झारखंड में PESA Act को मंजूरी: स्वशासन की दिशा में अहम कदम
झारखंड की राजनीति और आदिवासी अधिकारों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में 26 साल से लंबित PESA कानून को मंजूरी मिली है। इसे अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को अधिक अधिकार देने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
सरकारी स्तर पर इसे ऐतिहासिक बताया जा रहा है, वहीं विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच इस बात पर चर्चा है कि इसका प्रभाव जमीनी स्तर पर कैसे और किस रूप में दिखेगा।
PESA Act क्या है और इसका उद्देश्य
Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996 का उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों को स्वशासन से जोड़ना है। इसके तहत:
- ग्राम सभा को केंद्रीय भूमिका
- भूमि अधिग्रहण में सहमति
- खनन व लघु खनिज पर राय
- शराब दुकान और संसाधनों पर नियंत्रण
- जंगल से जुड़े मामलों में भागीदारी
कानून की भावना यह है कि स्थानीय लोग अपने संसाधनों पर निर्णय ले सकें।
जमीनी अनुभव और सीख
झारखंड में इससे पहले भी कई कानून आदिवासी हितों को ध्यान में रखकर बनाए गए, जैसे सीएनटी-एसपीटी एक्ट और फॉरेस्ट राइट्स एक्ट। हालांकि, कई इलाकों में इनके क्रियान्वयन को लेकर मिश्रित अनुभव सामने आए हैं।
आदिवासी अधिकारों से जुड़ी कार्यकर्ता दयामनी बरला कहती हैं:
“हमने जब-जब अपने अधिकारों की बात की, हमें कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कानून बने, लेकिन उनका लाभ जमीन तक पहुंचना हमेशा आसान नहीं रहा।”
यह अनुभव बताता है कि पेसा की सफलता काफी हद तक क्रियान्वयन की प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
ग्राम सभा की भूमिका और संभावित चुनौतियां
पेसा के तहत ग्राम सभा को निर्णय लेने की ताकत मिलेगी, लेकिन कुछ जानकारों का मानना है कि:
- ग्राम सभा की क्षमता बढ़ाना जरूरी होगा
- सदस्यों को कानूनी जानकारी देना अहम होगा
- बैठकों की पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी
- बाहरी दबाव से बचाव की व्यवस्था जरूरी होगी
यह सुनिश्चित करना होगा कि ग्राम सभा वास्तव में सामूहिक और स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सके।
खनिज, संसाधन और संतुलन की जरूरत
झारखंड खनिज संपदा से समृद्ध राज्य है। पेसा में लघु खनिज पर ग्राम सभा की भूमिका तय की गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यहां विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती होगी, ताकि:
- स्थानीय हित सुरक्षित रहें
- रोजगार के अवसर बनें
- पर्यावरण की रक्षा हो
दयामनी बरला का कहना है:
“विकास तब सार्थक होगा, जब उसका लाभ स्थानीय समुदाय तक पहुंचे।”
FRA से मिले संकेत
Forest Rights Act के तहत भी ग्राम सभा को अधिकार दिए गए थे। कई जगहों पर इससे लाभ मिला, वहीं कुछ इलाकों में लंबित दावे और कानूनी प्रक्रियाएं अभी भी चुनौती बनी हुई हैं। इससे यह सीख मिलती है कि:
कानून के साथ-साथ सरल प्रक्रिया और जागरूकता भी जरूरी है।
सामाजिक एकता की अहमियत
सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि समुदाय की एकता पेसा की सफलता की कुंजी होगी।
“जब समाज एकजुट रहेगा, तभी अपने अधिकारों की रक्षा बेहतर तरीके से हो पाएगी।”
आगे की राह
पेसा को मंजूरी मिलना एक शुरुआत है। अब नजर इस पर रहेगी कि:
- नियम कैसे तैयार होते हैं
- प्रशिक्षण और जागरूकता कैसे बढ़ती है
- ग्राम सभा को प्रशासनिक सहयोग कैसे मिलता है
विशेषज्ञ मानते हैं कि संवाद, पारदर्शिता और सहभागिता से ही यह कानून अपने उद्देश्य तक पहुंच सकेगा।
PESA Act झारखंड में आदिवासी स्वशासन को मजबूत करने का अवसर है। साथ ही, यह भी सच है कि जमीनी स्तर पर इसके सामने कई व्यावहारिक चुनौतियां होंगी।
उम्मीद यही है कि सभी पक्षों के सहयोग से यह कानून स्थानीय समुदायों के लिए सकारात्मक बदलाव का माध्यम बने।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
5+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ उन्होंने Gandiva, Lagatar.in, News11 Digital और Prabhat Khabar Digital जैसे मीडिया संस्थानों में काम किया है। वर्तमान में Khabar Mantra Digital में Digital Media Manager-cum-Executive एवं विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं।
वे विशेष रूप से कोयलांचल, BCCL, कोलियरियों, औद्योगिक क्षेत्रों, स्थानीय प्रशासन और जनहित के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं।
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