रांची में दुर्गा पूजा का मतलब सिर्फ भव्य पंडाल, आकर्षक सजावट और हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ नहीं है। शहर के बीचों-बीच ऐसी जगह भी है, जहां आज भी पूजा की पहचान आधुनिक भव्यता से ज्यादा पुरानी परंपराओं से होती है। यह जगह है दुर्गाबाड़ी।
वर्ष 1883 में शुरू हुई दुर्गाबाड़ी की दुर्गा पूजा 2026 में 143 वर्ष पूरे कर रही है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, रांची में सामुदायिक दुर्गा पूजा के इतिहास में दुर्गाबाड़ी का स्थान बेहद महत्वपूर्ण है। जिला स्कूल के संस्कृत शिक्षक पंडित गंगाचरण वेदांत बागीस समेत बंगाली समाज के लोगों ने यहां पूजा की शुरुआत की थी। तब से पीढ़ियां बदलती रहीं, शहर बदलता गया, पूजा का स्वरूप भी बड़ा होता गया, लेकिन दुर्गाबाड़ी ने अपनी कई पुरानी परंपराओं को संभालकर रखा।
यहां नवरात्र के पहले दिन नहीं होती कलश स्थापना
दुर्गाबाड़ी की सबसे खास परंपराओं में से एक इसकी पूजा पद्धति है। आमतौर पर नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना के साथ पूजा की शुरुआत देखी जाती है, लेकिन दुर्गाबाड़ी में ऐसा नहीं होता।
यहां षष्ठी के दिन छह कलश स्थापित किए जाते हैं और इसी के साथ मुख्य पूजा का क्रम शुरू होता है। पूजा षष्ठी से विजयादशमी तक चलती है। हालांकि इसकी तैयारियां महालया से ही शुरू हो जाती हैं।
बंगाली परंपरा में महालया का अपना खास महत्व है। इसी दिन देवी के आगमन का भाव पैदा होता है और घर-परिवार में उत्सव की तैयारी तेज हो जाती है। दुर्गाबाड़ी में भी महालया से लेकर दशमी तक पूरा वातावरण एक खास धार्मिक और पारिवारिक भाव से जुड़ा रहता है।
यानी यहां दुर्गोत्सव सिर्फ पांच दिनों का आयोजन नहीं, बल्कि एक ऐसी परंपरा है जिसमें तैयारी, अनुष्ठान और विदाई—हर चरण का अपना अर्थ है।
एक चाला में मां दुर्गा और पूरा परिवार
दुर्गाबाड़ी की प्रतिमा को देखकर सबसे पहले जिस चीज पर नजर जाती है, वह है इसकी एक चाला परंपरा।
आज अलग-अलग पूजा पंडालों में देवी दुर्गा और उनके परिवार की प्रतिमाएं अलग-अलग हिस्सों में या अलग शैली में देखने को मिलती हैं। लेकिन दुर्गाबाड़ी में मां दुर्गा, गणेश, कार्तिक, लक्ष्मी और सरस्वती समेत पूरा देवी परिवार एक ही चाला यानी एक ही फ्रेम में बनाया जाता है।
यही एक चाला प्रतिमा दुर्गाबाड़ी की पहचान का हिस्सा बन चुकी है। पुराने स्वरूप को बनाए रखने के पीछे सिर्फ धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि मूर्तिकला की एक पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही परंपरा भी जुड़ी है।
रिपोर्टों के अनुसार, 1883 में पहली प्रतिमा पश्चिम बंगाल के झालदा के जगन्नाथ लहरी ने तैयार की थी। बाद में बीरभूम के बेरवा गांव के सूत्रधार परिवार ने यह जिम्मेदारी संभाली। इस परिवार की पीढ़ियां लंबे समय से दुर्गाबाड़ी के लिए प्रतिमा बनाती आ रही हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, देवेंद्रनाथ सूत्रधार के बाद उनके बेटे और फिर अगली पीढ़ी ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
यही वजह है कि यहां की प्रतिमा सिर्फ पूजा की वस्तु नहीं, बल्कि एक पारंपरिक कला विरासत भी मानी जाती है।
1927 में बंद हुई बलि की परंपरा
दुर्गाबाड़ी की पूजा का इतिहास यह भी बताता है कि समय के साथ कुछ परंपराएं बदली हैं।
शुरुआती दौर में यहां बलि देने की परंपरा थी। रिपोर्टों के मुताबिक बकरे और भैंसे की बलि भी दी जाती थी। लेकिन 1927 में दुर्गाबाड़ी में बलि की परंपरा बंद कर दी गई।
इसके बाद प्रतीकात्मक रूप से भतुआ यानी कुम्हड़ा, नींबू और गन्ने की बलि देने की परंपरा अपनाई गई। इस बदलाव के बावजूद पूजा की मूल धार्मिक भावना और अनुष्ठानों की निरंतरता बनी रही।
यह बदलाव इस बात का उदाहरण है कि कैसे कोई परंपरा समय के साथ अपना स्वरूप बदल सकती है, लेकिन उसकी सांस्कृतिक पहचान बनी रह सकती है।
दशमी पर मां को बेटी की तरह दी जाती है विदाई
दुर्गाबाड़ी की पूजा का सबसे भावुक हिस्सा विजयादशमी का दिन होता है।
