Jharkhand: झारखंड सरकार ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए वन क्षेत्रों में 300 फीट से अधिक Deep Boring पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। यह निर्णय पर्यावरण विभाग और राज्य जैव विविधता पर्षद की सिफारिश पर लिया गया है। इसका असर सड़क निर्माण, बिजली व संचार टावरों की स्थापना और खनन परियोजनाओं पर पड़ेगा।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि अब किसी भी योजना के लिए नदी, नाले या डैम से पानी लेने से पहले संबंधित वन प्रशासन को सूचना देनी होगी। साथ ही पर्यावरण व फॉरेस्ट क्लीयरेंस के लिए जल उपयोग का आकलन अनिवार्य होगा।
अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं,
हमारी हवा, पानी और आने वाली पीढ़ियों की ढाल है। 🌍🌳अगर आज चुप रहे,
तो कल पछताना पड़ेगा।✊ अब आवाज़ उठाइए,
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— Max_Yogi001 (@MaxYogi001) December 22, 2025
बारिश से बढ़ा भूजल, सरकार ने अवसर को बनाया नीति
राज्य में इस वर्ष औसत से अधिक बारिश के कारण वन क्षेत्रों में भूगर्भ जल स्तर में सुधार दर्ज किया गया है। जंगलों में बहने वाले नालों और प्राकृतिक चेकडैम से रिचार्ज बढ़ा है। वन एवं पर्यावरण विभाग का मानना है कि यदि अभी सख्ती नहीं बरती गई तो भविष्य में यह लाभ खत्म हो सकता है। इसी वजह से डीप बोरिंग पर रोक का फैसला लिया गया।
अब समझिए पूरा अरावली विवाद, जो बना राष्ट्रीय बहस का मुद्दा
झारखंड के इस फैसले के बीच देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली रेंज को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले से देशभर में बहस छिड़ गई है।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को स्वीकार किया। इसके तहत:
- केवल वही भू-आकृतियां अरावली मानी जाएंगी,
- जो आसपास की जमीन से कम से कम 100 मीटर ऊंची हों।
- और 500 मीटर के भीतर मौजूद पहाड़ियों के समूह को “रेंज” माना जाएगा।
सरकार का तर्क है कि इससे प्रशासनिक स्पष्टता आएगी और एक सस्टेनेबल माइनिंग प्लान बनाया जा सकेगा।
विवाद क्यों हुआ?
पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों का कहना है कि इस परिभाषा से:
- अरावली का करीब 90% हिस्सा कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकता है।
- क्योंकि अरावली की बड़ी संख्या में पहाड़ियां ऊंचाई में कम, लेकिन
पारिस्थितिकी के लिहाज से बेहद अहम हैं। - इससे खनन, रियल एस्टेट और निर्माण गतिविधियों का रास्ता खुल सकता है।
Forest Survey of India के एक आकलन के मुताबिक राजस्थान में चिन्हित 12,000 से ज्यादा पहाड़ियों में से सिर्फ करीब 1,000 ही इस नई कसौटी पर खरा उतरेंगी।
अरावली इतनी अहम क्यों है?
अरावली रेंज:
थार मरुस्थल को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकती है
भूजल रिचार्ज का बड़ा स्रोत है
चंबल, साबरमती और लूनी जैसी नदियों की जननी है
दिल्ली-NCR की हवा को प्रदूषण से बचाने में मदद करती है
जैव विविधता और वन्यजीवों का प्रमुख आवास है
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर अरावली कमजोर हुई तो उत्तर-पश्चिम भारत में रेगिस्तान, जल संकट और प्रदूषण का खतरा कई गुना बढ़ सकता है।
क्या हैं पर्यावरणविदों की मांगें?
#SaveAravalli अभियान के तहत मांग की जा रही है कि:
- ऊंचाई आधारित परिभाषा को वापस लिया जाए,
- पूरे अरावली क्षेत्र को Critical Ecological Zone घोषित किया जाए,
- अवैध खनन पर सख्ती हो और
- पुराने संरक्षण आदेशों को फिर से लागू किया जाए।
जयपुर, हरियाणा और दिल्ली-NCR में विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं।
झारखंड से जुड़ता संदेश
जहां झारखंड सरकार वन क्षेत्रों में डीप बोरिंग पर रोक लगाकर भूजल और जंगल बचाने की पहल कर रही है, वहीं अरावली विवाद यह दिखाता है कि यदि नीतियों में ढील दी गई तो इसके दूरगामी पर्यावरणीय नुकसान हो सकते हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि झारखंड का फैसला अरावली जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए भी एक मॉडल बन सकता है।
झारखंड का निर्णय और अरावली पर छिड़ी बहस—दोनों मिलकर यह साफ संदेश देते हैं कि देश में अब विकास बनाम पर्यावरण की बहस निर्णायक मोड़ पर है। आने वाले समय में सरकारों के सामने चुनौती होगी कि वे विकास की रफ्तार बनाए रखते हुए प्राकृतिक विरासत की रक्षा कैसे करें।












