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भोगनाडीह से उठती झारखंड की सियासी लपटें, झारखंड की राजनीति में आदिवासी नेतृत्व की नई करवट!

1855 में जहां से अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ आदिवासी अस्मिता की सबसे पहली लड़ाई शुरू हुई थी, आज वही धरती एक नई सियासी जंग का मैदान बन गई है

June 30, 2025
in झारखंड
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Political flames of Jharkhand rising from Bhognadih, new turn of tribal leadership in Jharkhand politics

Political flames of Jharkhand rising from Bhognadih, new turn of tribal leadership in Jharkhand politics

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Jharkhand: 1855 में जहां से अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ आदिवासी अस्मिता की सबसे पहली लड़ाई शुरू हुई थी, आज वही धरती एक नई सियासी जंग का मैदान बन गई है। साहिबगंज का भोगनाडीह – शहीद सिदो-कान्हू की भूमि – हूल दिवस पर इस बार इतिहास रचने की बजाय राजनीति की गर्माहट से सुलग उठी। सवाल ये है — क्या झारखंड में आदिवासी राजनीति एक नई दिशा की ओर बढ़ रही है?

 शहीद सिदो-कान्हू के छठे वंशज मंडल मुर्मू के नेतृत्व में लगभग 2000 आदिवासियों ने इस वर्ष सरकारी कार्यक्रम का विरोध किया। प्रशासनिक अनुमति न मिलने से आक्रोशित आदिवासी पारंपरिक हथियारों के साथ भोगनाडीह पहुंचे। नतीजा – लाठीचार्ज, आंसू गैस और तनावपूर्ण माहौल।

 लेकिन इस विरोध की पृष्ठभूमि में एक और राजनीतिक परत है। झारखंड विधानसभा चुनाव 2024 के दौरान असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भोगनाडीह पहुंचे थे। उसी दौरान यह खबर सामने आई कि सिदो-कान्हू के वंशज मंडल मुर्मू ने बीजेपी जॉइन कर लिया। सवाल उठता है — क्या यह आदिवासी नेतृत्व को अपने पाले में लाने की बीजेपी की रणनीति थी? या फिर किसी गहरे राजनीतिक एजेंडे की शुरुआत?

 हालांकि चुनाव के बाद हेमंत सोरेन एक बार फिर मुख्यमंत्री बने। लेकिन साफ है कि बीजेपी की रणनीति आदिवासी समुदाय को अपने पक्ष में करने की है। एक ओर मंडल मुर्मू को पार्टी में लाना, दूसरी ओर भोगनाडीह जैसे ऐतिहासिक स्थल पर सक्रियता दिखाना – ये सब यूं ही नहीं है।

 वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास भी भोगनाडीह पहुंचे। उन्होंने वंशजों से मुलाकात की, जनचौपाल में हिस्सा लिया और पेसा एक्ट लागू न करने पर वर्तमान सरकार को घेरा। उन्होंने आदिवासियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने की अपील की।

 तो क्या हूल दिवस पर हुआ यह विरोध सिर्फ एक सांस्कृतिक असंतोष था, या इसके पीछे छिपी थी सियासी बिसात?

क्या मंडल मुर्मू का विरोध स्वाभाविक था, या राजनीतिक प्रेरणा से प्रेरित?

और सबसे बड़ा सवाल — झारखंड में आदिवासी नेतृत्व किस ओर जा रहा है?

 हेमंत सोरेन जैसे आदिवासी मुख्यमंत्री एक ओर हैं, वहीं दूसरी ओर बीजेपी भी अब आदिवासी चेहरों को आगे कर रही है। दोनों ही पक्ष आदिवासी अस्मिता, अधिकार और सम्मान की बात कर रहे हैं, लेकिन असली लड़ाई अब पहचान और भरोसे की है।

 भोगनाडीह का इतिहास सिर्फ एक विद्रोह की कहानी नहीं, बल्कि बदलाव की चेतना है। आज वही चेतना झारखंड की राजनीति को नई दिशा देने की तैयारी में है।

हूल दिवस पर हुआ टकराव, वंशजों की नाराजगी, नेताओं की सक्रियता — ये सब संकेत हैं कि आने वाले समय में राज्य की राजनीति का केंद्रबिंदु आदिवासी अस्मिता, नेतृत्व और अधिकार बनने वाला है।

अब सवाल यह नहीं कि कौन जीतेगा या हारेगा, बल्कि सवाल यह है — क्या झारखंड की राजनीति अब हाशिए से उठकर असली मुद्दों पर केंद्रित होगी?

क्या आदिवासी समाज सिर्फ वोट बैंक रहेगा या सशक्त नेतृत्व गढ़ेगा?

झारखंड की राजनीति एक मोड़ पर खड़ी है — और आगे का रास्ता इसी चेतना से तय होगा।

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