Breaking News: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को धर्म परिवर्तन और आरक्षण से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया कि केवल हिंदू धर्म से इस्लाम अपनाने भर से कोई व्यक्ति अपने पुराने सामाजिक दर्जे के आधार पर पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का दावा नहीं कर सकता। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस चंद्रशेखर की पीठ ने तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
Breaking News: स्थानीय प्रशासन ने आवेदन खारिज कर दिया
मामला तमिलनाडु के तूतीकोरिन जिले के समीर अहमद से जुड़ा है। उन्होंने 2015 में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया था और बाद में ‘मुस्लिम लेब्बाई’ समुदाय का प्रमाणपत्र मांगा था। स्थानीय प्रशासन ने उनका आवेदन खारिज कर दिया था। इसके बाद मामला मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा।
तमिलनाडु सरकार ने मार्च 2024 में एक आदेश जारी किया था। इसमें पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदाय और अनुसूचित जाति से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को कुछ शर्तों के तहत पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में आरक्षण का लाभ देने का प्रावधान किया गया था। मद्रास हाईकोर्ट ने जून 2026 में इस आदेश को रद्द कर दिया था।
Breaking News: अनुसूचित जाति का संवैधानिक दर्जा हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म मानने वालों तक सीमित
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद पहले की सामाजिक स्थिति अपने आप नई धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था में आरक्षण का आधार नहीं बन सकती। अदालत ने यह भी दोहराया कि अनुसूचित जाति का संवैधानिक दर्जा हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म मानने वालों तक सीमित है।
फैसले का सीधा असर तमिलनाडु में धर्म परिवर्तन के बाद पिछड़ा वर्ग मुस्लिम आरक्षण का दावा करने वाले मामलों पर पड़ेगा। साथ ही, यह फैसला धर्म, सामाजिक पिछड़ेपन और आरक्षण के बीच कानूनी संबंध को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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