Ranchi: झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के केंद्रीय महासचिव विनोद पाण्डेय ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले कथित करोड़ों रुपये के चंदे को लेकर जांच एजेंसियों और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने गुजरात से जुड़ी एक खबर का हवाला देते हुए दावा किया कि कुछ ऐसी राजनीतिक पार्टियां हैं, जो चुनावी गतिविधियों में सक्रिय नजर नहीं आतीं, लेकिन उनके खातों में बड़ी रकम चंदे के रूप में पहुंच रही है।
विनोद पाण्डेय ने कहा कि ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि राजनीतिक दलों को मिलने वाला धन कहां से आ रहा है और उसका इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है।
देश में करीब 2800 राजनीतिक पार्टियां, छह राष्ट्रीय दल
JMM नेता ने कहा कि देश में करीब 2800 राजनीतिक पार्टियां हैं। इनमें केवल छह दलों को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त है, जबकि 77 पार्टियां क्षेत्रीय दल के तौर पर मान्यता प्राप्त हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या में ऐसे राजनीतिक संगठन भी हैं, जिन्हें किसी स्तर पर मान्यता प्राप्त नहीं है।
उन्होंने इसी संदर्भ में राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए जांच की आवश्यकता बताई।
‘सेल कंपनियों के बाद अब सेल पार्टियां चिंता का विषय’
विनोद पाण्डेय ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘सेल पार्टियों’ का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि अब तक देश में ‘सेल कंपनियों’ के बारे में चर्चा होती रही है, लेकिन अगर ऐसी राजनीतिक पार्टियां सामने आ रही हैं, जो चुनाव नहीं लड़तीं और जिनकी जमीनी राजनीतिक गतिविधियां भी दिखाई नहीं देतीं, फिर भी उन्हें करोड़ों रुपये का चंदा मिलता है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
उन्होंने दावा किया कि गुजरात में ऐसी कई पार्टियां मौजूद हैं, जिनके कार्यालय तो हैं, लेकिन उनकी सक्रिय राजनीतिक भूमिका स्पष्ट रूप से नजर नहीं आती।
चुनाव नहीं लड़ने वाली पार्टियों को करोड़ों का चंदा मिलने का दावा
JMM महासचिव ने दावा किया कि ऐसी कुछ पार्टियों को हर साल करोड़ों रुपये का चंदा मिल रहा है। उनके मुताबिक, जिन पार्टियों के चंदे को लेकर चर्चा हो रही है, उनमें सबसे कम बताई जा रही राशि भी करीब 138 करोड़ रुपये है।
उन्होंने सवाल किया कि यदि कोई राजनीतिक दल चुनावी राजनीति में सक्रिय नहीं है, तो उसके पास इतनी बड़ी रकम चंदे के रूप में कैसे पहुंच रही है। पाण्डेय ने इस पूरे मामले में वित्तीय लेन-देन की जांच की मांग की।
गुजरात की करीब 10 पार्टियों का किया जिक्र
विनोद पाण्डेय ने दावा किया कि गुजरात में करीब 10 ऐसी राजनीतिक पार्टियों के बारे में जानकारी सामने आई है, जिन्हें वर्ष 2023-24 के दौरान बड़ी मात्रा में चंदा मिलने की बात कही जा रही है।
उन्होंने कहा कि गुजरात में इस समय भाजपा की सरकार है और ऐसे में वहां सामने आए इस मामले की जांच निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए। उन्होंने संबंधित संस्थाओं से राजनीतिक दलों के चंदे और वित्तीय गतिविधियों की जांच करने की मांग की।
निर्वाचन आयोग और आयकर विभाग की भूमिका पर सवाल
JMM नेता ने सवाल उठाया कि यदि राजनीतिक दलों को करोड़ों रुपये का चंदा मिल रहा है और उनकी कोई उल्लेखनीय चुनावी गतिविधि नहीं है, तो निर्वाचन आयोग इस पूरे मामले को लेकर क्या कार्रवाई कर रहा है?
उन्होंने आयकर विभाग की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए। पाण्डेय का कहना है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले बड़े चंदे की निगरानी और उसके स्रोत की जांच की जानी चाहिए, ताकि किसी भी तरह की वित्तीय अनियमितता की संभावना को दूर किया जा सके।
मनी लॉन्ड्रिंग की आशंका की जांच की मांग
विनोद पाण्डेय ने आशंका जताई कि राजनीतिक दलों को दिए जा रहे हजारों करोड़ रुपये के चंदे के पीछे कहीं मनी लॉन्ड्रिंग का नेटवर्क तो नहीं है। उन्होंने कहा कि इस पहलू की भी जांच होनी चाहिए।
उन्होंने चंदा देने वाले व्यक्तियों, कंपनियों और संस्थाओं के वित्तीय स्रोतों की जांच किए जाने की मांग की, ताकि यह पता चल सके कि इतनी बड़ी रकम किन माध्यमों से राजनीतिक दलों तक पहुंच रही है।
‘मनी लॉन्ड्रिंग है तो ED कब करेगी कार्रवाई?’
JMM नेता ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) की भूमिका पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यदि जांच में मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े संकेत मिलते हैं, तो संबंधित एजेंसी को मामले की जांच करनी चाहिए।
विनोद पाण्डेय ने सवाल किया कि यदि करोड़ों रुपये के संदिग्ध चंदे का मामला सामने आ रहा है, तो ED अब तक इस मामले में सक्रिय क्यों नहीं हुई?
उन्होंने कहा कि पूरे मामले में पारदर्शिता जरूरी है। राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे, उसके स्रोत और उसके इस्तेमाल की जांच होनी चाहिए, ताकि जनता के सामने पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सके।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
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