Jharkhand Literacy Rate: 8 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस के मौके पर जब देश-दुनिया में शिक्षा और साक्षरता की चर्चा हो रही है, तब झारखंड के लिए भी यह सवाल अहम है कि आखिर राज्य की मौजूदा साक्षरता दर कितनी है? क्या झारखंड राष्ट्रीय औसत के करीब पहुंच पाया है? राज्य के किस जिले में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है और कौन सा जिला अब भी पीछे है?
सबसे ताजा उपलब्ध PLFS 2023-24 के आंकड़ों के मुताबिक झारखंड की 7 वर्ष और उससे अधिक उम्र की आबादी की साक्षरता दर 76.7 प्रतिशत है। पुरुषों की साक्षरता दर 82.8 प्रतिशत और महिलाओं की 70.6 प्रतिशत है। यानी राज्य में पुरुषों और महिलाओं की साक्षरता के बीच 12.2 प्रतिशत अंक का अंतर है।
झारखंड की साक्षरता दर 76.7%, लेकिन राष्ट्रीय औसत से पीछे
PLFS 2023-24 के अनुसार भारत की कुल साक्षरता दर 80.9 प्रतिशत है। इसके मुकाबले झारखंड 76.7 प्रतिशत पर है। यानी झारखंड की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से 4.2 प्रतिशत अंक कम है।
हालांकि इसे केवल पिछड़ेपन की तस्वीर के तौर पर देखना सही नहीं होगा। Census 2011 में झारखंड की साक्षरता दर 66.41 प्रतिशत थी। PLFS 2023-24 में यह 76.7 प्रतिशत है। दोनों सर्वेक्षणों की पद्धति अलग है, इसलिए इनके बीच के अंतर को सीधे 10.29 प्रतिशत अंक की वास्तविक वृद्धि के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। फिर भी, दोनों आंकड़े झारखंड में साक्षरता की स्थिति को समझने के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ देते हैं।
झारखंड में पुरुष और महिला साक्षरता में बड़ा अंतर
झारखंड की शिक्षा व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक महिला साक्षरता है।
PLFS 2023-24 में:
- पुरुष साक्षरता: 82.8%
- महिला साक्षरता: 70.6%
- कुल साक्षरता: 76.7%
इसका मतलब है कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं की साक्षरता दर 12.2 प्रतिशत अंक कम है। यही अंतर बताता है कि झारखंड में सिर्फ स्कूलों और कॉलेजों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। लड़कियों की शिक्षा को जारी रखने, खासकर ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक स्तर तक पहुंच बढ़ाने पर भी जोर देना होगा।
मिजोरम से कितना पीछे है झारखंड?
अगर मौजूदा PLFS 2023-24 के आंकड़ों से तुलना करें तो झारखंड और देश के सबसे अधिक साक्षर राज्यों के बीच अभी काफी अंतर है।
PLFS 2023-24 के अनुसार:
| राज्य | साक्षरता दर |
| मिजोरम | 98.2% |
| नागालैंड | 95.7% |
| केरल | 95.3% |
| मेघालय | 94.2% |
| झारखंड | 76.7% |
मिजोरम और झारखंड के बीच करीब 21.5 प्रतिशत अंक का अंतर है। वहीं केरल और झारखंड के बीच करीब 18.6 प्रतिशत अंक का अंतर है।
इसलिए अगर सवाल यह है कि क्या झारखंड अभी मिजोरम या केरल के मौजूदा साक्षरता स्तर को टक्कर दे रहा है, तो आंकड़े बताते हैं कि अभी काफी दूरी बाकी है।
झारखंड बिहार से आगे, लेकिन राष्ट्रीय औसत से नीचे
झारखंड की तुलना पड़ोसी बिहार से करें तो तस्वीर थोड़ी बेहतर दिखाई देती है।
PLFS 2023-24 के अनुसार:
झारखंड – 76.7%
बिहार – 74.3%
यानी झारखंड बिहार से 2.4 प्रतिशत अंक आगे है। लेकिन दोनों राज्य 80.9 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत से नीचे हैं। इसलिए झारखंड के लिए अगला लक्ष्य केवल बिहार से आगे रहना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय औसत को पार करना होना चाहिए।
झारखंड में कौन सा जिला सबसे ज्यादा साक्षर?
