रांची : झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार और आजाद सिपाही हिंदी दैनिक के प्रधान संपादक हरिनारायण सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं। रविवार सुबह रांची के सेम्फोर्ड अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनकी मृत्यु की खबर से झारखंड के पत्रकारिता जगत में शोक की लहर दौड़ गई। हर कोई स्तब्ध था। कुछ शब्दों में उन्हें समेटना मुश्किल था। उनका जाना एक खालीपन छोड़ गया, जिसे भर पाना शायद नामुमकिन है।
भावुक हुआ प्रेस क्लब, नम हुईं आंखें
हरिनारायण सिंह का पार्थिव शरीर सबसे पहले रांची प्रेस क्लब लाया गया। वहां का दृश्य बेहद भावुक था। पत्रकार, राजनीतिज्ञ और शुभचिंतक, सभी उनकी अंतिम झलक पाने पहुंचे। किसी की आंखों में आंसू थे, किसी के हाथों में फूल और सबके दिलों में सिर्फ एक ही बात इतनी जल्दी क्यों। रांची प्रेस क्लब में उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे रांची के सांसद और रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने कहा, हरिनारायण जी जैसे पत्रकार कम होते हैं। उन्होंने पत्रकारिता को सिर्फ पेशा नहीं, एक मिशन की तरह जिया।
अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब
प्रेस क्लब से उनकी अंतिम यात्रा हरमू मुक्ति धाम की ओर निकली। फूलों से सजी एंबुलेंस, पीछे-पीछे चुपचाप चलता हुजूम। हर चेहरा मौन, हर आंख नम। अंतिम संस्कार के समय वहां विधायक सरयू राय, पूर्व मंत्री बंधू तिर्की, पूर्व विधायक समरी लाल, और झारखंड के कई वरिष्ठ पत्रकार जिनमें बैजनाथ मिश्रा, फैसल अनुराग, संजय सिंह सहित जमशेदपुर, बोकारो, हजारीबाग और रांची के तमाम मीडिया संस्थानों से पत्रकार उपस्थित थे। वहीं, ग्रामिण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह और राज्यसभा सांसद महुआ माजी, पूर्व सांसद सुबोध कांत सहाय, रविंद्र सिंह, शमशेर आलम उनके आवास पहुंचकर परिजनों को ढाढ़स बंधाया।
एक युग की समाप्ति
बता दें कि उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में जन्मे हरिनारायण सिंह ने रांची को अपना घर बना लिया था। ‘रविवार’ पत्रिका से करियर शुरू कर प्रभात खबर, हिंदुस्तान, खबर मंत्र, होते हुए उन्होंने 2015 में अपना अखबार आजाद सिपाही शुरू किया। बिना किसी कॉरपोरेट समर्थन के उन्होंने इस अखबार को जनता की आवाज बना दिया। हरिनारायण सिंह पत्रकार ही नहीं, एक मार्गदर्शक, मित्र और अभिभावक थे। उन्होंने सैकड़ों पत्रकारों को रास्ता दिखाया, कभी किसी को हटाया नहीं। निंदारहित और रिश्तों में विश्वास करने वाले हरिनारायण सिंह का हर कोई सम्मान करता था। उनके जाने से जो रिक्तता बनी है, वह केवल पत्रकारिता में नहीं, हर उस दिल में है जो उनसे कभी मिला था।












