झारखंड में सरकारी निर्माण परियोजनाओं को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट में झारखंड राज्य भवन निर्माण निगम लिमिटेड की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि योजना, वित्तीय प्रबंधन और परियोजनाओं की निगरानी में कई बड़ी खामियां सामने आई हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2015 से मार्च 2023 के बीच निगम ने करीब 14,020 करोड़ रुपये की लागत से 1,328 परियोजनाएं शुरू की थीं। हालांकि इनमें से केवल 726 परियोजनाएं ही पूरी हो सकीं, जबकि सैकड़ों परियोजनाएं अभी भी अधूरी हैं या विभिन्न कारणों से रोक दी गईं।
ऑडिट में यह भी सामने आया कि कई सालों तक निगम ने कॉरपोरेट बजट तक तैयार नहीं किया और न ही परियोजनाओं की समीक्षा के लिए कोई तकनीकी समिति बनाई गई। कई परियोजनाएं बिना जमीनी स्थिति का सही आकलन किए ही शुरू कर दी गईं, जिसके कारण बाद में काम रुक गया या लागत बढ़ गई।
कुछ मामलों में तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद परियोजनाएं बेकार साबित हो गईं। उदाहरण के तौर पर एक डिग्री कॉलेज का भवन हाई टेंशन लाइन के पास बना दिया गया, जिसके कारण उसका उपयोग नहीं हो सका और करीब 12 करोड़ रुपये का खर्च व्यर्थ चला गया। इसी तरह कुछ छात्रावास और अन्य भवन भी अधूरे रह गए, जिन पर खर्च की गई राशि का कोई लाभ नहीं मिल पाया।
रिपोर्ट में निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, अनुबंध प्रबंधन में खामियां और भुगतान में अनियमितताओं की भी बात सामने आई है। कई परियोजनाएं तय समय से वर्षों की देरी से पूरी हुईं, जिससे उनकी लागत में भी भारी बढ़ोतरी हुई।
इसके अलावा निगम में तकनीकी कर्मचारियों की भारी कमी भी सामने आई है। सहायक अभियंताओं और जूनियर इंजीनियरों के अधिकांश पद खाली पाए गए, जिससे परियोजनाओं की निगरानी और गुणवत्ता पर असर पड़ा।
CAG की इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद झारखंड में सरकारी निर्माण परियोजनाओं के प्रबंधन और जवाबदेही को लेकर सवाल उठने लगे हैं।