यहां एक जरूरी सावधानी है। PLFS 2023-24 की राज्यवार तालिका जिलेवार साक्षरता रैंकिंग नहीं देती। इसलिए जिलेवार तुलना के लिए उपलब्ध Census 2011 के आंकड़ों का इस्तेमाल करना होगा।
Census 2011 आधारित आंकड़ों के मुताबिक झारखंड में रांची 76.06 प्रतिशत साक्षरता दर के साथ सबसे आगे थी। इसके बाद पूर्वी सिंहभूम 75.49%, धनबाद 74.52%, रामगढ़ 73.17% और बोकारो 72.01% थे।
झारखंड के सबसे ज्यादा साक्षर जिले
- रांची – 76.06%
- पूर्वी सिंहभूम – 75.49%
- धनबाद – 74.52%
- रामगढ़ – 73.17%
- बोकारो – 72.01%
ये आंकड़े Census 2011 के हैं, इसलिए इन्हें वर्तमान 2026 जिलेवार स्थिति के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।
झारखंड का सबसे कम साक्षर जिला कौन सा था?
Census 2011 के अनुसार पाकुड़ झारखंड का सबसे कम साक्षर जिला था। यहां साक्षरता दर 48.82 प्रतिशत दर्ज की गई थी। इसके बाद:
- साहिबगंज – 52.04%
- गोड्डा – 56.4%
- गुमला – 56.4%
- पश्चिमी सिंहभूम – 58.63%
- लातेहार – 59.51%
यानी Census 2011 में रांची और पाकुड़ के बीच साक्षरता दर का अंतर 27.24 प्रतिशत अंक था। यह झारखंड के भीतर मौजूद क्षेत्रीय असमानता की बड़ी तस्वीर दिखाता है।
Census 2011 से PLFS 2023-24 तक क्या बदला?
यहां आंकड़ों को समझना बेहद जरूरी है।
Census 2011: झारखंड की साक्षरता दर – 66.41%
PLFS 2023-24: झारखंड की साक्षरता दर – 76.7%
लेकिन इन दोनों को एक ही तरह के आंकड़े मानकर सीधे तुलना करना उचित नहीं है। Census एक व्यापक दशकीय जनगणना है, जबकि PLFS एक नमूना सर्वेक्षण है। PLFS की राज्यवार तालिका 7 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों के लिए साक्षरता दर देती है।
इसलिए 2026 में झारखंड की वर्तमान स्थिति बताने के लिए PLFS 2023-24 बेहतर उपलब्ध स्रोत है, जबकि Census 2011 ऐतिहासिक संदर्भ के लिए उपयोगी है।
झारखंड की असली चुनौती सिर्फ साक्षरता दर नहीं
किसी राज्य की शिक्षा व्यवस्था को सिर्फ एक प्रतिशत से नहीं समझा जा सकता।
झारखंड में साक्षरता दर बढ़ना निश्चित तौर पर सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसके साथ कई सवाल भी जुड़े हैं-क्या बच्चे स्कूल तक पहुंच रहे हैं? क्या वे स्कूल में अपनी कक्षा के अनुरूप पढ़ और समझ पा रहे हैं? क्या लड़कियां माध्यमिक शिक्षा के बाद भी पढ़ाई जारी रख रही हैं? क्या ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में शिक्षा की गुणवत्ता और संसाधन समान हैं?
