Big Breaking : प्रकृति के प्रहरी कहे जाने वाले अरावली पर्वतमाला के अस्तित्व को लेकर चल रही कानूनी जंग में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने स्पष्ट संदेश दिया कि विकास और खनन की होड़ में पर्यावरण की बलि नहीं चढ़ने दी जाएगी।
अदालत ने विशेषज्ञ समिति की उन विवादित सिफारिशों पर फिलहाल रोक लगा दी है, जिन्हें लेकर अरावली के भविष्य पर संकट के बादल मंडरा रहे थे। अब इस पूरे मामले की विस्तृत समीक्षा 21 जनवरी 2026 को होगी।
Big Breaking : क्या अरावली की पहचान पर मंडरा रहा है खतरा?
इस पूरे विवाद की जड़ अरावली की नई ‘परिभाषा’ में छिपी है। दरअसल, वर्तमान में केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली के दायरे में रखने की बात कही जा रही है। पर्यावरणविदों का तर्क है कि अगर परिभाषा को संकुचित किया गया, तो अरावली का एक बड़ा हिस्सा संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएगा, जिससे अवैध खनन और निर्माण को बढ़ावा मिलेगा।
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मुख्य न्यायाधीश ने इस पर गहरी चिंता जताते हुए सवाल किया कि क्या 500 मीटर के दायरे की सीमा तय करने से पारिस्थितिक निरंतरता (Ecological Continuity) खतरे में नहीं पड़ जाएगी?
Big Breaking : अदालत का रुख: भ्रम दूर करना जरूरी
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि अरावली संरक्षण को लेकर समाज में कई तरह की गलतफहमियां फैल रही हैं। इस पर CJI ने सहमति जताते हुए कहा कि अदालत की मंशा और निष्कर्षों का गलत अर्थ निकाला जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट अब एक ‘हाई पावर्ड कमेटी’ गठित करने पर विचार कर रहा है, जो मौजूदा रिपोर्ट का निष्पक्ष और स्वतंत्र मूल्यांकन करेगी। कोर्ट यह सुनिश्चित करना चाहता है कि अगर दो पहाड़ियों के बीच 700 मीटर का अंतर है, तो वहां ‘नियंत्रित खनन’ की अनुमति देने से पहले पर्यावरण पर उसके दीर्घकालिक प्रभाव को गहराई से परखा जाए।
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अदालत का यह कदम दर्शाता है कि न्यायपालिका केवल फाइलों पर नहीं, बल्कि जमीन पर पहाड़ों की मजबूती और हरियाली को बचाने के लिए गंभीर है। जब तक यह विशेषज्ञ जांच पूरी नहीं होती, पुरानी सिफारिशें ठंडे बस्ते में ही रहेंगी।













