PUBLISHED BY: RITIKA SINGH
Hartalika Teej 2026: हरतालिका तीज का नाम आते ही आंखों के सामने सजी-धजी महिलाएं, हाथों में मेहंदी, पूजा की तैयारी और भगवान शिव-पार्वती की आराधना की तस्वीर उभरती है। लेकिन इस पर्व की कहानी केवल व्रत और पूजा तक सीमित नहीं है। हरतालिका तीज सदियों से महिलाओं के बीच रिश्तों, लोक परंपराओं, मायके की याद और अपनी भावनाओं को साझा करने का अवसर भी रही है।
इस वर्ष हरतालिका तीज 14 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन महिलाएं पति की लंबी उम्र, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना से व्रत रखती हैं। कई जगह अविवाहित युवतियां भी मनचाहे वर की कामना से यह व्रत करती हैं।
हरतालिका तीज सिर्फ एक व्रत नहीं
आज तीज को अक्सर केवल पति की लंबी उम्र से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसकी सामाजिक परंपरा इससे कहीं व्यापक है। तीज के अवसर पर महिलाएं एक-दूसरे के घर जाती हैं, साथ मिलकर पूजा की तैयारी करती हैं, मेहंदी लगाती हैं, गीत गाती हैं और पुरानी यादें साझा करती हैं।
कई परिवारों में तीज के दौरान बेटी के मायके आने या उसके लिए कपड़े, श्रृंगार सामग्री और पूजा का सामान भेजने की परंपरा रही है। यही वजह है कि शादीशुदा महिलाओं के लिए तीज का रिश्ता केवल ससुराल से नहीं, बल्कि मायके से भी भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है।
तीज के लोकगीतों में छिपी महिलाओं की अपनी दुनिया
हरतालिका तीज से जुड़े लोकगीत इस पर्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन गीतों में केवल शिव-पार्वती की कथा नहीं होती, बल्कि विवाह, मायके, ससुराल, पति, परिवार और अपने मन की भावनाओं का भी जिक्र मिलता है।
पहले गांव-मोहल्लों में महिलाएं समूह बनाकर तीज के गीत गाती थीं। इन गीतों के जरिए एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को परंपराएं और लोक-स्मृतियां सौंपती थी।
यही कारण है कि तीज को केवल धार्मिक अनुष्ठान के रूप में देखना इसकी सांस्कृतिक भूमिका को छोटा कर देता है।
मायके की याद से जुड़ा है तीज का रिश्ता
बिहार समेत उत्तर भारत के कई हिस्सों में तीज का एक भावनात्मक पक्ष मायके से जुड़ाव है। शादी के बाद जब बेटियां अपने मायके आती हैं तो तीज उनके लिए पुराने रिश्तों से फिर जुड़ने का अवसर बनती है।
कई घरों में मां-बेटी के बीच तीज के मौके पर विशेष तैयारी होती है। बेटी के लिए साड़ी, चूड़ी, सिंदूर, मेहंदी, मिठाई और अन्य सामान भेजने की परंपरा भी कई परिवारों में आज तक जारी है।
बदलते समय में इन परंपराओं का स्वरूप जरूर बदला है, लेकिन इनके पीछे छिपा भाव आज भी कायम है।
सोलह शृंगार और मेहंदी भी पर्व का हिस्सा
तीज के दिन पूजा के साथ महिलाओं के श्रृंगार का भी विशेष महत्व दिखाई देता है। मेहंदी, चूड़ी, सिंदूर, बिंदी और पारंपरिक परिधान इस पर्व की पहचान बन चुके हैं।
शहरों में जहां पहले महिलाएं घर पर ही मेहंदी लगाती थीं, वहीं अब तीज से पहले बाजारों और मेहंदी कलाकारों के यहां भी भीड़ देखने को मिलती है। सोशल मीडिया ने भी इस परंपरा को एक नया रूप दिया है। तीज की मेहंदी और श्रृंगार की तस्वीरें अब परिवार और मोहल्ले तक सीमित नहीं रहतीं।
नई पीढ़ी के लिए बदल रहा है तीज का अर्थ
आज की पीढ़ी में हरतालिका तीज की परंपरा बनी हुई है, लेकिन इसे मनाने का तरीका बदल रहा है। पूजा और व्रत के साथ महिलाएं अब इस दिन को परिवार के साथ समय बिताने और अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़ने के अवसर के रूप में भी देखती हैं।
ऑनलाइन खरीदारी, सोशल मीडिया, डिजिटल निमंत्रण और तैयार पूजा सामग्री ने त्योहार की तैयारियों को आसान किया है। इसके बावजूद तीज की मूल पहचान-शिव-पार्वती की पूजा और महिलाओं के बीच सामूहिकता-काफी हद तक कायम है।
हरतालिका नाम के पीछे भी जुड़ी है महिला मित्रता की कहानी
हरतालिका तीज की धार्मिक कथा में भी एक महिला सखी की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है। मान्यता के अनुसार माता पार्वती भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करना चाहती थीं। जब उनके पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से करना चाहते थे, तब उनकी सखी उन्हें वन में ले गईं। वहां पार्वती ने शिव को पाने के लिए तपस्या की।
इसी प्रसंग से ‘हरतालिका’ नाम जुड़ने की पारंपरिक व्याख्या की जाती है। इस कथा का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि संकट की स्थिति में पार्वती की सखी उनके साथ खड़ी हुईं। यही कारण है कि तीज की कहानी में महिला-सखी के रिश्ते को भी एक अलग सांस्कृतिक अर्थ मिलता है।
2026 में क्या है खास?
इस वर्ष हरतालिका तीज 14 सितंबर, सोमवार को है। पंचांग गणना के अनुसार तृतीया तिथि 14 सितंबर की सुबह तक रहेगी और इसके बाद चतुर्थी शुरू होगी। इसलिए 14 सितंबर की तारीख तीज के लिहाज से विशेष है। हालांकि तीज के पूजा मुहूर्त में शहर के अनुसार अंतर हो सकता है। इसलिए व्रत और पूजा करने वाली महिलाओं को अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार समय देखना चाहिए।
हरतालिका तीज को अगर सिर्फ एक दिन के व्रत के रूप में देखा जाए तो इसकी कहानी का बड़ा हिस्सा छूट जाता है। यह पर्व धर्म के साथ रिश्तों, लोकगीतों, मायके की स्मृतियों, महिला मित्रता और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपराओं को भी अपने भीतर समेटे हुए है। समय बदला, तीज मनाने के तरीके बदले और इसकी तैयारियां आधुनिक हुईं, लेकिन इस पर्व से जुड़ी भावनाएं आज भी उतनी ही गहरी हैं।
कंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।









