ मिलकर खेत जोत रहे हैं ताकि परिवार भूखा न रहे,” लीला ने भावुक होते हुए कहा।
सरकारी मुआवजा योजना का क्या हुआ?
झारखंड सरकार वज्रपात से जानवरों की मौत पर मुआवजा देने का प्रावधान करती है। मवेशियों की मौत पर 4 लाख रुपये तक का मुआवजा और संपत्ति के नुकसान पर 2,100 रुपये से 95,100 रुपये तक की सहायता राशि दी जाती है।
मुआवजे की प्रक्रिया के तहत प्रभावित व्यक्ति को:
. नुकसान का दावा दर्ज कराना होता है।
. प्रशासन द्वारा जांच के बाद मुआवजा तय होता है।
. राशि सीधे बैंक खाते में ट्रांसफर होती है।
लेकिन सवाल यह है कि लीला उरांव को अब तक यह मुआवजा क्यों नहीं मिला? क्या उनकी फाइलें कागजों में ही दबकर रह गईं? या स्थानीय प्रशासन की उदासीनता इसकी वजह है?
क्यों नहीं मिला लीला को मुआवजा?
- क्या पंचायत स्तर पर सही रिपोर्टिंग नहीं हुई?
- क्या कृषि विभाग ने उनकी याचिका को नजरअंदाज कर दिया?
- या लीला ने सही प्रक्रिया की जानकारी न होने के कारण दावा ही दर्ज नहीं कराया?
सरकार से सवाल
क्या लोहरदगा जिला प्रशासन लीला उरांव की मदद करेगा?
क्या राज्य सरकार अपने मुआवजा दावे के प्रचार में केवल आंकड़ों तक सीमित है?
ऐसे कितने लीला उरांव हैं, जिनकी आवाज सरकारी कागजों में गुम है?
अब जरूरत है तत्काल कार्रवाई की
सरकार को चाहिए कि वह इस मामले की जांच कर लीला उरांव को उचित मुआवजा दिलवाए और उदाहरण प्रस्तुत करे कि हर जरूरतमंद तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचे।













