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रांची की पहली दुर्गा पूजा कहां हुई थी? जानें 187 साल पुराना इतिहास  

1839 में रातू किले की राजपरिवार से जुड़ी पूजा से लेकर 1883 की दुर्गाबाड़ी और आज के भव्य पंडालों तक, जानिए रांची में दुर्गोत्सव का ऐतिहासिक सफर।

अक्टूबर 15, 2026
in झारखंड Jharkhand News, धर्म-अध्याय
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Where was Ranchi's first Durga Puja held? Discover its 187-year-old history.

Where was Ranchi's first Durga Puja held? Discover its 187-year-old history.

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समय: ~15 मिनट•हिंदी बुलेटिन

रांची: दुर्गा पूजा आते ही राजधानी रांची की तस्वीर बदलने लगती है। शहर की सड़कों पर आकर्षक सजावट, भव्य पूजा पंडाल, रंग-बिरंगी रोशनी और मां दुर्गा के दर्शन के लिए उमड़ती भीड़ उत्सव का माहौल बना देती है। आज रांची की दुर्गा पूजा अपनी भव्यता, अलग-अलग थीम और लाखों-करोड़ों रुपये की लागत से तैयार होने वाले पंडालों के लिए जानी जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस उत्सव की जड़ें लगभग 187 साल पुरानी परंपरा से जुड़ी बताई जाती हैं?

Table of Contents

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  • 1839 में रातू किले से जुड़ी दुर्गा पूजा की परंपरा
  • 1882 में जिला स्कूल और 1883 में दुर्गाबाड़ी से बढ़ा सार्वजनिक पूजा का दायरा
  • खपरैल के मकान से मंदिर तक पहुंची दुर्गाबाड़ी की कहानी
  • डोरंडा से हिनू तक फैली दुर्गोत्सव की परंपरा
  • 1.56 रुपये की पूजा से 160 पंडालों तक का सफर
  • रांची की पहचान में शामिल हो चुकी है दुर्गा पूजा

स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, रांची क्षेत्र में दुर्गा पूजा की सबसे पुरानी परंपराओं में रातू किले की पूजा का विशेष स्थान है। वर्ष 1839 में रातू राजपरिवार से जुड़ी इस परंपरा का उल्लेख मिलता है। इसके बाद शहर में सामुदायिक और सार्वजनिक दुर्गा पूजा का विस्तार हुआ। वर्ष 1883 में दुर्गाबाड़ी में शुरू हुई सार्वजनिक पूजा ने इस परंपरा को एक नया स्वरूप दिया। समय के साथ यही उत्सव रांची की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बन गया।

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  • राष्ट्रीय विज्ञान प्रतियोगिता में झारखंड का कमाल, पूरव जैन ने जीता रजत पदक

1839 में रातू किले से जुड़ी दुर्गा पूजा की परंपरा

रांची की दुर्गा पूजा के इतिहास में रातू किले का नाम विशेष महत्व रखता है। रातू राजपरिवार से जुड़ी पूजा को इस क्षेत्र की सबसे पुरानी दुर्गा पूजा परंपराओं में गिना जाता है। उपलब्ध स्थानीय विवरणों में वर्ष 1839 को इस परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। यह पूजा राजपरिवार की धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक मानी जाती है।

हालांकि, रातू किले में पूजा की प्राचीनता और वर्तमान स्वरूप में प्रतिमा स्थापित कर पूजा शुरू होने के समय को लेकर अलग-अलग विवरण सामने आते हैं। कुछ रिपोर्टों में इस परंपरा को नागवंश के प्रथम महाराजा फणि मुकुट राय के समय से जोड़ा गया है, जबकि प्रतिमा पूजन की शुरुआत का संबंध महाराजा उदय प्रताप नाथ शाहदेव के काल से बताया गया है। इसलिए इन ऐतिहासिक दावों को परंपरागत मान्यता के रूप में समझना अधिक उचित होगा।

