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बांग्लादेश के लिए घातक साबित होगा भारत का कूटनीतिक प्रहार

जून 1, 2026
in झारखंड Jharkhand News
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-हरीश शिवनानी

एक पखवाड़ा पहले बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने जब चीन जाकर राष्ट्रपति शी जिनपिंग को भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से सटे लालमोनिरहाट में अपना एयरबेस बनाने का न्योता दिया था तो वे नहीं जानते थे कि वे कितना बड़ा दुःस्साहस कर रहे हैं। उन्होंने डीग हांकते हुए बांग्लादेश को भारत के इन सीमांत राज्यों का ‘गार्जियन’ (संरक्षक) तक घोषित कर दिया। 26-29 मार्च के बीच चीन यात्रा के दौरान यूनुस ने बीजिंग में डींग हांकी कि ‘नॉर्थ ईस्ट यानी भारत के सात राज्य लैंडलॉक्ड हैं, उनके पास समुद्र तक पहुँचने का रास्ता नहीं है। बांग्लादेश इस पूरे क्षेत्र के लिए समुद्र का एकमात्र संरक्षक है। यह चीन की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा अवसर हो सकता है।’

इस दुःस्साहस भरे न्यौते से भारत का सतर्क होना स्वाभाविक था। ‘सेवन सिस्टर्स’ और ‘चिकन नेक’ के नाम से ख्यात भारत के ये सीमांत राज्य सामरिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील हैं। बांग्लादेश का लालमोनिरहाट जिला भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर के बेहद करीब है, इस कारण भारत का चिंतित होना जायज है।

भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, नगालैंड, मिजोरम, त्रिपुरा और सिक्किम का सामूहिक रूप से बांग्लादेश के साथ 1,596 किमी. लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा, चीन के साथ 1,395 किमी, म्यांमार के साथ 1,640 और भूटान के साथ 455 किमी. तथा नेपाल के साथ 97 किमी सीमा है, लेकिन ये केवल 22 किमी की एक पट्टी के माध्यम से भारत के बाकी हिस्सों से जुड़े हैं, जिसे ‘चिकन नेक’ कॉरिडोर कहा जाता है। यह बेहद संकरा मार्ग है। इसके दक्षिण में बांग्लादेश और उत्तर में नेपाल, भूटान और चीन हैं। यह करीब 60 किमी. लंबा और 21 किमी. चौड़ा है। चिकन नेक कॉरिडोर ही पूर्वोतर राज्यों को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ता है। काफी संकरा होने के कारण चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान की नज़रें हमेशा से इस पर रही हैं। अगर बांग्लादेश के ज़रिए चीन यहाँ अपनी आर्थिक या सामरिक पकड़ बनाता है तो यह भारत के लिए सुरक्षा ख़तरा बन सकता है।

कुछ दिनों की खामोशी के बाद भारत ने मंगलवार आधी रात अचानक बांग्लादेश के लिए ‘ट्रांसशिपमेंट’ यानी भारत के बंदरगाहों और हवाई अड्डों से कारोबार करने की सुविधा बंद कर उसकी आर्थिक रीढ़ पर जोरदार चोट की है। अंतरराष्ट्रीय जगत में इसे बांग्लादेश पर भारत का बड़ा कूटनीतिक आर्थिक प्रहार माना जा रहा है। भारत ने बांग्लादेश को यह सुविधा तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ हुए ‘ट्रांसशिपमेंट एग्रीमेंट’ के तहत एक सर्कुलर से 29 जून 2020 को दी थी। यह सर्कुलर बांग्लादेश से तीसरे देशों को निर्यात कार्गो के ट्रांसशिपमेंट की अनुमति देता था, जो भारतीय बंदरगाहों और हवाई अड्डों के रास्ते भारतीय भूमि का उपयोग करता था, ताकि भूटान, नेपाल और म्यांमार जैसे देशों को बांग्लादेश का व्यापार हो सके। 8 अप्रैल को केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) पुराने सर्कुलर को रद्द कर दिया। थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के प्रमुख अजय श्रीवास्तव का कहना है कि नए सर्कुलर के साथ, ट्रांसशिपमेंट व्यवस्था तुरंत प्रभाव से समाप्त कर दी गई है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा, ‘बांग्लादेश को ट्रांसशिपमेंट सुविधा से भारत के बंदरगाहों व हवाई अड्‌डों पर असुविधा होने के साथ भारतीय निर्यात की लागत बढ़ रही थी और समय पर उत्पाद निर्यात करने में देरी होने लगी थी। ऐसे में 8 अप्रैल 2025 से यह सुविधा समाप्त की जा रही है।

