Jharkhand: झारखंड और पड़ोसी राज्यों के आदिवासी समाज का सबसे प्रमुख पर्व Sarhul Puja इस बार 21 मार्च 2026 को बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है। यह पर्व प्रकृति, फूलों और नृत्य का उत्सव है, जो ओड़िशा, पश्चिम बंगाल और मध्यप्रदेश के आदिवासी समुदायों में भी धूमधाम से मनाया जाता है।
केकड़े का महत्व: क्यों पकड़ते हैं पाहन?
सरहुल पूजा में केकड़ा का विशेष महत्व है। दूसरे दिन, गाँव के पाहन (पुजारी) उपवास रखते हुए केकड़ा पकड़ते हैं। इसे अरवा धागे से बांधकर पूजा घर में टांग दिया जाता है। जब धान की बुवाई शुरू होती है, तब केकड़े का चूर्ण गोबर में मिलाकर खेतों में बुआई की जाती है।
आदिवासी मान्यता के अनुसार, जैसे केकड़े के अनगिनत बच्चे होते हैं, वैसे ही इस चूर्ण को मिलाकर बुवाई करने से धान की फसल में अनेक बालियां निकलती हैं। यही कारण है कि सरहुल में केकड़े को विशेष सम्मान दिया जाता है।
सरहुल: प्रकृति और नृत्य का पर्व
सरहुल का नाम “सर” और “हुल” से बना है।
- सर = सखुआ (साल) के फूल
- हुल = क्रांति
यानी सखुआ के फूलों की क्रांति को सरहुल कहा जाता है। इस दिन आदिवासी प्रकृति की पूजा करते हैं और नृत्य और संगीत के माध्यम से उत्सव मनाते हैं।
आदिवासी विद्वान राम दयाल मुंडा कहते थे – “जे नाची से बांची”, अर्थात जो नाचेगा वही बचेगा। नृत्य और गान से तनाव दूर होता है और समुदाय में एकता बनी रहती है।
महिलाओं की लाल बॉर्डर वाली साड़ी और पुरुषों की पारंपरिक पोशाक
सरहुल में महिलाएं लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी पहनती हैं, जो शांति और पवित्रता का प्रतीक है। लाल रंग क्रांति का प्रतीक है। पुरुष गंजी और धोती के साथ लाल गमछा रखते हैं। सरना झंडा भी सफेद और लाल रंग में होता है, जिसमें सफेद रंग ‘सिंगबोंगा’ और लाल रंग ‘बुरूंबोंगा’ का प्रतीक है।
चार दिन की रस्में और परंपराएं
सरहुल पर्व मुख्य रूप से चार दिन तक मनाया जाता है:
- पहला दिन: मछली के अभिषेक किए हुए जल को घर में छिड़का जाता है।
- दूसरा दिन: पाहन उपवास रखते हैं और गाँव की हर छत पर साल के फूल रखे जाते हैं। केकड़ा पकड़कर पूजा घर में टांग दिया जाता है।
- तीसरा दिन: सरना स्थल पर साल के फूलों की पूजा होती है। पाहन मुर्गी की बलि देते हैं और चावल के साथ मिलाकर खिचड़ी (सूड़ी) बनाते हैं, जिसे पूरे गांव में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
- चौथा दिन: गिड़ीवा नामक स्थान पर सरहुल फूल का विसर्जन किया जाता है।
Sarhul Puja और कृषि
आदिवासी जीवन कृषि पर आधारित है। सरहुल से ही नए साल की शुरुआत और फसल कटाई का क्रम तय होता है। पाहन इस दिन वर्ष की बारिश और फसल की संभावनाओं का अनुमान भी लगाते हैं।
शहर और गांव में उत्सव
रांची और अन्य शहरों में जुलूस, सांस्कृतिक कार्यक्रम और नृत्य आयोजित किए जाते हैं। ग्रामीण अंचलों में लोग अखाड़ों में जाकर नाचते-गाते हैं और परंपरा अनुसार पूजा-अर्चना करते हैं।
सरहुल केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि, नृत्य और सामाजिक एकता का प्रतीक है। केकड़ा, साल के फूल और सरना स्थल पूजा जैसी परंपराओं से यह आदिवासी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता है। इस बार 21 मार्च 2026 को मनाया जाने वाला सरहुल आदिवासियों के लिए धार्मिक, सामाजिक और कृषि जीवन में मार्गदर्शक होगा।

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
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