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विश्वकर्मा पूजा पर ये बात शायद ही कहीं पढ़ी होगी, ऋग्वेद में कैसे बदल गया विश्वकर्मा का स्वरूप?

Vishwakarma Puja 2026: विश्वकर्मा पूजा 2026 कब है? जानिए 17 सितंबर को मनाए जाने वाले इस पर्व का वैदिक इतिहास, मशीनों-औजारों की पूजा की वजह, कारीगरों से फैक्ट्री तक का सफर और पतंगबाजी से जुड़ी अनसुनी कहानी।

सितम्बर 17, 2026
in धर्म-अध्याय
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विश्वकर्मा पूजा 2026: औजारों और मशीनों की पूजा का इतिहास

विश्वकर्मा पूजा 2026 पर भगवान विश्वकर्मा के साथ औजारों, मशीनों और तकनीकी कार्यों के सम्मान की झलक

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समय: ~14 मिनट•हिंदी बुलेटिन

Vishwakarma Puja 2026: 17 सितंबर को देश के कई हिस्सों में विश्वकर्मा पूजा मनाई जाएगी। आम तौर पर इस दिन भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा के साथ मशीनों, औजारों, वाहनों और काम में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की पूजा की जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि एक धार्मिक पर्व में मशीनों और औजारों को इतना महत्व क्यों मिला?

Table of Contents

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  • सबसे पहले जानिए-ऋग्वेद में विश्वकर्मा कौन हैं?
    • क्या विश्वकर्मा सच में ‘पहले इंजीनियर’ थे?
      • मशीनों की पूजा क्यों होती है?
      • लेकिन विश्वकर्मा पूजा सिर्फ हजारों साल पुरानी परंपरा नहीं है
    • यानी परंपरा ने खुद को बदला
    • 1961 के एक सर्वे में दर्ज हुई विश्वकर्मा पूजा की झलक
    • विश्वकर्मा पूजा और बंगाल की पतंग-यह कनेक्शन कहां से आया?
      • विश्वकर्मा पूजा किन लोगों के लिए खास है?
      • विश्वकर्मा पूजा का असली संदेश क्या है?
        • विश्वकर्मा पूजा 2026: एक नजर में

विश्वकर्मा पूजा की कहानी सिर्फ एक पौराणिक कथा तक सीमित नहीं है। इसके पीछे वैदिक साहित्य, शिल्प परंपरा, कारीगर समुदाय और भारत में औद्योगिकीकरण के बदलते दौर की एक लंबी कहानी दिखाई देती है। 2026 में विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर, गुरुवार को मनाई जाएगी। यह दिन कन्या संक्रांति से जुड़ा है, यानी सूर्य के सिंह राशि से कन्या राशि में प्रवेश करने का समय।

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सबसे पहले जानिए-ऋग्वेद में विश्वकर्मा कौन हैं?

भगवान विश्वकर्मा को आज आमतौर पर देवताओं के शिल्पकार, वास्तुकार और दिव्य इंजीनियर के रूप में जाना जाता है। लेकिन प्राचीन वैदिक साहित्य में ‘विश्वकर्मन्’ की तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है।

ऋग्वेद के मंडल 10 के सूक्त 81 और 82 में विश्वकर्मन् से जुड़े मंत्र मिलते हैं। सूक्त 81 में उन्हें ऐसा सृष्टिकर्ता बताया गया है जो पृथ्वी और आकाश की रचना से जुड़े हैं और जिन्हें ‘सर्वद्रष्टा’ के रूप में संबोधित किया गया है। ऋग्वेद का एक सवाल आज भी बेहद दिलचस्प लगता है-सृष्टि की रचना के लिए आधार क्या था, वह कौन-सी सामग्री थी और शुरुआत कैसे हुई?

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यानी वैदिक विश्वकर्मन् की अवधारणा सिर्फ ‘औजार बनाने वाले कारीगर’ तक सीमित नहीं थी। उसमें सृजन, निर्माण और ब्रह्मांड की रचना जैसे बड़े दार्शनिक सवाल भी जुड़े हुए थे।

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यही विश्वकर्मा पूजा की सबसे दिलचस्प अनसुनी परत है

आज जिस विश्वकर्मा को हम फैक्ट्री, मशीन और औजारों से जोड़ते हैं, उनकी वैदिक अवधारणा में ‘निर्माण’ का अर्थ कहीं व्यापक था। यही वजह है कि विश्वकर्मा पूजा को केवल मशीनों की पूजा के रूप में देखना इसके इतिहास को छोटा कर देता है।

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क्या विश्वकर्मा सच में ‘पहले इंजीनियर’ थे?

