गांधी के नाम के साथ तीन चीजें अक्सर याद आती हैं-चश्मा, चरखा और तीन बंदर।
चश्मा उनकी पहचान बना, चरखा उनके आंदोलन का प्रतीक बना…
लेकिन सवाल है-
गांधी के साथ हमेशा जोड़े जाने वाले ये तीन बंदर आखिर उनके पास आए कहां से?
इसकी कहानी शायद गांधी जयंती की सबसे कम सुनाई जाने वाली कहानियों में से एक है।
कहा जाता है कि एक दिन गांधी से मिलने चीन से कुछ मेहमानों का समूह आया। बातचीत के बाद उन्होंने गांधी को एक छोटा-सा तोहफा दिया।
उन्होंने कहा कि यह बहुत बड़ा तोहफा नहीं है, बच्चों के खिलौने जितना ही छोटा है, लेकिन उनके देश में काफी प्रसिद्ध है।
जब गांधी ने उसे खोला, तो उसमें थे-तीन छोटे बंदर।
एक ने अपनी आंखें ढक रखी थीं।
दूसरे ने कान।
और तीसरे ने मुंह।
गांधी को यह छोटा-सा उपहार इतना पसंद आया कि वे इसे अपने पास रखने लगे। गांधी से जुड़े एक संस्मरण में मार्जोरी साइक्स ने इसी घटना का उल्लेख किया है और लिखा है कि ये तीन बंदर बाद में गांधी के साथ इतने प्रसिद्ध हो गए कि जीवन के आखिरी समय तक उनके पास संभालकर रखे गए।
लेकिन असली कहानी बंदरों के गांधी तक पहुंचने के बाद शुरू होती है।
तीन बंदर सिर्फ खिलौने नहीं थे
इन तीनों की मुद्रा एक संदेश देती थी-
बुरा मत देखो।
बुरा मत सुनो।
बुरा मत बोलो।
गांधी ने भी बाद के वर्षों में इन बंदरों को अपने जीवन से जोड़कर देखा। 1940 में उन्होंने जापान के कोबे में मौजूद तीन बंदरों की आकृति का उल्लेख करते हुए कहा था कि वे दुनिया को बुराई न देखने, न सुनने और न बोलने की सीख देते हैं।
लेकिन गांधी के लिए इसका मतलब यह नहीं था कि अन्याय देखकर आंखें बंद कर लो।
बल्कि सवाल था-
आप क्या देखते हैं?
क्या सुनते हैं?
और अपनी जुबान से क्या फैलाते हैं?
यही वजह थी कि गांधी उन छोटे बंदरों को अपने पास रखते थे।
सेवाग्राम आश्रम से जुड़े रिकॉर्ड में भी इन बंदरों का उल्लेख मिलता है। वहां उन्हें चीन की मिट्टी से बने छोटे खिलौनों जैसी आकृतियों के रूप में बताया गया है।
और गांधी के जीवन में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है।
वे जरूरत से ज्यादा चीजें अपने पास रखने के पक्ष में नहीं थे। फिर भी तीन छोटे बंदर उनके लिए खास बन गए।
शायद इसलिए क्योंकि वे उन्हें कोई महंगी वस्तु नहीं, बल्कि हर दिन याद दिलाने वाली एक छोटी-सी सीख लगते थे।
आज गांधी जयंती पर उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब दिखाई देंगी।
चश्मा दिखेगा।
चरखा दिखेगा।
गांधी की मूर्तियां दिखेंगी।
लेकिन अगली बार जब आपको गांधी के तीन बंदर दिखाई दें, तो उन्हें सिर्फ एक प्रसिद्ध प्रतीक की तरह मत देखिए।
उनसे तीन सवाल पूछिए-
जो देख रहा हूं, क्या वह देखने लायक है?
जो सुन रहा हूं, क्या उसे आगे बढ़ाना जरूरी है?
और जो बोल रहा हूं, क्या उससे किसी को नुकसान तो नहीं होगा?
शायद यही वजह है कि गांधी के पास मौजूद एक छोटा-सा खिलौना आज भी उनकी तस्वीरों से कहीं ज्यादा बड़ी कहानी कहता है।
तीन बंदर गांधी के पास आए थे एक छोटे से तोहफे की तरह…
लेकिन जाते-जाते वे गांधी की पहचान का हिस्सा बन गए।

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