Ranchi: झारखंड की राजनीति में जैसे-जैसे घाटशिला उपचुनाव की तारीखें नजदीक आ रही हैं, वैसे-वैसे राजनीतिक हलचल और चुनावी सरगर्मी भी तेज होती जा रही है। दिवंगत मंत्री रामदास सोरेन के निधन के बाद खाली हुई यह सीट अब सिर्फ घाटशिला ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में सियासी चर्चाओं का केंद्र बन गई है।
read more: शराबी पति से परेशान पत्नी ने की हत्या, घर में ही गाड़ दिया शव – गांव में सनसनी
उपचुनाव में सोरेन Vs सोरेन के बीच सीधी टक्कर
इस बार का उपचुनाव इसलिए भी खास है क्योंकि मैदान में मुकाबला बेहद रोचक और रोमांचक होने वाला है। एक ओर हैं झामुमो से दिवंगत मंत्री रामदास सोरेन के बेटे सोमेश सोरेन, जिन्हें सहानुभूति का बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है। वहीं दूसरी ओर भाजपा के पाले में हैं पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन के बेटे बाबूलाल सोरेन, जिनके पीछे खुद चंपाई पूरी ताकत झोंक रहे हैं। इस तरह यह चुनाव केवल दो प्रत्याशियों की लड़ाई नहीं, बल्कि इसे झामुमो बनाम भाजपा, परंपरा बनाम बदलाव और सहानुभूति बनाम रणनीति की लड़ाई कहा जा रहा है।
read more: निरसा थाने में अपराधियों का तांडव , पुलिस पर हमला, पिस्टल छीनने की कोशिश
घाटशिला की करीब 75% जनता झामुमो के कोट वोटर
घाटशिला विधानसभा सीट झारखंड की राजनीति में हमेशा से अहम रही है। अगर चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो यहां झामुमो का वर्चस्व ज्यादा रहा है। साल 2009, 2019 और 2024 में लगातार रामदास सोरेन ने यहां जीत दर्ज की। जबकि भाजपा केवल 2014 के मोदी लहर में ही यह सीट अपने नाम कर पाई थी। 2024 के विधानसभा चुनाव में भी रामदास सोरेन ने भारी बहुमत से जीत हासिल की थी और करीब 22,446 वोटों से भाजपा प्रत्याशी को हराया था। आंकड़ों के मुताबिक घाटशिला की करीब 75% जनता झामुमो के कोर वोटर माने जाते हैं, जो ज्यादातर ग्रामीण इलाकों से आते हैं। वहीं 25% वोटर भाजपा के साथ रहते हैं, जो मुख्य रूप से शहरी क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। ऐसे में परंपरागत समीकरणों को बदलना किसी भी दल के लिए आसान नहीं होगा।
read more: रांची के जू में बड़ा झटका! मादा जिराफ ‘मिष्टी’ की मौत ने खड़े किए कई सवाल
भाजपा में शामिल हुए पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन इस उपचुनाव में अपनी साख दांव पर लगा चुके हैं। हालांकि यह पहली बार नहीं है, बल्कि 2024 के चुनाव में भी उन्होंने अपनी ताकत लगाई थी। लेकिन उनके बेटे को हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन इस बार चंपाई सोरेन अभी से ही लगातार घाटशिला का दौरा कर रहे है, सोशल मीडिया पर सक्रिय तौर पर जोहार घाटशिला लिखकर मतदाताओं को संबोधित कर रहे है। जो कि उनकी रणनीति का हिस्सा है। वे न सिर्फ भाजपा संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि अपने बेटे बाबूलाल सोरेन को मजबूत प्रत्याशी के रूप में पेश करने में जुटे हुए हैं।
बाबूलाल की दावेदारी लगभग तय