यानी अगली चुनौती “कितने लोग साक्षर हैं” से आगे बढ़कर “कितने लोग गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पा रहे हैं” की है।
शिक्षा मंत्रियों की लगातार मौतें और नीति की निरंतरता का सवाल
झारखंड की शिक्षा व्यवस्था पर चर्चा करते समय पिछले कुछ वर्षों का एक बेहद संवेदनशील पहलू भी सामने आता है।
अप्रैल 2023 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो का चेन्नई में इलाज के दौरान निधन हुआ था। वे कोविड संक्रमण के बाद स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं से जूझ रहे थे और उनका फेफड़ा प्रत्यारोपण भी हुआ था।
इसके बाद रामदास सोरेन स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के मंत्री बने। अगस्त 2025 में एक दुर्घटनावश गिरने के बाद उन्हें मस्तिष्क में रक्तस्राव हुआ और इलाज के दौरान उनका निधन हो गया।
अब सितंबर 2026 में उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू का 56 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। रिपोर्टों के अनुसार उन्हें अचानक स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हुई और हृदयाघात के बाद उनकी मौत हुई।
इससे पहले 2020 में तत्कालीन मंत्री हाजी हुसैन अंसारी का भी निधन हुआ था।
लेकिन क्या इसे शिक्षा सुधार की विफलता से जोड़ना सही है?
इन घटनाओं को अधिकतम एक दुर्भाग्यपूर्ण राजनीतिक और प्रशासनिक संयोग के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि एक वैध सवाल जरूर उठता है-जब शिक्षा विभाग का नेतृत्व बार-बार असमय बदलता है, तो क्या लंबी अवधि की नीतियों की निरंतरता प्रभावित होती है?
शिक्षा में सुधार के लिए आम तौर पर वर्षों की लगातार योजना, बजट, शिक्षक प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचे और निगरानी की जरूरत होती है। इसलिए मंत्री बदलने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि नीति और उसके लक्ष्य कितने स्थिर रहते हैं।
झारखंड को अब किस दिशा में बढ़ना होगा?
झारखंड की 76.7 प्रतिशत साक्षरता दर बताती है कि राज्य ने एक लंबी दूरी तय की है, लेकिन अभी मंजिल बाकी है। आने वाले वर्षों में राज्य के लिए पांच क्षेत्र सबसे महत्वपूर्ण हो सकते हैं:
पहला, महिला साक्षरता का अंतर कम करना।
दूसरा, कम साक्षरता वाले जिलों और ग्रामीण इलाकों पर विशेष फोकस करना।
तीसरा, सिर्फ नामांकन नहीं बल्कि बच्चों के वास्तविक सीखने के स्तर पर ध्यान देना।
चौथा, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट कम करना।
पांचवां, सरकार और मंत्री बदलने के बावजूद शिक्षा की दीर्घकालिक नीति को लगातार लागू करना।
झारखंड की साक्षरता बढ़ी, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी
International Literacy Day 2026 के मौके पर झारखंड की तस्वीर न तो पूरी तरह निराशाजनक है और न ही संतोष करने लायक।
PLFS 2023-24 में झारखंड की साक्षरता दर 76.7 प्रतिशत है। राज्य बिहार से आगे है, लेकिन राष्ट्रीय औसत 80.9 प्रतिशत से पीछे है। मिजोरम के 98.2 प्रतिशत और केरल के 95.3 प्रतिशत के मुकाबले झारखंड को अभी लंबी दूरी तय करनी है।
वहीं Census 2011 के जिलेवार आंकड़े बताते हैं कि झारखंड के भीतर भी रांची और पाकुड़ जैसे जिलों के बीच बड़ा अंतर रहा है।
इसलिए झारखंड की शिक्षा की अगली कहानी सिर्फ साक्षरता प्रतिशत बढ़ने की नहीं होगी। असली सवाल यह होगा कि क्या राज्य इस बढ़ती साक्षरता को बेहतर सीखने, रोजगार योग्य कौशल और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में बदल पाता है।
कंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।









