Jharkhand News: राज्य का दो दिवसीय ऐतिहासिक मुड़मा जतरा मेला का शुभारंभ हो गया है. बुधवार शाम चार बजे सरना धर्मगुरु बंधन तिग्गा ने 40 पड़हा के पाहन पुजारी और धार्मिक अगुआ पारंपारिक गाजे-बाजे के साथ शक्ति स्थल पहुंचे और पूजा-अर्चना की.
इस दौरान नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी, कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, धर्मगुरु बंधन तिग्गा व सांसद सुखदेव भगत सहित कई अन्य गणमान्य लोगों ने दीप जलाकर मेले का विधिवत उद्घाटन किया. बता दें, आज यानी गुरुवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन बतौर मुख्य अतिथि मेले में शआमिल होगें.
आज मेले में शामिल होगें CM हेमंत सोरेन
मुख्य मंच में रखे कलश में दीपक जला कर जतरा के विधिवत शुरू होने की घोषणा की गुरुवार को सीएम हेमंत सोरेन बतौर मुख्य अतिथि मेले में शामिल होंगे।
“मुड़मा का यह जतरा चालीसों पड़हा का सुप्रीम कोर्ट है”
इस दौरान सरना धर्मगुरु ने बताया कि, मुड़मा का यह जतरा चालीसों पड़हा का सुप्रीम कोर्ट है. यह स्थान उरांव और मुंडाओं का संधि स्थल है. यहीं से शादी विवाह शुरू होता है. यहां शक्ति स्थल को फूलों से सजाया गया है. शक्ति स्थल में पूजा करने के लिए हजारों लोगों का तांता लगा हुआ है.
मुड़मा मेला क्यों मनाया जाता है?
यह एक वार्षिक आदिवासी मेला है, जो झारखंड के राजधानी रांची से 28 किलोमीटर दूर राँची-डलटेनगंज मार्ग पर स्थित मुड़मा गांव में आयोजित होता है. इसका आयोजन खास तौर पर दशहरा के दसवें दिन किया जाता है.
इसकी शुरुआत कब से हुई इसका कोई लिखित प्रमाण तो नहीं है लेकिन लोकगीतों और किवदंतियों के अनुसार, यह मेला उरांव जनजाति के पलायन से जुड़ा हुआ है. मुड़मा मेला को विजय उत्सव के प्रतीक के रुप में मनाया जाता है.
Read more- बिहार चुनाव: कांग्रेस की पटना में बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस आज, 25 सीटों पर उम्मीदवार तय
जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं तब हम पता चलता है कि मुड़मा का इतिहास मुगल काल से जुड़ा हुआ है.
मुड़मा जतरा की शुरुआत कैसे हुई इसे लेकर कई लोककथाएं प्रचलित है. जानकारों की मान्यता है कि शुरुआत में उरांव लोग दक्षिण भारत के पर्वतीय आंचल में रहा करते थे. बाद में उरांव उस स्थान से हटकर रोहतास पहुंचे जहां वे स्थाई रूप से बचकर खेती-बारी करने लगे.
लेकिन कुछ समय के बाद मुगलों के साथ मुठ-भेड़ एवं मतभेद हो जाने तथा वहां के राजनीतिक उथल पुथल से परेशान होकर इन लोगों ने वहां से हटाना उचित समझा. अंततः सोन नदी के किनारे-किनारे होते हुए वे झारखंड के छोटा नागपुर क्षेत्र में प्रवेश किए. ऐसा माना जाता है कि उरांव समुदाय छोटा नागपुर के पलामू क्षेत्र से प्रवेश किये और ओपाचापी होते हुए उमेडांडा की ओर बढ़े, जहां इनका यहां के स्थानीय मुंडा जनजातियों से पहली बार आमना-सामना हुआ.
Read more- झारखंड में मानसून की विदाई: 12-14 अक्टूबर तक पूरी तरह से होगी वापसी
झारखंड में उरांव जनजाति का सामना यहां के मुंडा जनजाति के मुखिया से हुआ. उरांव लोगों की व्यथा सुनने के बाद मुंडाओं ने उन्हें जंगल के पश्चिमी हिस्से को साफ कर बसने की अनुमति दी. और इसी ऐतिहासिक उरांव-मुंडा के समझौते की याद में उरांव समुदाय के 40 पाड़हा के लोग हर साल इस मेले का आयोजन करते हैं, जिसे मुड़मा जतरा कहा जाता है.












