आज भी जल रही है त्रेतायुग की अग्नि, इसी मंदिर में हुआ था शिव-पार्वती का दिव्य विवाह
क्या आप जानते हैं वह रहस्यमयी मंदिर, जहां आज भी त्रेतायुग की अग्नि जलने का दावा किया जाता है? जानिए त्रियुगीनारायण मंदिर की अनसुनी कहानी, जहां हुआ था भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह।
Written By: Ritika SinghTriyuginarayan: उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित त्रियुगीनारायण मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि हिंदू आस्था का एक ऐसा केंद्र है, जहां भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाह की पौराणिक कथा आज भी श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवान विष्णु की उपस्थिति में शिव और पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था और उसी विवाह की साक्षी बनी अग्नि आज भी अखंड रूप से प्रज्वलित है।
त्रियुगीनारायण मंदिर का पौराणिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने सती के रूप में देह त्यागने के बाद हिमालयराज के घर पुनर्जन्म लिया। भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए उन्होंने वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने विवाह के लिए सहमति दी और दोनों का विवाह उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के त्रियुगीनारायण में संपन्न हुआ।
कहा जाता है कि इस दिव्य विवाह में भगवान विष्णु ने माता पार्वती के भाई की भूमिका निभाई, जबकि ब्रह्मा जी ने वैदिक रीति-रिवाजों से विवाह संपन्न कराया।
त्रेतायुग से जल रही है अखंड ज्योति
त्रियुगीनारायण मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां जलने वाली अखंड ज्योति है। स्थानीय मान्यता के अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती ने इसी अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लिए थे। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यह ज्योति त्रेतायुग से लगातार जल रही है और कभी बुझी नहीं।
भक्त इस पवित्र अग्नि की राख को शुभ और मंगलकारी मानते हैं तथा इसे अपने साथ प्रसाद के रूप में भी ले जाते हैं।
यहां विवाह करने की क्यों है विशेष मान्यता?
त्रियुगीनारायण मंदिर में विवाह करना बेहद शुभ माना जाता है। मान्यता है कि यहां विवाह करने वाले दंपतियों का वैवाहिक जीवन सुखी और सफल रहता है। यही कारण है कि हर वर्ष देश-विदेश से बड़ी संख्या में जोड़े इस मंदिर में विवाह करने पहुंचते हैं।
गौरीकुंड से जुड़ी है माता पार्वती की तपस्या
लोक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने त्रियुगीनारायण से लगभग पांच किलोमीटर दूर स्थित गौरीकुंड में भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। तपस्या पूरी होने के बाद त्रियुगीनारायण गांव में उनका विवाह भगवान शिव के साथ संपन्न हुआ।
कहां स्थित है त्रियुगीनारायण मंदिर?
त्रियुगीनारायण मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है। यह केदारनाथ धाम के मार्ग पर, सोनप्रयाग के पास स्थित एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। हर साल मई से अक्टूबर के बीच बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। केदारनाथ यात्रा पर जाने वाले भक्त भी इस मंदिर के दर्शन करना नहीं भूलते।
क्यों खास है त्रियुगीनारायण मंदिर?
भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह स्थल के रूप में प्रसिद्ध।
त्रेतायुग से जल रही अखंड ज्योति की मान्यता।
विवाह के लिए देश के सबसे पवित्र धार्मिक स्थलों में शामिल।
केदारनाथ यात्रा मार्ग का प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र।
हर वर्ष हजारों श्रद्धालुओं और नवविवाहित जोड़ों की आस्था का केंद्र।