Ranchi: Jharkhand में अवैध बालू खनन और तस्करी का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। राज्य सरकार नई सैंड माइनिंग पॉलिसी लागू कर राजस्व बढ़ाने का दावा कर रही है, लेकिन दूसरी तरफ ज़मीन पर तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। राज्य के कई जिलों से लगातार अवैध बालू उठाव की शिकायतें सामने आ रही हैं। हालात ऐसे हैं कि अदालत तक को हस्तक्षेप करना पड़ा है और अब दुमका से वायरल हुए एक वीडियो ने प्रशासनिक दावों पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में नदी से खुलेआम बालू निकालते ट्रैक्टर और मजदूर दिखाई दे रहे हैं। वीडियो की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन स्थानीय लोगों का दावा है कि यह झारखंड में चल रहे अवैध बालू कारोबार की एक झलक मात्र है। लोगों का सवाल है कि अगर लगातार अभियान चल रहे हैं, तो फिर इतनी बड़ी गतिविधियां प्रशासन की नजरों से कैसे बच रही हैं?
रात के अंधेरे में चलता है “बालू का साम्राज्य”
Jharkhand की नदियों के किनारे देर रात ट्रैक्टर-ट्रॉलियों और ट्रकों की कतारें लगती हैं। बालू उठती है, वाहनों में भरकर दूसरे जिलों और राज्यों तक भेजी जाती है, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में उसका कोई हिसाब नहीं मिलता।
दुमका में इन दोनों बालू माफियाओं का राज चल रहा है…
क्या दुमका जिला प्रशासन @DumkaPolice को बिल्कुल इस बात की जानकारी नहीं 😳
सूत्र तो जिला प्रशासन पर बहुत से आरोप लगाते हैं पर आरोप तो आरोप है..
खैर शायद मेरे वीडियो के डालने के बाद उनके जानकारी में यह खबर आ जाए..
मगर मैं समझ… pic.twitter.com/TUiLnBdCxc
— Sutibro Goswami ( पत्रकार ) (@sutibro_goswami) May 29, 2026
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई जगहों पर बालू से लदे ट्रैक्टर थानों और चौकियों के सामने से गुजरते हैं, लेकिन कार्रवाई नहीं होती। यही वजह है कि अब लोग इसे सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि “संगठित सिस्टम” कहने लगे हैं।
229 बालू घाट, हजारों करोड़ के राजस्व का दावा
राज्य सरकार ने 9 मई 2026 को Jharkhand Sand Mining Rules 2026 लागू किए थे। सरकार का दावा है कि राज्य में 229 बालू घाटों की नीलामी और संचालन से आने वाले वर्षों में हजारों करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होगा।
खनन विभाग के अधिकारियों के अनुसार बालू झारखंड के सबसे बड़े प्राकृतिक राजस्व स्रोतों में से एक है। लेकिन अधिकांश घाटों की बंदोबस्ती समय पर नहीं हो पाई। कई मामलों में कानूनी अड़चनें भी सामने आईं। इसी खालीपन का फायदा अवैध खनन करने वाले गिरोह उठा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब वैध सप्लाई कमजोर होती है, तब अवैध नेटवर्क और ज्यादा मजबूत हो जाता है।
हर दिन करोड़ों का नुकसान, लेकिन कार्रवाई सीमित
खनन विभाग और विभिन्न आरटीआई रिपोर्टों के अनुसार झारखंड को अवैध बालू खनन से प्रतिदिन करोड़ों रुपये के राजस्व नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। अनुमान है कि राज्य में प्रतिदिन 6 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध कमाई का नेटवर्क सक्रिय है।
चौंकाने वाली बात यह है कि कई क्षेत्रों में बालू की सप्लाई का बड़ा हिस्सा अवैध माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि निर्माण कार्यों के लिए बालू की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन वैध आपूर्ति सीमित होने के कारण अवैध कारोबार फल-फूल रहा है।
रांची, दुमका, हजारीबाग, पलामू, गढ़वा, साहिबगंज और सरायकेला-खरसावां ऐसे जिले हैं जहां समय-समय पर अवैध खनन के मामले सामने आते रहे हैं।
ईचागढ़ मामला: जब्त बालू ही गायब हो गई
सरायकेला-खरसावां जिले के ईचागढ़ क्षेत्र में हाल ही में करीब 8 हजार CFT बालू जब्त किए जाने का मामला चर्चा में रहा। प्रशासन ने बालू को थाना निगरानी में रखने की बात कही थी, लेकिन कुछ दिनों बाद वहां से बड़ी मात्रा में बालू गायब होने की खबर सामने आई।
इस घटना ने प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बालू माफिया और प्रभावशाली तत्वों के गठजोड़ के कारण कार्रवाई का असर ज़मीन पर नहीं दिखता।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