धार्मिक परंपराओं में विश्वकर्मा को देवताओं के दिव्य वास्तुकार और शिल्पकार के रूप में सम्मान दिया जाता है। बाद की पौराणिक परंपराओं में उनसे कई दिव्य निर्माण जोड़े गए हैं। लोकप्रिय मान्यताओं में द्वारका, इंद्रप्रस्थ, लंका, पुष्पक विमान और विभिन्न दिव्य अस्त्रों के निर्माण का संबंध विश्वकर्मा से बताया जाता है। हालांकि इन कथाओं के स्रोत और विवरण अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में अलग रूप में मिलते हैं।

इसलिए ‘पहले इंजीनियर’ कहना एक लोकप्रिय धार्मिक-सांस्कृतिक व्याख्या है, आधुनिक इतिहास की तकनीकी उपाधि नहीं। लेकिन इस उपाधि के पीछे एक स्पष्ट विचार जरूर दिखाई देता है-निर्माण करने वाले व्यक्ति और उसके हुनर को सम्मान।

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मशीनों की पूजा क्यों होती है?

विश्वकर्मा पूजा का सबसे अनोखा पहलू यही है कि इस दिन सिर्फ भगवान की प्रतिमा की पूजा नहीं की जाती। फैक्ट्रियों, वर्कशॉप, गैराज, निर्माण स्थलों और कई व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में काम आने वाले औजारों और मशीनों को साफ करके उनके सामने पूजा की जाती है।

भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल पर भी विश्वकर्मा पूजा को इंजीनियरिंग समुदाय, कारीगरों और कामगारों से जुड़ी परंपरा बताया गया है, जिसमें कार्यस्थलों पर औजारों और उपकरणों की पूजा की जाती है। इसके पीछे एक सरल लेकिन गहरा विचार समझा जा सकता है-

जिस चीज से रोजी-रोटी चलती है, उसे भी सम्मान मिलना चाहिए।

इस नजरिए से हथौड़ा, आरी, मशीन, वाहन या आधुनिक औद्योगिक उपकरण केवल निर्जीव वस्तु नहीं रहते; वे व्यक्ति के कौशल और श्रम से जुड़े साधन बन जाते हैं।

लेकिन विश्वकर्मा पूजा सिर्फ हजारों साल पुरानी परंपरा नहीं है

विश्वकर्मा की पूजा की जड़ें प्राचीन धार्मिक साहित्य में दिखाई देती हैं, लेकिन आज जिस रूप में विश्वकर्मा पूजा को फैक्ट्री, तकनीक और औद्योगिक श्रम से जोड़ा जाता है, उसका विस्तार ऐतिहासिक रूप से काफी बाद में हुआ।

Cambridge University Press में प्रकाशित एक शोध लेख के अनुसार विश्वकर्मा पूजा का संबंध लंबे समय से भारत के पारंपरिक कारीगरों और उनके औजारों से रहा, लेकिन औद्योगिक पूंजीवाद के बढ़ने के साथ इस पूजा को नई सामाजिक और सांस्कृतिक प्रासंगिकता मिली। शोधकर्ताओं ने बताया कि कारीगरों, तकनीशियनों, मैकेनिकों और इंजीनियरों की दुनिया में विश्वकर्मा पूजा ने तकनीक और धार्मिक जीवन को एक-दूसरे से जोड़ने का काम किया।

यानी परंपरा ने खुद को बदला

पहले जहां हथौड़ा, लोहे के औजार, लकड़ी का काम या पारंपरिक शिल्प केंद्र में थे, वहीं औद्योगिकीकरण के साथ मशीनें, वर्कशॉप, फैक्ट्री और तकनीकी काम भी इस धार्मिक संस्कृति का हिस्सा बनने लगे।

यही विश्वकर्मा पूजा को दूसरे कई त्योहारों से अलग बनाता है।

1961 के एक सर्वे में दर्ज हुई विश्वकर्मा पूजा की झलक

इस परंपरा का एक बेहद दिलचस्प ऐतिहासिक रिकॉर्ड भारत की जनगणना से जुड़े 1961 के एक सर्वे में मिलता है। West Bengal और Sikkim से संबंधित handicrafts survey में दर्ज है कि कुछ कारीगर समुदाय विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर अपने औजार धोकर पूजा स्थल पर रखते थे। पूजा के दौरान फल, मिठाई, दूध, शहद और चावल जैसी चीजें अर्पित की जाती थीं और कुछ समुदाय उस दिन काम रोकते थे।

यह रिकॉर्ड इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि विश्वकर्मा पूजा केवल आधुनिक फैक्ट्रियों में अचानक शुरू हुई परंपरा नहीं थी। इसका संबंध वास्तविक कारीगर समुदायों और उनके काम के औजारों से भी रहा है।

विश्वकर्मा पूजा और बंगाल की पतंग-यह कनेक्शन कहां से आया?

