रांची, 19 अप्रैल 2026। झारखंड की राजधानी रांची में एक ऐसा आंदोलन जल जाया है जिसे न धूप बुझा सकी, न सरकार की चुप्पी। मुख्यमंत्री आवास के ठीक सामने नागा बाबा खटाल में राज्यभर के हजारों सहायक अध्यापक (पारा शिक्षक) 18 अप्रैल से अनिश्चितकालीन धरना और आमरण अनशन पर बैठे हैं — और उनकी आवाज़ का नेतृत्व कर रहे हैं झारखंड राज्य आकलन-प्रशिक्षित सहायक अध्यापक संघर्ष मोर्चा के प्रदेश महासचिव बबलू सिंह।
बबलू सिंह: आंदोलन की आवाज़
झारखंड राज्य आकलन-प्रशिक्षित सहायक अध्यापक संघर्ष मोर्चा के प्रदेश महासचिव बबलू सिंह इस पूरे आंदोलन के सबसे मुखर और संगठित चेहरों में से एक हैं। उन्होंने रांची के आमरण अनशन से पहले बरवाडीह (लातेहार) में आयोजित बैठक में खुलकर कहा था:
“सहायक अध्यापकों की मांगें पूर्णतः जायज हैं। सरकार को इस पर शीघ्र विचार करना चाहिए। 18 अप्रैल से शुरू होने वाला अनशन ऐतिहासिक होगा।”
बबलू सिंह ने राज्यभर के शिक्षकों से रांची पहुंचने और इस आंदोलन को जन-आंदोलन का रूप देने की अपील की। इससे पहले भी वे 2024 में हुई प्रथम आकलन परीक्षा के बाद शिक्षकों को दिशा देने में सक्रिय रहे थे, और मोर्चा के ऋषिकांत तिवारी के साथ मिलकर पास और फेल दोनों वर्गों के शिक्षकों के भविष्य के लिए आवाज़ उठाते रहे।
आंदोलन की पूरी पृष्ठभूमि
यह आंदोलन अचानक नहीं उठा। 28 अगस्त 2024 और 4 नवम्बर 2025 को मोर्चा और झारखंड सरकार के बीच लिखित समझौते हुए थे, जिसमें सरकार ने माना था कि आकलन परीक्षा को TET के समतुल्य दर्जा दिया जाएगा। लेकिन लगभग 19 महीने बीत जाने के बाद भी सरकारी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई और यही इस विस्फोट की असली वजह बनी।
राज्य में करीब 45,000 आकलन-प्रशिक्षित सहायक अध्यापक हैं जो वर्षों से कम मानदेय पर पूरे नियमित शिक्षकों जैसा काम करते आए हैं, लेकिन उन्हें न वेतन में समानता मिली, न सेवा सुरक्षा।
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