Jharkhand में मलेरिया का तांडव: ₹3.19 करोड़ का बजट फिर भी 35 हजार लोग संक्रमित; जानें कौन से 10 जिले हैं सबसे ज्यादा प्रभावित?
Jharkhand: राज्य में मलेरिया उन्मूलन की कोशिशें फिलहाल कागजों और बजट तक ही सीमित नजर आ रही हैं। वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए सरकार ने ₹3.19 करोड़ का भारी-भरकम बजट जारी किया है, लेकिन संक्रमण के बढ़ते आंकड़े विभाग की रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
बजट का मुख्य हिस्सा केवल मजदूरी पर खर्च
स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, आवंटित राशि का 98% से अधिक हिस्सा केवल DDT(Dichlorodiphenyltrichloroethane) छिड़काव और कर्मियों की मजदूरी पर खर्च किया जा रहा है।
| मद (Head) | आवंटित राशि |
| कुल आवंटित राशि | ₹3,19,79,271 |
| छिड़काव कर्मियों की मजदूरी | ₹3,16,16,271 |
| परिवहन व्यय (Transport) | ₹3,63,000 |
यह विश्लेषण दर्शाता है कि मलेरिया नियंत्रण के लिए आधुनिक तकनीकों या जागरूकता के बजाय विभाग का पूरा जोर पारंपरिक छिड़काव प्रक्रिया पर ही टिका है।
Jharkhand के 10 सबसे प्रभावित जिले: कहाँ कितना मिला बजट?
मलेरिया नियंत्रण अभियान मुख्य रूप से राज्य के उन 10 जिलों में केंद्रित है, जहाँ संक्रमण की दर सबसे अधिक है। पश्चिमी सिंहभूम और लातेहार इस सूची में सबसे ऊपर हैं।
जिलावार आवंटन (लाख में):
- पश्चिमी सिंहभूम: ₹68.67
- लातेहार: ₹66.46
- गढ़वा: ₹47.75
- सरायकेला-खरसावां: ₹42.73
- खूंटी: ₹23.42
- पूर्वी सिंहभूम: ₹18.01
- गुमला: ₹16.26
- लोहरदगा: ₹14.02
- रांची: ₹13.77
- सिमडेगा: ₹08.64
संक्रमण के डरावने आंकड़े: 2024 में भारी उछाल
भले ही सरकार हर साल करोड़ों खर्च कर रही है, लेकिन मलेरिया का ग्राफ नीचे आने के बजाय ऊपर जा रहा है। 2022 के मुकाबले 2024 में मरीजों की संख्या में दोगुनी से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है।
वर्षवार मलेरिया के मामले:
- 2024: 42,352 (रिकॉर्ड वृद्धि)
- 2023: 34,087
- 2022: 19,000
- 2019: 36,522
- 2018: 57,113
चुनौती और समाधान: क्यों नाकाम हो रही है रणनीति?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि झारखंड जैसे राज्य में मलेरिया को जड़ से मिटाने के लिए केवल DDT छिड़काव (DDT Spraying) पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। वर्तमान रणनीति में सबसे बड़ी कमी जन-जागरूकता का अभाव है; विशेषकर ग्रामीण और सुदूर क्षेत्रों में लोगों को मच्छरों से बचाव के प्रभावी तरीकों के प्रति शिक्षित करना अनिवार्य है। इसके अलावा, मानसून के दौरान होने वाला जलभराव (Waterlogging) मच्छरों के पनपने का मुख्य केंद्र बनता है, जिसे रोकने के लिए ठोस ड्रेनेज प्रबंधन की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, विभाग को केवल छिड़काव की औपचारिकता पूरी करने के बजाय एक आधुनिक निगरानी तंत्र (Surveillance System) विकसित करना चाहिए। इसमें ‘रियल-टाइम डेटा’ का संकलन और मलेरिया मरीजों की सटीक ट्रैकिंग शामिल होनी चाहिए, ताकि संक्रमण के हॉटस्पॉट्स की पहचान कर समय रहते कार्रवाई की जा सके। रणनीति में यह बदलाव ही झारखंड में मलेरिया के बढ़ते ग्राफ को नीचे ला सकता है।
झारखंड में मलेरिया एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है। ₹3.19 करोड़ का बजट तभी सार्थक होगा जब जमीन पर संक्रमण के आंकड़ों में कमी दिखाई दे।












