रांची: नवरात्रि आते ही झारखंड में दुर्गा पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। कहीं भव्य पंडाल सजते हैं, तो कहीं मां दुर्गा की प्रतिमाओं के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। हिंदू धार्मिक मान्यता में महिषासुर वध को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि झारखंड में एक ऐसा आदिवासी समुदाय भी है, जो महिषासुर को अपना पूर्वज मानता है?
इस समुदाय का नाम है असुर जनजाति। इसके कुछ सदस्यों की पारंपरिक मान्यताओं में नवरात्रि और दुर्गा पूजा का समय उत्सव के बजाय पूर्वजों के स्मरण और शोक से जुड़ा है। यही वजह है कि असुर समुदाय की परंपराएं हर साल इस सवाल को सामने लाती हैं कि एक ही धार्मिक कथा को अलग-अलग समुदाय किस तरह देखते हैं।
कौन हैं झारखंड की असुर जनजाति?
असुर झारखंड के प्राचीन आदिवासी समुदायों में से एक है। इसे भारत सरकार ने विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह यानी PVTG की श्रेणी में रखा है। 2011 की जनगणना के आधार पर प्रकाशित रिपोर्टों में झारखंड में असुर समुदाय की आबादी लगभग 22 से 23 हजार बताई गई है।
इस समुदाय की प्रमुख आबादी गुमला और लातेहार जिलों में रहती है। इसके अलावा लोहरदगा, पलामू और नेतरहाट के आसपास के इलाकों में भी असुर परिवारों की बस्तियां हैं।
असुर समुदाय की अपनी भाषा और सांस्कृतिक परंपराएं हैं। असुर भाषा ऑस्ट्रोएशियाटिक भाषा परिवार की मुंडा शाखा से संबंधित है। पारंपरिक रूप से असुर समुदाय के लोग लौह अयस्क से लोहा गलाने और धातु तैयार करने की कला के लिए भी जाने जाते रहे हैं। हालांकि, समय के साथ उनकी आजीविका में बदलाव आया है और आज अनेक परिवार खेती तथा दूसरे कामों पर निर्भर हैं।
महिषासुर को पूर्वज क्यों मानते हैं असुर?
हिंदू धार्मिक कथाओं के अनुसार, महिषासुर एक शक्तिशाली असुर था, जिसका देवी दुर्गा ने युद्ध में वध किया था। इसी कथा से दुर्गा पूजा और विजयादशमी की परंपराएं जुड़ी हैं।
लेकिन असुर समुदाय के कुछ लोगों की मान्यता इससे अलग है। वे महिषासुर को केवल एक राक्षस के रूप में नहीं, बल्कि अपने पूर्वज के रूप में देखते हैं। उनके लिए यह कथा अपनी सामुदायिक पहचान और पीढ़ियों से चली आ रही लोक-स्मृति से जुड़ी हुई है।
यहां यह समझना जरूरी है कि महिषासुर को अपना पूर्वज मानने का दावा समुदाय की पारंपरिक आस्था है। इसे प्रमाणित ऐतिहासिक वंशावली के रूप में स्थापित नहीं किया गया है। इस मान्यता का उल्लेख करते समय धार्मिक कथा और समुदाय की सांस्कृतिक स्मृति के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
नवरात्रि में क्यों मनाते हैं शोक?
असुर समुदाय की कुछ पारंपरिक मान्यताओं में दुर्गा पूजा के दौरान उत्सव से दूरी बनाए रखने और महिषासुर को याद करने की परंपरा बताई जाती है। कुछ रिपोर्टों में इस अवधि को पूर्वजों के स्मरण और शोक के समय के रूप में वर्णित किया गया है।
इस परंपरा के पीछे समुदाय के कुछ लोगों की सोच यह है कि जिस पात्र के वध का उत्सव मनाया जाता है, उसे वे अपने पूर्वज के रूप में याद करते हैं। इसलिए उनके लिए यह प्रसंग अलग भावनात्मक अर्थ रखता है।
हालांकि, यह मान लेना सही नहीं होगा कि असुर समुदाय के सभी लोग नवरात्रि के दौरान एक जैसा व्यवहार करते हैं। अलग-अलग गांवों, परिवारों और पीढ़ियों के बीच रीति-रिवाजों में अंतर हो सकता है। समय के साथ सामाजिक बदलावों का असर भी इन परंपराओं पर पड़ा है।
क्या सिर्फ असुर समुदाय ही महिषासुर को याद करता है?
नहीं। झारखंड और आसपास के कुछ इलाकों में अन्य आदिवासी समुदायों के बीच भी महिषासुर से जुड़ी अलग-अलग मान्यताएं देखने को मिलती हैं।
गोड्डा जिले के बलबड्डा में संथाल समुदाय के कुछ लोगों द्वारा महिषासुर के स्मरण और सार्वजनिक आयोजन किए जाने की खबरें सामने आती रही हैं। कुछ संथाल परंपराओं में उन्हें ‘हुदुड़ दुर्गा’ नाम से भी याद किया जाता है।
इन समुदायों के कुछ लोगों की आपत्ति दुर्गा पूजा की उन प्रतिमाओं और चित्रणों से जुड़ी है, जिनमें महिषासुर को पराजित होते हुए दिखाया जाता है। उनका मानना है कि इससे उनकी पूर्वज-संबंधी मान्यताओं और सांस्कृतिक पहचान को ठेस पहुंच सकती है।
दूसरी ओर, करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए दुर्गा पूजा शक्ति, आस्था और बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है। इसलिए इस विषय को समझने के लिए दोनों पक्षों की मान्यताओं और सांस्कृतिक संदर्भों को जानना जरूरी है।
बदलते समय में अपनी पहचान बचाने की चुनौती
असुर समुदाय की सांस्कृतिक पहचान केवल महिषासुर से जुड़ी मान्यता तक सीमित नहीं है। इसकी भाषा, पारंपरिक लौह कला, प्रकृति से जुड़ी आस्थाएं और सामाजिक रीति-रिवाज भी इसकी विरासत का हिस्सा हैं।
समुदाय की भाषा और परंपराओं को सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर सांस्कृतिक दस्तावेजीकरण, भाषा संरक्षण और समुदाय के बुजुर्गों से मौखिक इतिहास संकलित करने जैसे प्रयास उपयोगी हो सकते हैं।
असुर जनजाति की कहानी हमें यह समझने का अवसर देती है कि भारत की सांस्कृतिक विविधता में एक ही कथा के कई अर्थ हो सकते हैं। किसी समुदाय की मान्यता को समझने का मतलब दूसरी आस्था को कमतर आंकना नहीं, बल्कि उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ को जानना है।
निष्कर्ष: झारखंड की असुर जनजाति और महिषासुर से जुड़ी उसकी मान्यताएं देश की विविध लोक-परंपराओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। नवरात्रि के उत्सव के बीच इस समुदाय की कहानी को जानना हमें आस्था, इतिहास और आदिवासी पहचान के अलग-अलग पहलुओं को समझने का मौका देता है।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
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