रिपोर्ट: रितिका सिंह
गणेश चतुर्थी विशेष: घर-घर गणपति विराजेंगे, आरती होगी और ‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयकारे गूंजेंगे। लेकिन जिस गणेश की पूजा सबसे पहले की जाती है, उनके जन्म की कहानी क्या आप जानते हैं? आम तौर पर हम वही कथा सुनते आए हैं कि माता पार्वती ने गणेश को बनाया, भगवान शिव ने उनका सिर काट दिया और बाद में हाथी का सिर लगाकर उन्हें जीवन दिया। लेकिन गणेश के जन्म की कहानी का यह सिर्फ एक रूप है। अलग-अलग पुराणिक परंपराओं में उनकी उत्पत्ति के अलग-अलग प्रसंग मिलते हैं।
पार्वती के बनाए बालक से शुरू होती है सबसे प्रसिद्ध कथा
गणेश जन्म की सबसे लोकप्रिय कथा में माता पार्वती और उनके पुत्र का संबंध केंद्र में है। कथा के अनुसार, माता पार्वती ने अपने शरीर पर लगाए गए उबटन से एक बालक का निर्माण किया और उसमें प्राण डाल दिए। वह बालक उनके लिए पुत्र के समान था।
एक दिन स्नान के लिए जाने से पहले पार्वती ने उसे द्वार पर पहरा देने को कहा। आदेश था कि उनकी अनुमति के बिना किसी को भीतर प्रवेश न करने दिया जाए। इसी दौरान भगवान शिव वहां पहुंचे। गणेश उन्हें पहचान नहीं पाए और माता की आज्ञा का पालन करते हुए उन्हें भी रोक दिया।
जब आज्ञा का पालन बना पिता-पुत्र के संघर्ष की वजह
गणेश के रास्ता रोकने से विवाद बढ़ गया। भगवान शिव और गणेश के बीच संघर्ष हुआ। कथा के अनुसार, क्रोधित शिव ने गणेश का सिर काट दिया।
जब माता पार्वती को इसकी जानकारी हुई तो वह अत्यंत क्रोधित हो गईं। उन्होंने अपने पुत्र को पुनर्जीवित करने की मांग की। इसके बाद भगवान शिव ने गणेश को नया जीवन देने का वचन दिया।
हाथी का सिर क्यों लगाया गया?
कथा के अनुसार, शिव के गणों को ऐसे प्राणी का सिर लाने के लिए कहा गया जिसका मुख उत्तर दिशा की ओर हो। उन्हें हाथी का सिर मिला। इसी सिर को गणेश के शरीर से जोड़ा गया और उन्हें पुनर्जीवन मिला।
यहीं से गणेश का वह स्वरूप सामने आता है, जिसे आज पूरा संसार पहचानता है-हाथी के मुख वाले गजानन।
लेकिन गणेश के जन्म की दूसरी कथाएं भी हैं
गणेश की जन्मकथा का सबसे कम चर्चित पहलू यही है कि अलग-अलग पुराणों में उनका जन्म एक ही तरह से नहीं बताया गया है। कुछ पुराणिक परंपराओं में गणेश की उत्पत्ति को शिव और पार्वती की दिव्य शक्तियों से जोड़ा गया है। यानी गणेश जन्म की कथा केवल एक घटना नहीं, बल्कि समय के साथ अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में विकसित हुआ एक व्यापक आख्यान है।
यही विविधता भारतीय धार्मिक परंपरा की एक खास विशेषता भी है-एक ही देवता से जुड़ी कथा अलग ग्रंथों और क्षेत्रों में अलग रूप ले सकती है।
सिर बदलने के बाद क्या हुआ?
गणेश को जीवन मिलने के बाद भगवान शिव ने उन्हें विशेष सम्मान दिया। उन्हें गणों का प्रमुख बनाया गया। इसी कारण वे गणपति कहलाए।
गणेश के कई नाम उनके अलग-अलग स्वरूपों और गुणों से जुड़े हैं। गजानन, एकदंत, लंबोदर, विनायक और विघ्नहर्ता उनके प्रमुख नामों में शामिल हैं।
फिर गणेश ही क्यों बने प्रथम पूज्य?
गणेश को प्रथम पूज्य माने जाने की परंपरा भी उनकी लोकप्रियता का बड़ा कारण है। धार्मिक मान्यता है कि किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणेश पूजा से करने पर विघ्न दूर होते हैं।
इसी वजह से उन्हें विघ्नहर्ता कहा जाता है। विवाह हो, गृह प्रवेश हो, पूजा हो या किसी नए काम की शुरुआत-सबसे पहले गणेश का स्मरण करने की परंपरा आज भी कायम है।
गणेश का रूप भी देता है कई संदेश
गणेश की प्रतिमा का हर अंग प्रतीकात्मक अर्थ से जोड़ा जाता है। उनका बड़ा सिर व्यापक सोच और बुद्धि का, बड़े कान ध्यान से सुनने का और छोटी आंखें एकाग्रता का प्रतीक मानी जाती हैं।
उनका बड़ा पेट जीवन में मिलने वाली परिस्थितियों को सहजता से स्वीकार करने की सीख से जोड़ा जाता है। हालांकि इन प्रतीकों की व्याख्या अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में अलग हो सकती है।
इस गणेश चतुर्थी कहानी को एक नए नजरिए से देखिए
गणेश चतुर्थी पर जब घर-घर गणपति की स्थापना होगी, तब उनके जन्म की कथा भी सुनाई जाएगी। लेकिन इस कथा का सबसे रोचक पक्ष शायद यही है कि इसका केवल एक संस्करण नहीं है।
एक ओर वह लोकप्रिय कथा है जिसमें पार्वती अपने हाथों से पुत्र का निर्माण करती हैं, शिव उसका सिर काटते हैं और फिर हाथी का सिर लगाकर उसे नया जीवन मिलता है। दूसरी ओर पुराणों की अलग-अलग परंपराएं गणेश की उत्पत्ति को अलग दृष्टि से सामने रखती हैं।
शायद यही वजह है कि हजारों वर्षों बाद भी गणेश की कथा हर पीढ़ी को अपनी ओर खींचती है-क्योंकि इसमें केवल एक जन्म की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा की विविधता भी छिपी है।
कंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।







