Jharkhand Politics: पेसा कानून को लेकर पूर्व सीएम चंपाई सोरेन ने राज्य सरकार पर बड़ा हमला बोला है। चंपई ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि जिस नियमावली को आदिवासी स्वशासन और परंपरागत अधिकारों की रक्षा के लिए लाया जाना था, वही अब आदिवासी समाज के अधिकारों को कमजोर करने का माध्यम बन गई है। उनके अनुसार, हाई कोर्ट के निर्देशों और विपक्षी दबाव के बावजूद सरकार जो नियम लेकर आई है, वह पेसा कानून की मूल भावना से बिल्कुल उलट है।
नई नियमावली में मूल स्वरूप को ही बदल दिया गया है
चंपई का कहना है कि अगर नई नियमावली की तुलना पुरानी व्यवस्था से की जाए, तो साफ दिखता है कि इसके मूल स्वरूप को ही बदल दिया गया है। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि ग्राम सभा के गठन से जुड़े प्रावधानों में आदिवासी समाज की रूढ़िजन्य विधियों, सामाजिक और धार्मिक परंपराओं का उल्लेख ही हटा दिया गया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब भारतीय संविधान भी परंपरागत प्रथाओं को मान्यता देता है, तो फिर सरकार इन्हें हटाकर किसे लाभ पहुंचाना चाहती है।
उन्होंने आरोप लगाया कि ग्राम सभा के अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर नियमों में ऐसा रास्ता छोड़ा गया है, जिससे बाहरी हस्तक्षेप संभव हो सके। यह पेसा कानून की आत्मा के खिलाफ है, क्योंकि यह कानून आदिवासी समाज को अपने तरीके से स्वशासन का अधिकार देता है। उनका कहना है कि अगर ग्राम सभा की संरचना से ही परंपरागत व्यवस्था को अलग कर दिया गया, तो पेसा का औचित्य ही समाप्त हो जाता है।
असली आदिवासी समाज के हक कमजोर होंगे
चंपई ने सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्टों के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि न्यायपालिका बार-बार यह स्पष्ट कर चुकी है कि पेसा कानून आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक आस्थाओं और परंपरागत संसाधन प्रबंधन की रक्षा के लिए है। उन्होंने नियमगिरि पर्वत मामले का जिक्र करते हुए कहा कि जब देश की सर्वोच्च अदालत ने आदिवासियों की धार्मिक आस्था को मानते हुए बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट को रोका, तो राज्य सरकार को भी उन्हीं मूल्यों का सम्मान करना चाहिए।
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उन्होंने आरोप लगाया कि नई नियमावली के जरिए ऐसे लोगों को अधिकार देने की कोशिश हो रही है, जिनका आदिवासी परंपराओं से कोई संबंध नहीं रहा। इससे असली आदिवासी समाज के हक कमजोर होंगे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि पहले ही टीएसी (जनजातीय सलाहकार परिषद) से राज्यपाल को अलग किया गया और अब शेड्यूल एरिया में राज्यपाल की भूमिका सीमित कर सभी अधिकार उपायुक्त को सौंपे जा रहे हैं, जिससे प्रशासनिक मनमानी का रास्ता खुलता है।
ग्राम सभा की भूमिका केवल नाम मात्र की रह जाएगी
चंपई के अनुसार, नई नियमावली में ग्राम सभा के अधिकारों को काफी सीमित कर दिया गया है। पहले जिन सामुदायिक संसाधनों-जैसे जल, जंगल, जमीन और लघु खनिज पर ग्राम सभा का अधिकार माना जाता था, अब उन्हें केवल धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों तक सीमित कर दिया गया है। उन्होंने सवाल उठाया कि शेड्यूल एरिया में रहते हुए अगर आदिवासियों को उनके प्राकृतिक संसाधनों से ही दूर कर दिया जाए, तो फिर स्वशासन की बात कैसे की जा सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि पहले ग्राम सभा को राज्य की योजनाओं और खनिज फंड जैसे कार्यक्रमों को मंजूरी देने का अधिकार था, लेकिन अब सिर्फ औपचारिक सहमति ली जाएगी। अगर तय समय में सहमति नहीं मिली, तो उसे स्वतः स्वीकृत मान लिया जाएगा। इससे ग्राम सभा की भूमिका केवल नाम मात्र की रह जाएगी।
उद्योगों और बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं
लघु खनिजों, भूमि हस्तांतरण और CNT/SPT एक्ट से जुड़े अधिकारों को लेकर भी चंपई ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पहले इन मामलों में ग्राम सभा की भूमिका निर्णायक होती थी, लेकिन अब अधिकांश अधिकार प्रशासन के हाथ में चले गए हैं। उद्योगों और बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए भी कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिए गए हैं, जिसका खामियाजा हमेशा की तरह आदिवासी और मूलवासी समाज को विस्थापन के रूप में भुगतना पड़ता है।
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उन्होंने औद्योगिक विकास के पुराने उदाहरणों का जिक्र करते हुए कहा कि बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स से कंपनियों को मुनाफा हुआ, लेकिन जिनकी जमीन गई, उनकी जिंदगी में कोई ठोस बदलाव नहीं आया। चंपई ने स्पष्ट किया कि आदिवासी विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन वे ऐसी व्यवस्था चाहते हैं, जिसमें जमीन देने वाले परिवारों को सिर्फ मुआवजा नहीं, बल्कि विकास का साझेदार बनाया जाए।
अंत में उन्होंने चेतावनी दी कि आदिवासी अधिकारों को कमजोर करने की किसी भी कोशिश का लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से हर स्तर पर विरोध किया जाएगा।












