विश्व आदिवासी दिवस 2025 आज पूरे देश और विश्वभर में “आदिवासी महिलाओं की आवाज़” थीम के साथ मनाया जा रहा है। यह दिवस न केवल आदिवासी समुदायों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पर्यावरणीय योगदान को उजागर करता है, बल्कि उनके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों की ओर वैश्विक ध्यान भी आकर्षित करता है।
प्राकृतिक संरक्षक की भूमिका में आदिवासी समुदाय
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व की 80% से अधिक जैव विविधता वाले क्षेत्रों में आदिवासी समुदाय निवास करते हैं, जो पर्यावरण संरक्षण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है। भारत के सन्दर्भ में, बस्तर के गोंड समुदाय द्वारा अपनाई गई “झूम खेती” और ओडिशा की डोंगरिया कोंध जनजाति द्वारा नियामगिरी पर्वत की रक्षा उनके पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति से गहरे संबंध का प्रमाण हैं।
विश्व बैंक (2023) के अनुसार, आदिवासी क्षेत्रों में जैव विविधता का ह्रास अन्य क्षेत्रों की तुलना में 30% कम पाया गया है।
सांस्कृतिक विरासत और भाषाओं का संरक्षण एक चुनौती
आदिवासी समुदायों की कलाएं, भाषाएं, लोकगीत और मौखिक परंपराएं मानवता की अमूल्य विरासत हैं।
यूनेस्को की 2023 रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की लगभग 7,000 भाषाओं में से 50% भाषाएं आदिवासी हैं, जिनमें से आधी 21वीं सदी के अंत तक विलुप्त हो सकती हैं।
भारत में भी 700 से अधिक आदिवासी समुदायों की 100 से अधिक भाषाएं खतरे में हैं, जिन्हें संरक्षण की आवश्यकता है। कई गैर-सरकारी संगठनों, जैसे “भाषा”, ने गोंडी, संथाली, और मुंडारी जैसी भाषाओं को डिजिटल रूप से संरक्षित करने का कार्य प्रारंभ किया है।
अधिकारों का उल्लंघन और विस्थापन एक बड़ी चुनौती
विकास परियोजनाओं, खनन और औद्योगीकरण के कारण आदिवासी समुदायों का बड़े पैमाने पर विस्थापन एक गंभीर सामाजिक संकट बन चुका है।
संयुक्त राष्ट्र की 2024 की रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक स्तर पर 40% आदिवासी समुदाय पारंपरिक भूमि से बेदखल हो चुके हैं, जिनमें से अधिकांश को न मुआवजा मिला और न पुनर्वास।
भारत में 2023 की एक स्वतंत्र रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 20 वर्षों में 50 लाख से अधिक आदिवासी विस्थापित हुए हैं। यह न केवल उनकी आजीविका छीनता है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डालता है। WHO की 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, विस्थापन से जूझ रहे आदिवासियों में अवसाद और चिंता जैसे मानसिक रोग 2.5 गुना अधिक पाए जाते हैं।
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2025 की थीम: “आदिवासी महिलाओं की आवाज़”
इस वर्ष की थीम आदिवासी महिलाओं के नेतृत्व, साहस और संघर्ष को समर्पित है।
ओडिशा की डोंगरिया कोंध महिलाओं ने नियामगिरी पर्वत की रक्षा के लिए जो आंदोलन चलाया, वह आज एक मिसाल बन चुका है। मध्य प्रदेश की गोंडी महिलाएं अपनी पारंपरिक चित्रकला के माध्यम से आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में अग्रसर हैं।
संयुक्त राष्ट्र की 2025 रिपोर्ट बताती है कि 60% से अधिक सांस्कृतिक ज्ञान आदिवासी महिलाओं द्वारा संरक्षित किया जाता है। भारत में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत, आदिवासी महिलाओं द्वारा संचालित स्वयं सहायता समूहों ने 10 लाख से अधिक परिवारों को आर्थिक रूप से सशक्त किया है।
भविष्य की दिशा: समावेशी और टिकाऊ विकास की आवश्यकता
विशेषज्ञों का मानना है कि आदिवासी समुदायों की समस्याओं का समाधान नीतिगत समावेशन और सतत विकास में है। इसके लिए कुछ आवश्यक सुझाव दिए गए हैं:
- शिक्षा में आदिवासी ज्ञान और भाषाओं का समावेश
- डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सांस्कृतिक संरक्षण
- भूमि अधिकार और मानसिक स्वास्थ्य पर केंद्रित नीतियां
- हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पादों के लिए ई-कॉमर्स सुविधाएं

विशेष संवाददाता | Khabar Mantra
विकाश कुमार झारखंड के रांची के रहने वाले और यहीं जन्मे पत्रकार एवं डिजिटल मीडिया प्रोफेशनल हैं। झारखंड में लंबे समय से रहने और काम करने के कारण उन्हें राज्य के गांवों, शहरों, स्थानीय समाज, प्रशासन और जमीनी मुद्दों की गहरी समझ है।
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