8 मई 2026 को झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग क्षेत्र में अवैध खनन और क्रशर संचालन से जुड़ी सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी की थी।
अदालत ने कहा था कि अनियंत्रित खनन न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि लोगों के जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार को भी प्रभावित कर रहा है।
कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि वर्षों से बालू घाटों पर CCTV निगरानी और मॉनिटरिंग की बातें हो रही हैं, लेकिन ज़मीन पर उसका असर क्यों नहीं दिख रहा। अदालत ने संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है और कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
87 प्रतिशत सैटेलाइट अलर्ट पर कार्रवाई नहीं
आरटीआई से सामने आई जानकारी के अनुसार अवैध खनन की पहचान के लिए भेजे गए सैटेलाइट मॉनिटरिंग अलर्ट्स में लगभग 87 प्रतिशत मामलों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी।
खनन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सैटेलाइट तकनीक से मिले संकेतों पर समय पर कार्रवाई हो, तो अवैध खनन को काफी हद तक रोका जा सकता है। लेकिन कई मामलों में अलर्ट आने के बाद भी टीम मौके पर नहीं पहुंचती।
यही वजह है कि अब तकनीकी निगरानी की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठने लगे हैं।
बिहार चालान के सहारे झारखंड की बालू
अवैध बालू कारोबार में एक और चौंकाने वाला तरीका सामने आया है। कई मामलों में झारखंड की नदियों से निकाली गई बालू को कागजों में बिहार से खरीदा हुआ दिखाया जाता है।
वाहनों के पास वैध चालान मौजूद रहता है, जिससे पहली नजर में सब कुछ कानूनी दिखाई देता है। जांच एजेंसियों का कहना है कि राज्यों के बीच डिजिटल समन्वय कमजोर होने के कारण तस्कर इसका फायदा उठा रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार सीमा क्षेत्रों में वाहन जांच अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाती है।
नई नीति के बावजूद आसमान छू रही कीमतें
नई नियमावली में बालू की सरकारी दर लगभग ₹473 प्रति CFT तय की गई है, लेकिन बाज़ार में यही बालू ₹2000 प्रति CFT से अधिक कीमत पर बिक रही है।
इसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ रहा है।
प्रभावित हो रही योजनाएं:
- प्रधानमंत्री आवास योजना
- अबुआ आवास योजना
- ग्रामीण सड़क निर्माण
- निजी मकान निर्माण
रांची और आसपास के इलाकों में कई बार बालू की कीमतें सामान्य दरों से कई गुना अधिक पहुंच चुकी हैं। गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए घर बनाना लगातार महंगा होता जा रहा है।
छोटे ठेकेदारों का कहना है कि वैध बालू की उपलब्धता कम होने से निर्माण लागत लगातार बढ़ रही है।
सवाल सिर्फ तस्करी का नहीं, सिस्टम की विश्वसनीयता का भी
झारखंड में अवैध बालू कारोबार अब केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गया है। यह सरकार की नीतियों, प्रशासनिक निगरानी और राजनीतिक इच्छाशक्ति पर भी बड़ा सवाल बन चुका है।
जब:
- हाईकोर्ट फटकार लगाए,
- सैटेलाइट अलर्ट आएं,
- प्रशासन छापेमारी करे,
- फिर भी रात में ट्रैक्टर चलते रहें,
तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह कारोबार रुक क्यों नहीं रहा?
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी और जिला स्तर पर लगातार निगरानी नहीं होगी, तब तक अवैध खनन पर रोक लगाना मुश्किल रहेगा।
सबसे बड़ा सवाल
सरकार नई नीति ला रही है, अदालतें सख्त टिप्पणी कर रही हैं, प्रशासन समय-समय पर कार्रवाई भी कर रहा है, लेकिन इसके बावजूद झारखंड की नदियों से अवैध बालू निकासी रुकती नजर नहीं आ रही।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है —
क्या यह सिर्फ निगरानी की विफलता है, या फिर बालू माफियाओं का नेटवर्क इतना मजबूत हो चुका है कि सरकारी तंत्र भी उसे रोक पाने में असफल साबित हो रहा है?
और जब थाने के सामने से बालू से भरे ट्रैक्टर गुजरते हैं, लेकिन कार्रवाई नहीं होती — तब सवाल सिर्फ तस्करों पर नहीं, पूरे सिस्टम पर खड़ा होता है।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
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