Ranchi: झारखंड का एक जिला पलामू… जो इस वक्त सत्ता के नजर में है। यहां की राजनीति में दो बड़े चेहरों की चर्चा शुरू हो चुकी है। एक तरफ झारखंड मुक्ति मोर्चा ने बैद्यनाथ राम को राज्यसभा भेजा, तो दूसरी तरफ भाजपा के पूर्व सांसद ब्रजमोहन राम को ओडिशा का राज्यपाल बनाया गया है।
दोनों नेताओं को मिली बड़ी जिम्मेदारी के बाद सवाल उठने लगा है कि क्या पलामू में अनुसूचित जाति की राजनीति को लेकर नई लड़ाई शुरू हो गई है? क्या भाजपा के मजबूत वोट बैंक में सेंध लगाने की तैयारी में झामुमो जुट गया है? और आखिर पलामू में ऐसा क्या है, जिसकी वजह से दोनों पार्टियों की नजर इस इलाके पर टिकी है?
बीजेपी ने पूर्व सांसद ब्रजमोहन राम को ओडिशा का राज्यपाल बनाया
जून 2026 में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने पूर्व मंत्री बैद्यनाथ राम को राज्यसभा सांसद बनाया था। अब करीब पांच महीने बाद भाजपा के पूर्व सांसद ब्रजमोहन राम को ओडिशा का राज्यपाल बनाया गया है। इन दोनों फैसलों के बाद पलामू की राजनीति में अनुसूचित जाति के प्रतिनिधित्व को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, इन नियुक्तियों के पीछे राजनीतिक दलों की क्या रणनीति है, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन इससे पलामू की राजनीतिक अहमियत जरूर चर्चा में आ गई है।
पलामू प्रमंडल में अनुसूचित जाति के मतदाताओं की बड़ी आबादी
दरअसल, पलामू प्रमंडल में अनुसूचित जाति के मतदाताओं की अच्छी खासी आबादी है। पलामू जिले में अनुसूचित जाति की आबादी 27.65 प्रतिशत, गढ़वा में 12 प्रतिशत और लातेहार में 21.31 प्रतिशत बताई जाती है। ऐसे में इस क्षेत्र का वोट बैंक चुनावी राजनीति में अहम भूमिका निभाता है।
झारखंड में कुल 14 लोकसभा सीटें हैं, जिनमें पलामू सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। वहीं, पलामू प्रमंडल की नौ विधानसभा सीटों में लातेहार और छतरपुर सीट आरक्षित हैं। यही वजह है कि इस क्षेत्र में अनुसूचित जाति के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की चर्चा हमेशा महत्वपूर्ण रही है। आने वाले परिसीमन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या भविष्य में इस क्षेत्र के राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।
पलामू लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित, बीजेपी का गढ़
पलामू में अनुसूचित जाति की राजनीति का इतिहास भी काफी पुराना है। अंग्रेजों के शासनकाल में जीतू राम ने इस क्षेत्र में राजनीतिक पहचान बनाई थी। 1937 और 1946 के चुनावों में उनकी जीत का जिक्र मिलता है। आजादी के बाद भी इस क्षेत्र से कई नेता चुनाव जीतकर विधानसभा और संसद तक पहुंचे।
1967 में पलामू लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हुई। इसके बाद कमला कुमारी लगातार चार बार यहां से सांसद बनीं। वर्तमान में भाजपा के विष्णु दयाल राम पलामू के सांसद हैं। वह 2014 के बाद लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। इससे पलामू में भाजपा की मजबूत राजनीतिक पकड़ का अंदाजा लगाया जा सकता है।
क्या भाजपा अपनी पुरानी पकड़ बरकरार रखेगी?
हालांकि, इस क्षेत्र में भाजपा के अलावा कांग्रेस और झामुमो के नेता भी अनुसूचित जाति की राजनीति में अपनी भूमिका निभाते रहे हैं। झारखंड सरकार के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। वहीं, बैद्यनाथ राम को राज्यसभा भेजकर झामुमो ने भी इस क्षेत्र की राजनीति में अपनी मौजूदगी को मजबूत करने का संकेत दिया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आने वाले समय में पलामू की राजनीति में कोई नया बदलाव देखने को मिलेगा? क्या झामुमो अनुसूचित जाति के मतदाताओं के बीच अपना आधार मजबूत कर पाएगा, या भाजपा अपनी पुरानी पकड़ बरकरार रखेगी?फिलहाल, बैद्यनाथ राम और ब्रजमोहन राम को मिली जिम्मेदारियों ने पलामू को राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आने वाले चुनावों में इसका कितना असर पड़ेगा, यह देखना दिलचस्प होगा।
आदित्य सिंह की रिपोर्ट….

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