दरअसल, पिछले वर्ष अगस्त में बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिराने के बाद से वहां भारत विरोधी गतिविधियां काफी बढ़ गई। हाल ही चीन यात्रा के दौरान युनूस का बयान भारत में चर्चा का विषय बना हुआ था। अब भारत की ओर से जो निर्णय लिया गया है, जिसे कूटनीतिक भाषा में ‘काउंटर मूव’ कहा जाता है। यूनुस की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था संकट में है और वह चीन से निवेश की उम्मीद कर रहा है। चीन ने पहले ही मोंगला पोर्ट के लिए 400 मिलियन डॉलर और चटगांव में आर्थिक ज़ोन के लिए 350 मिलियन डॉलर का वादा कर रखा है।

भारत ने बांग्लादेश के एक्सपोर्ट कार्गो के लिए ट्रांसशिपमेंट सुविधा समाप्त कर देने से बांग्लादेश, भारत होकर भूटान, नेपाल और म्यांमार को निर्यात नहीं कर पाएगा। भारत का यह क़दम बांग्लादेश को साफ़ संदेश देता है कि वह अपनी सामरिक स्थिति का दुरुपयोग करके भारत के हितों को चुनौती नहीं दे सकता। भारत के इस निर्णय से पहले ही आर्थिक रूप से बदहाल बांग्लादेश का व्यापार खासा प्रभावित होगा। म्यांमार, नेपाल और भूटान को अपना सामान भेजने के लिए अब उसे महंगा और लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा। भूटान, नेपाल और म्यांमार तीसरे देशों के साथ व्यापार के लिए भारतीय रास्तों पर निर्भर हैं। पहले भारत से होकर जाने वाला रास्ता आसान था। इससे समय और पैसे की बचत होती थी। अब बांग्लादेश के व्यापारियों को ज्यादा समय लगेगा, ज्यादा खर्चा आएगा और अनिश्चितता बढ़ेगी।

यह सुविधा बंद करने से भारत के लिए सामरिक चुनौती पैदा करने वाले दो पड़ोसी देशों पाकिस्तान और चीन के साथ रक्षा व कारोबारी संबंध बढ़ाने में जुटे बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार को भारत ने बड़ा सबक दिया है। भारत का यह फैसला पहले से घटते निर्यात और अमेरिकी सरकार की तरफ से बांग्लादेश पर 37 फ़ीसदी पारस्परिक शुल्क की घोषणा से बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था और बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।

बांग्लादेश म्यांमार को मुख्य रूप से वस्त्र, दवाइयाँ, और खाद्य उत्पाद जैसे आलू और मछली निर्यात करता है, वहीं म्यांमार से बांग्लादेश मुख्य रूप से लकड़ी, समुद्री उत्पाद और कुछ कृषि उत्पाद आयात करता है। इसी तरह बांग्लादेश और नेपाल दोनों देश दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के सदस्य हैं, जो सदस्य देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देता है। बांग्लादेश नेपाल को मुख्य रूप से तैयार वस्त्र, जूट उत्पाद, चाय पैकेजिंग सामग्री, और कुछ औद्योगिक सामान निर्यात करता है बदले में बांग्लादेश यार्न (धागा), दाल, हर्बल उत्पाद, और हस्तशिल्प आयात करता है। 2023 में बंगलाबंध भूमि बंदरगाह खुलने से नेपाल से यार्न का आयात बढ़ा है। बांग्लादेश और भूटान के बीच व्यापार बहुत सीमित है, क्योंकि दोनों देशों के बीच कोई सीधा भौगोलिक संपर्क नहीं है और भूटान की अर्थव्यवस्था बहुत छोटी है। बांग्लादेश भूटान को कपड़ा, जूते और कुछ निर्माण सामग्री निर्यात करता है। भूटान से बांग्लादेश मुख्य रूप से पत्थर, चूना पत्थर और कुछ हाइड्रोपावर-संबंधी उत्पाद आयात करता है।

अर्थ-विशेषज्ञों के अनुसार भारत के इस निर्णय से वस्त्र, जूते, रत्न एवं आभूषण जैसे कई भारतीय निर्यात क्षेत्रों को नए अवासर मिलेंगे। परिधान क्षेत्र में बांग्लादेश भारत का बड़ा प्रतिस्पर्धी है। कहा जा सकता है कि अस्थिरता और संकट के इस दौर में बांग्लादेश ने भारत को कमतर आंक कर जिस दुःस्साहस का परिचय दिया है, उसे भारतीय ज्ञान-परंपरा में ‘विनाश काले विपरीत बुद्धि’ कहा गया है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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