विश्वकर्मा पूजा की एक और लोकप्रिय लेकिन कम समझी जाने वाली परंपरा है-पतंग उड़ाना। खासकर बंगाल में विश्वकर्मा पूजा और पतंगबाजी का संबंध लंबे समय से दिखाई देता है। लेकिन यहां एक जरूरी सावधानी है-इस परंपरा की कोई एक निश्चित ऐतिहासिक उत्पत्ति प्रमाणित नहीं है।

हालिया सांस्कृतिक शोध में कई संभावित कारण बताए गए हैं। इनमें बंगाल में 19वीं सदी के दौरान पतंगबाजी का विस्तार, उत्तर भारतीय परंपराओं का प्रभाव और विश्वकर्मा पूजा के साथ इसे मनोरंजन के रूप में जुड़ना शामिल है। विश्वकर्मा को उड़ने वाले दिव्य वाहनों से जोड़ने वाली लोकप्रिय कल्पनाएं भी इस सांस्कृतिक संबंध को और मजबूत कर सकती हैं।

इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि- विश्वकर्मा पूजा और पतंगबाजी का रिश्ता सांस्कृतिक रूप से मजबूत है, लेकिन इसकी एकल और निश्चित ‘शुरुआत’ बताना मुश्किल है।

खबर मन्त्र एक्सक्लूसिव पड़ताल एवं विश्लेषण
Exclusive

विश्वकर्मा पूजा किन लोगों के लिए खास है?

इस पर्व का संबंध केवल फैक्ट्री कर्मचारियों से नहीं है। आज इसे कई पेशेवर समूहों से जोड़ा जाता है, जैसे-

  • इंजीनियर
  • आर्किटेक्ट
  • मैकेनिक
  • बढ़ई
  • लोहार
  • वेल्डर
  • इलेक्ट्रिशियन
  • मशीन ऑपरेटर
  • कारीगर
  • वाहन चालक और वर्कशॉप कर्मचारी
  • फैक्ट्री कर्मचारी
  • छोटे-बड़े उद्योगों से जुड़े लोग

यानी जिस काम में कौशल, औजार और निर्माण महत्वपूर्ण हैं, वहां विश्वकर्मा पूजा की सांस्कृतिक प्रासंगिकता आसानी से समझी जा सकती है।

विश्वकर्मा पूजा का असली संदेश क्या है?

अगर इस पूरे पर्व को सिर्फ धार्मिक कर्मकांड से बाहर निकालकर देखें तो इसका एक बेहद आधुनिक संदेश भी दिखाई देता है-

निर्माण करने वाले हाथों का सम्मान।

एक मशीन कितनी भी आधुनिक क्यों न हो, उसे चलाने वाला व्यक्ति जरूरी है। एक फैक्ट्री कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसके पीछे इंजीनियर, तकनीशियन, ऑपरेटर और कारीगरों का कौशल होता है। और यही वजह है कि विश्वकर्मा पूजा को केवल ‘मशीनों की पूजा’ कहना इसके सामाजिक अर्थ को अधूरा कर देता है। यह काम, तकनीक, कौशल और सृजन के सम्मान से जुड़ा पर्व भी है।

विश्वकर्मा पूजा 2026: एक नजर में

त्योहार: विश्वकर्मा पूजा
वर्ष: 2026
तारीख: 17 सितंबर 2026, गुरुवार
मुख्य आधार: कन्या संक्रांति
आराध्य: भगवान विश्वकर्मा
मुख्य रूप से पूजा: औजार, मशीनें, वाहन, कार्यस्थल और निर्माण से जुड़े उपकरण
विशेष रूप से जुड़े वर्ग: कारीगर, तकनीशियन, इंजीनियर, मैकेनिक, औद्योगिक कर्मचारी और शिल्पकार
मुख्य संदेश: सृजन, कौशल, तकनीक और श्रम का सम्मान

विश्वकर्मा पूजा को अगर सिर्फ ‘भगवान विश्वकर्मा की जयंती’ के रूप में देखा जाए तो इसकी कहानी काफी छोटी लग सकती है। लेकिन ऋग्वेद के विश्वकर्मन् से लेकर पौराणिक देवशिल्पी, पारंपरिक कारीगरों के औजार और फिर आधुनिक फैक्ट्री की मशीनों तक देखें तो एक बड़ा बदलाव दिखाई देता है।

यह उस भारतीय परंपरा की कहानी है जिसमें ‘बनाने’ वाले काम को सम्मान मिला-और समय के साथ हथौड़े से मशीन और मशीन से आधुनिक तकनीक तक यह परंपरा बदलती चली गई।

शायद इसी वजह से विश्वकर्मा पूजा का सबसे दिलचस्प सवाल यह नहीं है कि “भगवान विश्वकर्मा ने क्या बनाया?” बल्कि यह है-

“हम जिन चीजों से अपना भविष्य बनाते हैं, क्या हम उनके पीछे छिपे हुनर और मेहनत को उतना ही सम्मान देते हैं?”

Ritika Singh
Ritika Singh

कंटेंट राइटर एवं रिपोर्टर, खबर मन्त्र। झारखंड के स्थानीय समाचार, महिला विकास, कला और लाइफस्टाइल खबरों की विशेष रिपोर्टिंग।

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