राज्यसभा चुनाव: है प्रीत जहां की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूं। मैं झारखंड का रहने वाला हूं, झारखंड की बात सुनाता हूं। और इस झारखंड में फिलहाल राज्यसभा चुनाव की गर्मी इतनी बढ़ गई है कि चाहे सत्ता पक्ष के विधायक हों या विपक्ष के, सभी अपने-अपने विधायकों को एसी वाले कमरों में शिफ्ट कर रहे हैं। मौका राज्यसभा चुनाव का है और इस चुनाव में जीत सुनिश्चित करने के लिए सभी गठबंधन एकजुट नजर आ रहे हैं। देखा जाए तो झारखंड वह बदनाम गली है, जहां राज्यसभा चुनाव में घोड़े खरीदे जाते हैं, यानी हॉर्स ट्रेडिंग होती है। साल दर साल बदलते रहे हैं, लेकिन इस ट्रेडिंग का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।
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मौजूदा स्थिति में राज्यसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए एनडीए अपने विधायकों को एकजुट कर रही है। चुनाव से पहले तक जहां एनडीए सीना तानकर यह कहती नजर आ रही थी कि हम पूरी तरह एकजुट हैं, हमारे पास चार विधायकों का समर्थन भी है और जीत हमारी होगी। लेकिन आज की ताजा तस्वीर यह है कि सभी विधायकों को एसी वाले कमरों में शिफ्ट किया जा रहा है। चुनाव को ध्यान में रखते हुए उन्हें दिशा-निर्देश भी दिए जा रहे हैं। हालांकि उनके उम्मीदवार की जीत होगी या नहीं, यह तो आने वाला समय ही बताएगा।
वहीं दूसरी तरफ महागठबंधन भी ताल से ताल मिलाता नजर आ रहा है। आज होटल बीएनआर में कांग्रेस के बड़े नेता, विधायक और मंत्री पहुंच रहे हैं, जहां से मुख्यमंत्री आवास तक पहुंचा जाएगा। लेकिन सवाल यही है कि क्या इस चुनाव में जिस गठबंधन के पास पर्याप्त संख्या में विधायक हैं, उसकी जीत सुनिश्चित है? तो फिर ऐसी कौन-सी वजह है कि विधायकों को साथ रखकर निगरानी की जा रही है?
इसकी वजह झारखंड का पुराना इतिहास है। यहां हर बार राज्यसभा चुनाव में वही दगा दे जाते हैं, जो अपने होते हैं। और जाहिर है, परिमल नाथवानी के आने के बाद से यह मामला और दिलचस्प हो चुका है। कहीं न कहीं सभी दल अपने विधायकों को साथ रखने में जुटे हुए हैं। महागठबंधन की बात करें तो तस्वीर यही बता रही है कि सभी एक साथ हैं, लेकिन जानकार कह रहे है अंतिम समय तक कुछ भी हो सकता है, कुछ भी बदल सकता है और जो परिणाम अभी तय नजर आ रहे हैं, वे भी उलट सकते हैं।
दरअसल, इसकी सबसे बड़ी वजह झारखंड का राजनीतिक इतिहास है। राज्यसभा चुनाव के दौरान कई बार क्रॉस वोटिंग और अप्रत्याशित घटनाएं देखने को मिली हैं। यही कारण है कि कोई भी दल अंतिम समय तक कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं है। भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी के चुनावी मैदान में उतरने के बाद मुकाबला और दिलचस्प हो गया है। उनके आने से राजनीतिक समीकरणों पर नए सिरे से चर्चा शुरू हो गई है। ऐसे में सभी दल अपने विधायकों को साथ रखने और किसी भी संभावित राजनीतिक उलटफेर को रोकने में जुटे हुए हैं।
फिलहाल तस्वीर यही है कि सभी दल एकजुटता का दावा कर तो रहे हैं, लेकिन अंदर ही अंदर एक डर है। क्योंकि झारखंड की राजनीति अंतिम समय में अपना रंग दिखाती है, और इस रंग के दाग surf excel से भी नही धुलते।

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