भाजपा खेमे में लगभग तय माना जा रहा है कि बाबूलाल ही उम्मीदवार होंगे। लेकिन पूरी तरह से दावा करना की बाबूलाल ही भाजपा के उम्मीदवार होंगे यह गलत होगा। क्योंकि भाजपा के कई ऐसे उम्मिदवार अपनी दावेदारी पेश कर रहे है। लेकिन यह दावेदारी चंपाई फैक्टर के इर्द गिर्द घूमती दिख रही है। ऐसे में भाजपा चाहती है कि वह ऐसे दावेदार को चुने जो ना सिर्फ झामुमो के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाए बल्कि शहरी मतदाताओं के साथ मिलकर ग्रामीणों को भी आकर्षित करे।
read more: झारखंड से सक्रिय है लॉरेंस बिश्नोई-गोल्डी बरार गैंग, एटीएस की पूछताछ में हुआ बड़ा खुलासा
झामुमो से सोमेश होंगे उम्मीदवार
दूसरी तरफ झामुमो ने स्थिति स्पष्ट कर दी है और दिवंगत मंत्री रामदास सोरेन के बेटे सोमेश सोरेन को मैदान में उतारने का फैसला किया है। यहां झामुमो का संगठन पहले से ही मजबूत है और ग्रामीण इलाकों में उनकी पकड़ गहरी है। इसके अलावा, इस बार सहानुभूति का फैक्टर भी सोमेश के साथ है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मतदाता अक्सर दिवंगत नेता के परिवार को समर्थन देकर श्रद्धांजलि देने का काम करते हैं। जो की हमने डुमरी के उपचुनाव में देख लिया है। ऐसे में सोमेश के पक्ष में सहानुभूति की लहर उनके वोट शेयर को और मजबूत कर सकती है।
read more: BCCI ने बढ़ाए भारतीय क्रिकेट टीम की जर्सी स्पॉन्सरशिप के रेट, जानिए नए रेट
बाबूलाल के सामने होगी दोहरी चुनौती
अगर 2024 के मुकाबले देखा जाए तो उस समय बाबूलाल सोरेन का मुकाबला सिर्फ रामदास सोरेन से था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। सोमेश न केवल अपने पिता के वोट बैंक को संभाल रहे हैं, बल्कि सहानुभूति वोट भी उनके साथ जा सकता है। यह स्थिति बाबूलाल के लिए चुनौतीपूर्ण है। दूसरी ओर भाजपा इस कोशिश में है कि सहानुभूति की लहर के बावजूद संगठन और रणनीति के बल पर चुनाव को कांटे का बना दिया जाए। भाजपा शहरी वोटरों के साथ-साथ युवा मतदाताओं को आकर्षित करने की भी योजना बना रही है।
झारखंड की राजनीति में नया इतिहास लिख सकता है उपचुनाव
ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि घाटशिला उपचुनाव झारखंड की राजनीति का नया इतिहास लिख सकता है। अगर भाजपा इस सीट पर जीत दर्ज करती है तो यह झामुमो के लिए बड़ा झटका होगा और भाजपा के लिए राज्य में मजबूती की नई राह खोल देगा। वहीं अगर झामुमो अपनी सीट बचाने में सफल रहता है तो यह संदेश जाएगा कि पार्टी का जनाधार अभी भी मजबूत है और सहानुभूति लहर ने उनकी पकड़ और मजबूत कर दी है।
पारिवारिक विरासत बनाम राजनीतिक महत्वकांक्षा के बीच होने वाला है चुनाव
फिलहाल घाटशिला की गलियां उपचुनाव के इंतजार में हैं। मतदाता भी इस बात को लेकर उत्साहित हैं कि इस बार मुकाबला पारिवारिक विरासत बनाम राजनीतिक महत्वाकांक्षा के बीच होने वाला है। अब देखना दिलचस्प होगा कि जनता किसे अपना प्रतिनिधि चुनती है सोरेन परिवार की विरासत को आगे बढ़ाने वाले सोमेश को या फिर भाजपा में नए तेवर और नई उम्मीद के साथ आए बाबूलाल को।