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रातू किले में आज भी पूजा पारंपरिक विधि-विधान के साथ की जाती है। यहां बंगाली पद्धति के अनुसार दुर्गोत्सव मनाए जाने का उल्लेख मिलता है। पूजा की शुरुआत षष्ठी की शाम बेलवरण से होती है। सप्तमी को नवपत्रिका पूजन के बाद आम लोगों के लिए किले का द्वार खोला जाता है। अष्टमी की रात संधि पूजा और नवमी को विशेष पूजा की जाती है। यहां शाक्त परंपरा के तहत बलि की रस्म का भी उल्लेख मिलता है। विजयादशमी के दिन महाराजा तालाब में प्रतिमा विसर्जन की परंपरा बताई जाती है।

इस तरह रातू किले की पूजा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी परंपरा भी है।

1882 में जिला स्कूल और 1883 में दुर्गाबाड़ी से बढ़ा सार्वजनिक पूजा का दायरा

रातू किले की राजपरिवार से जुड़ी परंपरा के बाद रांची शहर में सामुदायिक दुर्गा पूजा का विस्तार होने लगा। ऐतिहासिक रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 1882 में जिला स्कूल में दुर्गा पूजा का आयोजन हुआ। इसके अगले वर्ष यानी 1883 में दुर्गाबाड़ी में सार्वजनिक दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई। इन आयोजनों ने शहर में सामूहिक रूप से दुर्गोत्सव मनाने की परंपरा को आगे बढ़ाया।

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दुर्गाबाड़ी की स्थापना रांची में सार्वजनिक दुर्गा पूजा के इतिहास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जाती है। बताया जाता है कि तत्कालीन जिला स्कूल के प्रधानाचार्य पंडित गंगाचरण वेदांत बागीस की प्रेरणा से यहां पूजा शुरू हुई थी। उस दौर में आज की तरह बड़े-बड़े पंडाल, आधुनिक लाइटिंग और भव्य सजावट की व्यवस्था नहीं थी। सीमित संसाधनों के बीच स्थानीय लोगों ने मिलकर पूजा का आयोजन किया।

उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, वर्ष 1883 में दुर्गाबाड़ी की पहली सार्वजनिक पूजा पर केवल 1 रुपया 56 पैसे खर्च हुए थे। इस आयोजन में बंगाली समुदाय के करीब 200 लोगों के शामिल होने का उल्लेख मिलता है। आज के दौर में जब दुर्गा पूजा समितियां पंडाल निर्माण और सजावट पर बड़ी रकम खर्च करती हैं, तब शुरुआती आयोजन का यह विवरण रांची के बदलते सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास की दिलचस्प तस्वीर पेश करता है।

झारखंड मुख्य समाचार एवं विशेष रिपोर्ट
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खपरैल के मकान से मंदिर तक पहुंची दुर्गाबाड़ी की कहानी

दुर्गाबाड़ी में जिस स्थान पर आज पूजा होती है, वहां शुरुआती दौर में खपरैल का मकान था। बताया जाता है कि पहली सार्वजनिक पूजा इसी मकान में आयोजित की गई थी। आसपास के कुछ बंगाली परिवारों ने पूजा के लिए जमीन दान की। बाद में इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण हुआ और दुर्गाबाड़ी रांची की प्रमुख धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान में शामिल हो गई।

दुर्गाबाड़ी की खासियत यह रही कि यहां पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रही। इसने बंगाली समाज को एक साझा मंच दिया और शहर में सामुदायिक भागीदारी की परंपरा को मजबूत किया। अलग-अलग परिवारों और स्थानीय लोगों के सहयोग से शुरू हुआ आयोजन धीरे-धीरे रांची के दुर्गोत्सव इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

दुर्गाबाड़ी से पहले रातू किले में पूजा होने की बात समिति के प्रवक्ता प्रदीप रॉय के हवाले से सामने आई है। हालांकि, रातू किले की राजपरिवार से जुड़ी पूजा और दुर्गाबाड़ी की सार्वजनिक पूजा को अलग-अलग ऐतिहासिक पड़ावों के रूप में देखना चाहिए।

डोरंडा से हिनू तक फैली दुर्गोत्सव की परंपरा

रांची में दुर्गा पूजा का इतिहास केवल रातू किले और दुर्गाबाड़ी तक सीमित नहीं है। शहर के दूसरे इलाकों में भी पूजा की परंपराएं विकसित हुईं। उपलब्ध ऐतिहासिक रिपोर्टों में डोरंडा क्षेत्र में वर्ष 1880 से दुर्गा पूजा की परंपरा जुड़े होने का उल्लेख मिलता है। वहीं, वर्ष 1913 में हिनू बंगाली मंडप में पूजा शुरू होने का विवरण सामने आता है।