बंगाली समाज में मां दुर्गा को केवल शक्ति की देवी के रूप में नहीं, बल्कि उमा यानी घर की बेटी के रूप में भी देखा जाता है। मान्यता के भाव में मां कुछ दिनों के लिए अपने मायके यानी धरती पर आती हैं और दशमी के दिन अपने ससुराल कैलाश लौट जाती हैं।
इसीलिए यहां विदाई सिर्फ विसर्जन नहीं होती, बल्कि बेटी को विदा करने जैसा भाव दिखाई देता है।
दशमी के दिन महिलाएं पहले मां को सिंदूर अर्पित करती हैं और इसके बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सिंदूर खेला करती हैं। यह परंपरा रांची के बंगाली समाज की दुर्गा पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
दुर्गाबाड़ी में यह दृश्य खास तौर पर भावुक होता है। पूजा की चहल-पहल के बीच जब विदाई की तैयारी शुरू होती है, तो उत्सव का माहौल धीरे-धीरे भावनाओं में बदल जाता है।
कंधों पर उठाकर तालाब तक पहुंचाई जाती है प्रतिमा
दुर्गाबाड़ी की विदाई की एक और खासियत प्रतिमा का विसर्जन है।
रिपोर्टों के अनुसार, यहां मां दुर्गा की प्रतिमा को पारंपरिक तरीके से श्रद्धालु अपने हाथों और कंधों पर उठाकर विसर्जन स्थल तक ले जाते हैं। चडरी तालाब तक पहुंचने वाली यह यात्रा भी दुर्गाबाड़ी की पुरानी परंपराओं से जुड़ी बताई जाती है।
यानी जिस मां को पूरे विधि-विधान से आमंत्रित कर पूजा जाता है, उन्हें विदा भी उसी आत्मीयता से किया जाता है।
दुर्गाबाड़ी से आगे बढ़ी एक चाला की परंपरा
दुर्गाबाड़ी की एक चाला परंपरा सिर्फ इसी मंदिर तक सीमित नहीं रही। रांची के आसपास के कुछ पुराने पूजा स्थलों में भी इसका प्रभाव दिखाई देता है।
हाहे के दुर्गा मंदिर में भी एक चाला में देवी-देवताओं को स्थापित करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। इससे पता चलता है कि बंगाली समाज की पारंपरिक प्रतिमा शैली और पूजा पद्धति ने रांची और आसपास के इलाकों में किस तरह अपनी जगह बनाई।
143 साल बाद भी क्यों खास है दुर्गाबाड़ी?
आज रांची में दुर्गा पूजा के दौरान सैकड़ों पंडाल सजते हैं। कहीं भव्य महल दिखाई देता है, कहीं ऐतिहासिक इमारत की प्रतिकृति, तो कहीं किसी पौराणिक कथा पर आधारित विशाल संरचना।
लेकिन दुर्गाबाड़ी की खूबसूरती कुछ और है।
यहां भव्यता से ज्यादा परंपरा दिखाई देती है।
1883 से चली आ रही पूजा में आज भी षष्ठी की शुरुआत, छह कलश, एक चाला की प्रतिमा, पारंपरिक मूर्तिकार परिवार, 1927 से बंद बलि की जगह प्रतीकात्मक अनुष्ठान, सिंदूर खेला और भावुक विदाई जैसे कई पहलू जुड़े हुए हैं।
यही वजह है कि दुर्गाबाड़ी को सिर्फ एक पूजा स्थल के रूप में देखना इसके इतिहास को छोटा कर देना होगा। यह रांची में बंगाली समाज की सांस्कृतिक स्मृति का एक जीवंत हिस्सा है।
समय बदल गया, रांची बदल गई और दुर्गा पूजा का स्वरूप भी पहले से कहीं ज्यादा बड़ा हो गया। लेकिन दुर्गाबाड़ी आज भी यह याद दिलाती है कि किसी उत्सव की असली पहचान हमेशा उसकी भव्यता में नहीं होती। कई बार उसकी सबसे बड़ी ताकत उन छोटी-छोटी परंपराओं में छिपी होती है, जिन्हें पीढ़ियां बिना बदले आगे बढ़ाती रहती हैं।
और शायद यही वजह है कि 143 साल बाद भी दुर्गाबाड़ी में मां दुर्गा का आगमन सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि घर की बेटी के आने जैसा महसूस होता है—और दशमी की विदाई आज भी बेटी को ससुराल भेजने जैसी ही भावुक होती है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में शामिल ऐतिहासिक एवं धार्मिक परंपराओं से संबंधित जानकारी उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों और सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित है। विभिन्न स्रोतों में विवरण में अंतर संभव है। लेख का उद्देश्य उपलब्ध जानकारी के आधार पर दुर्गाबाड़ी की सांस्कृतिक विरासत को प्रस्तुत करना है, न कि किसी तथ्य या धार्मिक मान्यता की अंतिम प्रमाणिकता का दावा करना।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
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