PitraPaksh 2025: भारत में कई ऐसे तीर्थ हैं जहाँ पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध व पिंडदान किया जाता है, लेकिन गयाजी (बिहार) को पितरों का सर्वोच्च मुक्तिधाम माना गया है। पितृपक्ष के पावन अवसर पर लाखों श्रद्धालु यहां जुटते हैं। सवाल है – आखिर गयाजी ही क्यों? इसके पीछे की पौराणिक कथाएं और धार्मिक स्थल बेहद रोचक हैं।
गयासुर की कथा और गयाजी का महत्व
कहा जाता है कि यहां गयासुर नामक असुर ने कठोर तपस्या कर भगवान विष्णु से वरदान पाया कि उसके दर्शन मात्र से ही लोगों के पाप नष्ट हो जाएं। जब असुर का वरदान संतुलन बिगाड़ने लगा तो भगवान विष्णु ने उसे धरती में दबाकर इस पूरे क्षेत्र को गयाक्षेत्र बना दिया। तभी से गयाजी पितृमोक्ष का तीर्थ बन गया।
फल्गु नदी – जहाँ माता सीता ने किया पिंडदान
गया में बहने वाली फल्गु नदी पिंडदान की सबसे प्रमुख साक्षी है। मान्यता है कि यहां भगवान राम और माता सीता ने राजा दशरथ के लिए पिंडदान किया था।
- कथा के अनुसार, जब राम पिंड लाना भूल गए तो माता सीता ने ही बालू (रेत) से पिंड बनाकर श्राद्ध सम्पन्न किया।
- सीता ने नदी, वटवृक्ष और गयाशिला को साक्षी बनाया। आज भी इस नदी में पिंडदान का विशेष महत्व है।
अक्षयवट – अनंत काल तक पितरों का साक्षी
फल्गु नदी के किनारे स्थित अक्षयवट वृक्ष को अमर माना जाता है।
- मान्यता है कि यह वही वटवृक्ष है जिसे माता सीता ने अपने पिंडदान का साक्षी बनाया था।
- कहा जाता है कि इस वटवृक्ष की छाया कभी खत्म नहीं होती और यह पितरों की आत्मा को मोक्ष दिलाने का प्रतीक है।
- यहां पिंडदान करने से पूर्वजों को अनंतकाल तक संतोष और शांति प्राप्त होती है।
विष्णुपद मंदिर – भगवान विष्णु के पदचिह्नों का दर्शन
गया का सबसे प्रमुख तीर्थ है विष्णुपद मंदिर।
- यहां भगवान विष्णु के पदचिह्न अंकित हैं।
- माना जाता है कि यही वह स्थान है जहां भगवान विष्णु ने गयासुर को दबाया था।
- अहिल्याबाई होल्कर ने 1787 में इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था।
- पितृपक्ष में विष्णुपद मंदिर में श्राद्ध और पिंडदान का अत्यधिक महत्व है।
प्रेतशिला पर्वत – अकाल मृत्यु को प्राप्त आत्माओं की मुक्ति
गया शहर से 10 किमी दूर स्थित प्रेतशिला पर्वत पितृपक्ष का एक और प्रमुख स्थल है।
- यहां पिंडदान करने से अकाल मृत्यु को प्राप्त आत्माओं को प्रेतयोनि से मुक्ति मिलती है।
- पर्वत की चोटी पर बनी चट्टान के चारों ओर श्रद्धालु 5 से 9 बार परिक्रमा कर सत्तू से पिंड अर्पित करते हैं।
- मान्यता है कि भगवान राम, लक्ष्मण और सीता ने भी यहीं पर राजा दशरथ का श्राद्ध किया था।
ब्रह्मकुंड और रामकुंड – पवित्र स्नान स्थल
प्रेतशिला पर्वत के नीचे स्थित ब्रह्मकुंड और रामकुंड का भी अपना महत्व है।
- ब्रह्मकुंड में श्रद्धालु स्नान कर पिंडदान करते हैं।
- रामकुंड को वह स्थल माना जाता है जहां भगवान राम ने स्नान किया था।
- दोनों ही स्थलों पर स्नान कर पितरों के उद्धार की कामना की जाती है।
पितृपक्ष में गयाजी की विशेषता
- पितृपक्ष के 16 दिन गयाजी को महालया कहा जाता है।
- मान्यता है कि इस अवधि में पितर गयाजी आते हैं और अपने वंशजों के पिंडदान की प्रतीक्षा करते हैं।
- गयाजी में किए गए पिंडदान से 14 पीढ़ियों तक के पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
गयाजी के फल्गु नदी, अक्षयवट वृक्ष, विष्णुपद मंदिर, प्रेतशिला पर्वत, ब्रह्मकुंड और रामकुंड – ये सभी स्थल सिर्फ धार्मिक आस्था ही नहीं बल्कि पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष के दिव्य द्वार माने जाते हैं। यही वजह है कि पितृपक्ष आते ही गयाजी करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए पितरों का सबसे बड़ा मुक्तिधाम बन जाता है।