वर्धमान कंपाउंड स्थित हरिमति मंदिर में वर्ष 1935 से पूजा आयोजित किए जाने की जानकारी भी मिलती है। इन अलग-अलग पड़ावों से स्पष्ट होता है कि रांची में दुर्गोत्सव का विस्तार कई दशकों में हुआ। शुरुआत में राजपरिवार और सीमित समुदायों से जुड़ी पूजा धीरे-धीरे शहर के अलग-अलग मोहल्लों और सामाजिक समूहों तक पहुंची।

हर क्षेत्र ने अपनी परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय भागीदारी के आधार पर पूजा को एक अलग पहचान दी। यही वजह है कि आज रांची में दुर्गा पूजा के दौरान अलग-अलग इलाकों में विविध धार्मिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक आयोजनों की झलक देखने को मिलती है।

1.56 रुपये की पूजा से 160 पंडालों तक का सफर

रांची की दुर्गा पूजा में आया बदलाव इसके विस्तार से समझा जा सकता है। कभी खपरैल के मकान में सीमित संसाधनों के साथ शुरू हुआ सार्वजनिक आयोजन आज बड़े पंडालों, कलात्मक प्रतिमाओं, आधुनिक रोशनी और अलग-अलग विषयों पर आधारित सजावट तक पहुंच चुका है।

पीटीआई की सितंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, उस वर्ष रांची जिले में करीब 160 दुर्गा पूजा पंडाल लगाए गए थे। यह आंकड़ा बताता है कि दुर्गोत्सव अब शहर और आसपास के इलाकों में व्यापक जनभागीदारी वाला आयोजन बन चुका है।

आज पूजा समितियां पंडालों की सजावट के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों की कला, ऐतिहासिक इमारतों, धार्मिक प्रसंगों और समसामयिक विषयों से प्रेरणा लेती हैं। कई स्थानों पर आकर्षक लाइटिंग और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी उत्सव का हिस्सा होते हैं। हालांकि, पूजा का मूल भाव वही है—मां दुर्गा की आराधना, सामुदायिक सहभागिता और परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना।

रांची की पहचान में शामिल हो चुकी है दुर्गा पूजा

रांची में दुर्गा पूजा का इतिहास शहर के सामाजिक विकास और सांस्कृतिक बदलावों की कहानी भी कहता है। रातू किले की राजपरिवार से जुड़ी पूजा, जिला स्कूल का आयोजन, दुर्गाबाड़ी की सार्वजनिक परंपरा और बाद में विभिन्न मोहल्लों में विकसित हुए पूजा मंडप इस यात्रा के अलग-अलग पड़ाव हैं।

वर्ष 1839 से जुड़ी रातू किले की परंपरा और 1883 में दुर्गाबाड़ी की सार्वजनिक पूजा के उल्लेख रांची के दुर्गोत्सव इतिहास को खास बनाते हैं। हालांकि, अलग-अलग आयोजनों की शुरुआत और उनकी प्राचीनता को लेकर उपलब्ध विवरणों में अंतर है, इसलिए ऐतिहासिक तिथियों को संबंधित रिपोर्टों और परंपरागत मान्यताओं के संदर्भ में देखना जरूरी है।

आज रांची की दुर्गा पूजा भव्यता के साथ अपनी पुरानी विरासत को भी संजोए हुए है। आधुनिक पंडालों और आकर्षक सजावट के बीच रातू किले और दुर्गाबाड़ी जैसे ऐतिहासिक पड़ाव याद दिलाते हैं कि इस उत्सव की असली ताकत केवल इसकी भव्यता में नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, सहयोग और सांस्कृतिक निरंतरता में है।

 

 

खबर मन्त्र एक्सक्लूसिव पड़ताल एवं विश्लेषण
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विशेष संवाददाता | Khabar Mantra

विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।

5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।

वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।

Expertise: Journalism • Digital Media • Ground Reporting • Content & Social Media • Video Production • News Analysis

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