रांची: 10 मोहर्रम यानी यौमे आशूरा के मौके पर रविवार को राजधानी रांची शोक, श्रद्धा और कुर्बानी के रंग में डूबा रहा. अलविदा मेरे इमाम… की सदाएं, मर्सिए और नौहों की गूंज ने पूरे शहर को ग़मगीन कर दिया. एकरा मस्जिद, डोरंडा इमामबाड़ा, हिंदपीढ़ी, मेन रोड और करबला चौक से जुलूस निकाला गया, जिसमें शिया और सुन्नी दोनों समुदायों के अकीदतमंदों ने इमाम हुसैन (अ.स) और उनके 72 साथियों की शहादत को नम आंखों और लहूलुहान शरीरों के साथ याद किया.
बारिश भी मातम के आग को नहीं कर सकी ठंडा
जुलूस के दौरान मूसलधार बारिश भी मातम की आग को ठंडा नहीं कर सकी. ताजिया, अलम और सिपड़ लेकर अकीदतमंद पैदल चलकर करबला मैदान पहुंचे, जहां फातिहा पढ़कर पहलाम की रस्म अदा की गई. गांधी चौक पर सबसे भावुक दृश्य देखने को मिला, जहां जंजीर, ब्लेड और कमा से मातम करते हुए अकीदतमंदों ने कर्बला की तकलीफों को दोहराया.
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या अली के नारों से गूंजा माहोल
सैयद तकी हुसैन रिजवी ने सदर ताजिया को कांधे पर उठाया और करबला तक जुलूस की अगुवाई की. कव्वाल सैयद तनवीर हुसैन और मोहम्मद रज़ा ने मर्सिए पढ़े, जबकि मौलाना सैयद इब्ने अब्बास ने शहादत-ए-हुसैन पर भावभीना बयान दिया.
वहीं, सुन्नी समुदाय की ओर से भी पहलाम का जुलूस निकाला गया, जिसमें सभी अखाड़ों से जुड़े लोग मेन रोड पर पहुंचे. या हुसैन और या अली के नारों से माहौल गूंज उठा.













