पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। पूर्व सांसद फुरकान अंसारी ने चुनाव परिणाम पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे लोकतंत्र की जीत नहीं, बल्कि “तंत्र के दुरुपयोग” का परिणाम बताया है।
उन्होंने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “जब अंपायर ही पक्षपाती हो जाए, तो कमजोर टीम भी मैच आसानी से जीत जाती है — और यही पश्चिम बंगाल में देखने को मिला।”
अंसारी ने आरोप लगाया कि चुनाव पूरी तरह से भारत निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने कहा कि यह चुनाव असल में ममता बनर्जी और चुनाव आयोग के बीच की लड़ाई बनकर रह गया था।
भाजपा पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि सत्ता के प्रभाव का उपयोग कर चुनावी माहौल को प्रभावित किया गया। अंसारी के मुताबिक, केंद्रीय एजेंसियों और सुरक्षा बलों—जैसे केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, सीमा सुरक्षा बल और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस—की भारी तैनाती से चुनाव का संतुलन बिगाड़ा गया।
उन्होंने यह भी दावा किया कि मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम हटाए गए, जिससे बड़ी संख्या में लोग मतदान से वंचित रह गए।
अंसारी ने आगे कहा कि कई राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री चुनाव के दौरान बंगाल में सक्रिय रहे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि चुनाव को प्रभावित करने के लिए पूरी ताकत झोंकी गई।
धार्मिक ध्रुवीकरण के मुद्दे पर भी उन्होंने भाजपा को घेरा। उनका कहना था कि बंगाल की सामाजिक संरचना आज भी सौहार्दपूर्ण है। “यहां हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच कोई दूरी नहीं है। लोग मिल-जुलकर रहते हैं, लेकिन चुनाव के दौरान इसे धार्मिक रंग देने की कोशिश की गई,” उन्होंने कहा।
एक महिला नेता के खिलाफ पूरे सरकारी तंत्र के इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए अंसारी ने कहा कि यह लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। इससे राज्य की महिलाओं, गरीबों और आम जनता में निराशा का माहौल है।
अंत में उन्होंने कहा, “इस चुनाव को जनता या किसी विचारधारा की जीत कहना गलत होगा। यह जीत लोकतंत्र की नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की है — और इसकी सच्चाई जनता भली-भांति समझ रही है।”







